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New Delhi नई दिल्ली : सड़क हादसों के पीड़ितों को राहत देने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्थायी विकलांगता (Permanent Disability) के मामलों में मुआवजा तय करते समय पीड़ित के विशेष पेशे से होने वाली वास्तविक आय हानि को आधार बनाया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि केवल सामान्य अनुमान के आधार पर मुआवजा तय करना उचित नहीं है।
जस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने यह निर्णय शंकर दत्त के मामले में सुनाया, जो पेशे से बढ़ई थे। वर्ष 2004 में एक सड़क दुर्घटना में उनकी मोटरसाइकिल को एक तेज रफ्तार और लापरवाही से चल रही जीप ने टक्कर मार दी थी, जिसके बाद उन्हें गंभीर चोटें आईं और घुटने के नीचे उनका दाहिना पैर काटना पड़ा।
हादसे के बाद शंकर दत्त एक कुशल बढ़ई के रूप में अपना काम जारी रखने में पूरी तरह असमर्थ हो गए, जिससे उनकी आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ा। इस आधार पर उन्होंने मुआवजे में वृद्धि की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने शुरुआत में उन्हें 4,77,823 रुपये का मुआवजा दिया था। बाद में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने इसे बढ़ाकर 11,51,423 रुपये कर दिया था। हालांकि, पीड़ित इस राशि से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर यह कहा कि अंग-भंग की वजह से वह अपने पेशे को पूरी तरह जारी नहीं रख पा रहे हैं, जिससे उनकी वास्तविक आय पर बड़ा असर पड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद पीड़ित के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुआवजे की राशि बढ़ाकर 35,95,923 रुपये कर दी। इसके साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि यह राशि क्लेम पिटीशन दायर करने की तारीख से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ दी जाएगी।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि स्थायी विकलांगता के मामलों में मुआवजे का उद्देश्य केवल शारीरिक नुकसान की भरपाई नहीं, बल्कि पीड़ित की आर्थिक क्षमता में आई वास्तविक कमी को संतुलित करना होना चाहिए।
यह फैसला सड़क दुर्घटना पीड़ितों के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो भविष्य में ऐसे मामलों में न्याय निर्धारण की प्रक्रिया को और अधिक स्पष्ट और न्यायसंगत बनाएगा।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने यह सिद्ध किया है कि मुआवजा केवल औपचारिकता नहीं बल्कि वास्तविक जीवन और आजीविका पर पड़े प्रभाव का उचित मूल्यांकन होना चाहिए।





