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सोशल मीडिया और बच्चे: उम्र-आधारित प्रतिबंध की मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
Tara Tandi
16 Oct 2026 2:42 PM IST

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को एक याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से बच्चों को होने वाले खतरों से बचाने के लिए एक व्यापक और लागू करने योग्य रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (नियम-कानून का ढांचा) बनाने की मांग की गई है। इसमें बच्चों के लिए उम्र के आधार पर एक्सेस (पहुंच) पर पाबंदी और ऑनलाइन शोषण से सुरक्षा जैसे उपाय शामिल हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की बेंच में शामिल जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने 'द एमराल्ड हाइट्स इंटरनेशनल स्कूल' और इसके डायरेक्टर (एकेडमिक्स) सिद्धार्थ सिंह गिरनार द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया। कोर्ट ने इस मामले को इसी तरह के मुद्दों वाली एक अन्य लंबित याचिका के साथ जोड़ दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 3 दिसंबर की तारीख तय की है। भारत सरकार, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय, और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के खिलाफ दायर इस याचिका में चिंता जताई गई है कि बच्चे कमर्शियल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का बिना किसी रोक-टोक के इस्तेमाल कर रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि मौजूदा कानूनी और रेगुलेटरी ढांचा इन खतरों से निपटने के लिए नाकाफी है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आमतौर पर खुद ही न्यूनतम उम्र 13 साल तय कर देते हैं, जो भारतीय कानून के तहत बच्चों को दी गई सुरक्षा के अनुरूप नहीं है।
इसमें 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023' का जिक्र किया गया है, जो 18 साल से कम उम्र के हर व्यक्ति को 'बच्चा' मानता है। यह कानून बच्चों के लिए बेहतर सुरक्षा उपाय देता है, जिसमें माता-पिता की सत्यापित सहमति, ट्रैकिंग पर रोक, व्यवहार की निगरानी (बिहेवियरल मॉनिटरिंग) और टारगेटेड विज्ञापन (targeted advertising) पर पाबंदियां शामिल हैं।
याचिका में कहा गया है कि, "मौजूदा ढांचा बिखरा हुआ, अधूरा और ठीक से लागू न किया गया है।" इसमें तर्क दिया गया है कि उम्र की जांच, कम उम्र के बच्चों की पहुंच रोकने, माता-पिता की भागीदारी और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने के लिए कोई एक समान और लागू करने योग्य 'बाल-सुरक्षा व्यवस्था' मौजूद नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि सोशल मीडिया के जरिए बच्चे तेजी से साइबर बुलिंग, उत्पीड़न, हानिकारक ऑनलाइन कंटेंट और अनजान लोगों से होने वाले अवांछित संपर्क का शिकार हो रहे हैं।
उन्होंने सोशल मीडिया के लंबे समय तक इस्तेमाल से होने वाली समस्याओं पर भी चिंता जताई है, जैसे नींद की कमी, एकाग्रता में कमी, एंग्जायटी (घबराहट/चिंता), आत्मविश्वास में कमी और पढ़ाई-लिखाई में रुचि कम होना।
याचिका में आगे कहा गया है कि माता-पिता अपने बच्चों द्वारा फोन के अत्यधिक इस्तेमाल, देर रात तक इसके संपर्क में रहने, ऑनलाइन बातचीत और बुलिंग, ग्रूमिंग (बच्चों को बहला-फुसलाकर फंसाना) तथा शोषण के खतरों को लेकर चिंतित हैं। साथ ही, उनके लिए इन प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों की गतिविधियों की निगरानी करना या उन तक बच्चों की पहुंच को सीमित करना मुश्किल हो गया है। याचिका में केंद्र और संबंधित अधिकारियों से एक ऐसा समर्पित नियामक ढांचा बनाने और उसे अधिसूचित करने के निर्देश मांगे गए हैं, जो बच्चों के खातों के लिए विश्वसनीय, आनुपातिक और गोपनीयता बनाए रखने वाली उम्र सत्यापन प्रक्रिया, उम्र के हिसाब से उचित एक्सेस, हानिकारक सामग्री पर रोक और अनिवार्य गोपनीयता सेटिंग्स सुनिश्चित करे।
इसमें बच्चों को बहला-फुसलाकर गलत काम के लिए उकसाने (ग्रूमिंग), यौन प्रस्ताव रखने, साइबर बुलिंग, उत्पीड़न और निजी या अंतरंग तस्वीरों के प्रसार से सुरक्षा की भी मांग की गई है। इसके लिए प्रभावी रिपोर्टिंग तंत्र, हानिकारक सामग्री को तुरंत हटाने और कानून के अनुसार सबूतों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था होनी चाहिए।
इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि यदि अन्य सुरक्षा उपाय जोखिमों से निपटने के लिए अपर्याप्त साबित होते हैं, तो बच्चों द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बनाने और उनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने और उसे लागू करने के निर्देश दिए जाएं।
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