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ई-चालान पर SC का आदेश स्पष्ट: बिजली बिल से नहीं वसूला जाएगा जुर्माना
Tara Tandi
2 Oct 2026 1:22 PM IST

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से सुझाव दिया था कि ट्रैफिक ई-चालान का बकाया बिजली बिल से जोड़ा जा सकता है। लेकिन कोर्ट के अपलोड किए गए आदेश में यह बात शामिल नहीं है; इसके बजाय, आदेश में ट्रैफिक जुर्माने की बकाया राशि की प्रभावी वसूली के लिए कई उपाय बताए गए हैं।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने सड़क सुरक्षा से जुड़े एक लंबे समय से लंबित मामले की सुनवाई करते हुए सोमवार को सुझाव दिया था कि अधिकारी ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन से जुड़े बकाये की वसूली सुनिश्चित करने के लिए बिजली बिल में ट्रैफिक चालान की बकाया राशि को जोड़ने के तरीके पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि, उसी दिन पारित और गुरुवार को अपलोड किए गए आदेश में ई-चालान के बकाये को बिजली बिल से जोड़ने का कोई निर्देश नहीं है।
आदेश में ई-चालान की बकाया राशि की वसूली के लिए कई खास उपाय बताए गए हैं, जैसे कि वाहन से जुड़ी ऑनलाइन सेवाओं को रोकना, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट और डुप्लीकेट रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के रिन्यूअल या जारी करने पर रोक लगाना, और बकाया राशि का भुगतान होने तक मालिक का पता अपडेट करने के अनुरोधों पर विचार न करना।
जस्टिस पारदीवाला की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि जब तक ट्रैफिक जुर्माने की सारी बकाया राशि का भुगतान न हो जाए, तब तक फिटनेस सर्टिफिकेट जारी न किए जाएं। साथ ही, जिन वाहनों पर चालान बकाया है, उन्हें 'परिवहन पोर्टल' पर ब्लैकलिस्ट करने का निर्देश दिया गया, जिससे उनकी बिक्री और मालिकाना हक के ट्रांसफर में बाधा आएगी।
बेंच ने आगे निर्देश दिया कि कई बार नियम तोड़ने के मामलों में ड्राइविंग लाइसेंस का रिन्यूअल न किया जाए और पहले से जारी लाइसेंस को सस्पेंड करने के लिए कदम उठाए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक बकाया राशि का भुगतान न हो जाए, तब तक किसी भी केंद्र को 'पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल' (PUC) सर्टिफिकेट जारी करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। कोर्ट ने वाहनों की रैंडम चेकिंग का निर्देश दिया और कहा कि अगर किसी वाहन के खिलाफ जारी ई-चालान का भुगतान नहीं किया गया है, तो "वाहन को ज़ब्त करने के लिए ज़रूरी कदम उठाए जाएंगे"।
ये निर्देश सड़क सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक एनफोर्समेंट से संबंधित मोटर वाहन अधिनियम, 1988 और केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के प्रावधानों को लागू करने से जुड़ी एक लंबे समय से लंबित रिट याचिका पर जारी किए गए थे। ऑर्डर में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट लगभग 14 साल से इस मामले की निगरानी कर रहा है और मौजूदा बेंच एक साल से ज़्यादा समय से इसकी सुनवाई कर रही है। इस दौरान सड़क सुरक्षा से जुड़े कानूनी प्रावधानों को असरदार ढंग से लागू करने के लिए कई निर्देश जारी किए गए हैं।
बेंच ने कहा, "सिर्फ़ उस व्यक्ति को ई-चालान जारी करना काफ़ी नहीं है जिस पर एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करने का आरोप है। पुलिस ऐसे हज़ारों-लाखों ई-चालान जारी कर सकती है, लेकिन सवाल यह है कि उन ई-चालानों के ज़रिए लगाया गया जुर्माना कैसे वसूला जाए।"
बेंच ने गौर किया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) को समय-समय पर जारी किए गए ई-चालानों के लिए लगभग 49,194.05 करोड़ रुपये वसूलने थे, जबकि अब तक लगभग 26,175.05 करोड़ रुपये वसूले जा चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को "ज़मीनी हकीकत" को ध्यान में रखते हुए ज़मीनी स्तर पर काम करने की ज़रूरत है। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि जब तक वसूली के लिए कोई असरदार सिस्टम नहीं होगा, तब तक सिर्फ़ ई-चालान जारी करना काफ़ी नहीं होगा।
कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा तैयार 28 अक्टूबर, 2025 की स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को लागू करने और मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 136A के साथ सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स के नियम 167A का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया।
नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड को भी इलेक्ट्रॉनिक एनफोर्समेंट की निगरानी करने का निर्देश दिया गया।
बेंच ने एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र), सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल से एक चार्ट तैयार करने को कहा। इस चार्ट में मामले की निगरानी शुरू होने के बाद से जारी किए गए निर्देश, हर निर्देश की तारीख, उसे लागू करने के लिए दिया गया समय, उसकी मौजूदा स्थिति और एमिकस क्यूरी की टिप्पणियां शामिल होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के मुख्य सचिव को मथुरा रोड पर दिल्ली हाई कोर्ट और नेशनल ज़ूलॉजिकल पार्क के पास पैदल चलने वालों की सुरक्षा से जुड़े अपने पहले के निर्देशों के पालन पर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश भी दिया। इसमें चेतावनी दी गई कि अगर उसके निर्देशों का पालन नहीं किया गया, तो दिल्ली के मुख्य सचिव को सुनवाई की अगली तारीख पर सुप्रीम कोर्ट के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा।
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