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थर्मल प्लांट प्रदूषण पर SC सख्त, NGT में जाएं याचिकाकर्ता

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को थर्मल पावर प्लांट में फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) सिस्टम लगाने और उसे चालू करने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) जाने की सलाह दी है।
याचिका में देश के सभी ‘A’ कैटेगरी के थर्मल पावर प्लांटों में FGD सिस्टम लगाने और उन्हें जल्द से जल्द चालू करने के लिए निर्देश जारी करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि पर्यावरण संरक्षण के लिए इन प्रणालियों का प्रभावी रूप से काम करना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने NGT जाने को कहा
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की।
सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील से कहा कि इस मामले में पहले उचित मंच के तौर पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का रुख किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि पर्यावरण से जुड़े तकनीकी और नियामकीय मामलों की सुनवाई के लिए NGT एक विशेष मंच है, जहां ऐसे मामलों पर विस्तृत विचार किया जा सकता है।
FGD सिस्टम क्यों है जरूरी
फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) सिस्टम को कोयले से चलने वाले थर्मल पावर प्लांट में सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) उत्सर्जन को कम करने के लिए लगाया जाता है।
कोयले के दहन के दौरान निकलने वाली गैसों में सल्फर डाइऑक्साइड मौजूद होती है, जो वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बन सकती है।
FGD तकनीक इन गैसों को नियंत्रित करने में मदद करती है और पर्यावरणीय मानकों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पर्यावरण नियमों से जुड़ा मामला
याचिका में पर्यावरण नियमों के तहत सभी संबंधित थर्मल पावर प्लांटों में FGD सिस्टम लगाने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए तय समयसीमा के बावजूद कई जगहों पर इन प्रणालियों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया है।
इस कारण वायु गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है और पर्यावरण संरक्षण के प्रयास कमजोर हो सकते हैं।
थर्मल पावर प्लांटों पर बढ़ी निगरानी
भारत में बिजली उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों से आता है। ऐसे में इन संयंत्रों से निकलने वाले प्रदूषक तत्वों को नियंत्रित करना पर्यावरण नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सरकार और पर्यावरण नियामक संस्थाएं समय-समय पर इन संयंत्रों को प्रदूषण नियंत्रण उपाय लागू करने के निर्देश देती रही हैं।
NGT की भूमिका होगी अहम
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पर्यावरण से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाला विशेष न्यायिक निकाय है।
FGD सिस्टम जैसे तकनीकी और पर्यावरणीय मुद्दों पर NGT विशेषज्ञों की मदद से विस्तृत समीक्षा कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब याचिकाकर्ता के सामने NGT में अपनी मांग रखने का विकल्प खुला है।
सल्फर उत्सर्जन को लेकर चिंता
सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन लंबे समय से पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता का विषय रहा है।
यह गैस हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करने के साथ-साथ अम्लीय वर्षा जैसी पर्यावरणीय समस्याओं से भी जुड़ी होती है।
इसी वजह से दुनिया भर में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में उत्सर्जन नियंत्रण तकनीकों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है।
आगे की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब इस मामले में आगे की कार्रवाई NGT में हो सकती है।
याचिकाकर्ता वहां थर्मल पावर प्लांटों में FGD सिस्टम की स्थापना और संचालन को लेकर अपनी मांग रख सकता है।
NGT मामले पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांग सकता है और जरूरत पड़ने पर निर्देश जारी कर सकता है।





