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New Delhi नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित पड़े एक मर्डर आरोपी की 40 साल पुरानी क्रिमिनल अपील को निपटाने में अत्यधिक देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और ए एस चंदुरकर की पार्शियल वर्किंग डे (PWD) बेंच ने सोमवार को यह स्थिति परेशान करने वाली बताई और सवाल उठाया कि हाई कोर्ट में जस्टिस डिलीवरी सिस्टम में बाधा डाल रहे पेंडेंसी को कम करने के लिए कौन से नए उपाय अपनाए जा सकते हैं।
यह मामला विजय सिंह से जुड़ा है, जो 28 साल के थे जब उन्हें नवंबर 1983 में अपने भाई की कथित गोली मारकर हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। कानपुर की एक सेशन कोर्ट ने उन्हें मर्डर का दोषी पाया और दिसंबर 1985 में उम्रकैद की सज़ा सुनाई।
विजय सिंह ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में फैसले को चुनौती दी, लेकिन उनकी अपील लगभग 41 साल तक लंबित रही। इस लंबी अवधि के बाद ही इस साल 9 फरवरी को हाई कोर्ट ने 20 पेज के फैसले के माध्यम से उनकी अपील खारिज की।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को लेकर कहा कि न्याय में देरी न्याय के न होने के समान है और यह व्यक्ति के जीवन तथा न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर असर डालती है। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि लंबे समय तक पेंडिंग मामलों के कारण जस्टिस डिलीवरी प्रणाली पर भरोसा कम होता है और यह न्यायिक संसाधनों के कुशल उपयोग में बाधा डालता है।
न्यायमूर्ति मिश्रा और चंदुरकर ने यह सवाल उठाया कि क्या हाई कोर्ट में पेंडेंसी कम करने के लिए विशेष बेंच का गठन, डिजिटल कोर्ट प्रक्रिया या अन्य तकनीकी उपाय अपनाए जा सकते हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, यह सिर्फ व्यक्तिगत मामलों के लिए नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता और जनता के विश्वास के लिए भी चिंताजनक है।
विजय सिंह के मामले में लंबी देरी ने उनकी जिंदगी पर गंभीर असर डाला। आरोपी ने अपनी सज़ा के खिलाफ अदालतों में अपील की, लेकिन न्याय मिलने में दशकों लग गए। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की प्रक्रिया में सुधार और तेजी लाने के लिए आवश्यक कदम उठाने की सिफारिश की।
इस मामले ने पूरे देश में न्यायिक प्रणाली में सुधार और मामलों के शीघ्र निपटान की आवश्यकता पर नई बहस को जन्म दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, पुराने और लंबित मामलों की समीक्षा और उनका त्वरित निपटान न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।





