- Home
- /
- दिल्ली-एनसीआर
- /
- SC : बेटियों के लिए...
SC : बेटियों के लिए कानून सख्ती से लागू हों, सोच बदले बिना भेदभाव खत्म नहीं होगा

Delhi दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बेटे की चाहत और लिंग-चयन (sex-selection) जैसी गहरी पितृसत्तात्मक सोच की आलोचना करते हुए कहा कि इस मानसिकता में बदलाव आए बिना 'प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (PCPNDT) एक्ट' को सख्ती से लागू करना अनिवार्य है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने यह टिप्पणी लड़कियों के साथ हो रहे भेदभाव और उनके अधिकारों की सुरक्षा के संदर्भ में की।
कोर्ट ने कहा कि सरकार ने लड़कियों के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ', 'जननी सुरक्षा योजना' और 'लाड़ली लक्ष्मी योजना' शामिल हैं। ये योजनाएं पितृसत्तात्मक समाज में लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव को कम करने की लगातार कोशिशों को दर्शाती हैं।
बेंच ने कहा कि हालांकि कुछ प्रगति हुई है, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि PCPNDT एक्ट जैसे कल्याणकारी कानूनों को सही ढंग से लागू करना और इसके पालन पर लगातार निगरानी रखना आवश्यक है। कोर्ट ने कहा, “कानूनों के सख्त क्रियान्वयन के साथ-साथ समाज में व्यापक सोच में बदलाव भी ज़रूरी है। अब तक जिस सोच के तहत महिलाओं की 'जन्मजात कमजोरी' मानी जाती रही, उसकी जगह सच्ची समानता लेनी चाहिए। समाज को यह एहसास होना चाहिए कि लड़की को जन्म लेने का हक हर हाल में है।”
बेंच ने यह भी बताया कि कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात (sex ratio) अभी भी राष्ट्रीय औसत से कम है। इसके चलते लड़कियों के अधिकारों और उनके सम्मान की रक्षा के लिए कानूनों की प्रभावी कार्रवाई ज़रूरी है। कोर्ट ने यह संदेश दिया कि कानून केवल लिखित रूप में नहीं बल्कि सख्ती और निगरानी के साथ लागू होने चाहिए ताकि समाज में वास्तविक बदलाव आए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने अन्य कानून जैसे IPC/BNS अभी भी जरूरी रहेंगे। लेकिन अगर PCPNDT एक्ट जैसी नीतियों का पालन सही ढंग से किया जाए और सोच में बदलाव आए, तो यह सवाल उठाना कि लड़की को जन्म लेने का हक है या नहीं, समाप्त हो जाएगा।
कोर्ट की टिप्पणियों से यह स्पष्ट होता है कि लड़कियों के अधिकारों की रक्षा सिर्फ़ कानून बनाने से नहीं बल्कि समाज की मानसिकता बदलने से ही संभव है। बेटियों के समान अवसर और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानूनों की कड़ी निगरानी और सख्ती के साथ कार्यान्वयन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।





