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अल्बानिया में सुप्रीम कोर्ट को आग के हवाले करने पर संजय राउत का बड़ा बयान

नई दिल्ली/मुंबई। यूरोपीय देश अल्बानिया में सरकार के खिलाफ जारी हिंसक प्रदर्शनों को लेकर भारत में भी राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने अल्बानिया में हुए विरोध प्रदर्शनों का हवाला देते हुए भारत सहित दुनिया के अन्य देशों को इससे सबक लेने की नसीहत दी है। राउत ने मराठी भाषा में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी सरकार और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर जनता में भारी नाराजगी है। उन्होंने अपने पोस्ट के साथ एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें अल्बानिया के सुप्रीम कोर्ट की इमारत में आग की लपटें उठती दिखाई दे रही हैं। हालांकि राउत के राजनीतिक दावों और अल्बानिया में प्रदर्शनों के वास्तविक कारणों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
संजय राउत ने वीडियो शेयर कर दी प्रतिक्रिया
शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने अल्बानिया में चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि दुनिया के सभी देशों को ऐसी घटनाओं से सीख लेने की आवश्यकता है।
उन्होंने विशेष रूप से भारत का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखना बेहद जरूरी है।
राउत ने अपनी पोस्ट में दावा किया कि अल्बानिया में भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे प्रधानमंत्री को न्यायपालिका से कथित राहत मिलने के कारण लोगों का गुस्सा बढ़ा है।
उनके मुताबिक, इसी नाराजगी के कारण प्रदर्शनकारियों ने सरकारी संस्थानों को निशाना बनाया।
हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है कि न्यायपालिका द्वारा प्रधानमंत्री को राहत देना ही प्रदर्शनों का प्रमुख कारण था।
अल्बानिया के सुप्रीम कोर्ट में लगी आग
अल्बानिया की राजधानी तिराना में जारी सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान सुप्रीम कोर्ट की इमारत में आग लगने की घटना सामने आई है।
18 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित वीडियो रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के कार्यालयों में आग लगने की पुष्टि की गई है। उस समय भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदर्शन पांचवें दिन में प्रवेश कर चुके थे।
प्रदर्शन के दौरान कुछ स्थानों पर हिंसा हुई और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया।
सोशल मीडिया पर इस घटना के वीडियो व्यापक रूप से प्रसारित हुए। इन्हीं घटनाओं का उल्लेख करते हुए संजय राउत ने भारत के लिए सबक लेने की बात कही है।
भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को लेकर जनता में नाराजगी
अल्बानिया में प्रधानमंत्री एडी रामा की सरकार के खिलाफ प्रदर्शन विभिन्न मुद्दों को लेकर चल रहे हैं।
इनमें भ्रष्टाचार के आरोप, बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था की स्थिति और आर्थिक परेशानियां शामिल हैं।
छात्रों के नेतृत्व में शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों ने धीरे-धीरे व्यापक आंदोलन का रूप ले लिया है। प्रदर्शनकारी सरकार से जवाबदेही और विभिन्न क्षेत्रों में सुधार की मांग कर रहे हैं।
इसके अलावा विवादास्पद तटीय विकास परियोजना को लेकर भी सरकार की आलोचना हुई है। इस परियोजना को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के परिवार से जुड़े कारोबारी हितों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा मिली है।
आलोचकों का आरोप है कि परियोजना के लिए पर्यावरण संबंधी नियमों में ढील दी गई, जबकि सरकार इन आरोपों का विरोध करती रही है।
प्रदर्शनकारियों ने सरकारी इमारतों को बनाया निशाना
19 अक्टूबर को तिराना में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच हिंसक झड़पें हुईं।
रिपोर्टों के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने संसद के आसपास पथराव किया और पेट्रोल बम फेंके। कुछ दुकानों में तोड़फोड़ और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आईं।
प्रदर्शन के दौरान कई स्थानों पर आगजनी हुई। हालात नियंत्रित करने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों को तैनात किया गया।
इन घटनाओं से अल्बानिया में राजनीतिक तनाव और बढ़ गया है।
हालांकि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों में अंतर करना महत्वपूर्ण है। विरोध जताना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और हिंसा करना कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है।
प्रधानमंत्री एडी रामा ने प्रदर्शनकारियों पर उठाए सवाल
अल्बानिया के प्रधानमंत्री एडी रामा ने प्रदर्शनकारियों की इस्तीफे की मांग को खारिज किया है।
उन्होंने कहा कि हिंसक विरोध प्रदर्शनों से सरकार के बजाय देश की यूरोपीय संघ में शामिल होने की संभावनाओं को नुकसान पहुंच सकता है।
रामा ने आरोप लगाया कि हिंसक घटनाओं के पीछे कुछ बाहरी शक्तियों की भूमिका भी हो सकती है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
रॉयटर्स की 18 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने प्रदर्शनों से जुड़ी घटनाओं में 388 लोगों के खिलाफ आरोप दर्ज किए हैं। झड़पों में कई लोगों के घायल होने की भी जानकारी सामने आई है।
यूरोपीय आयोग ने हिंसा की निंदा करते हुए शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन किया है।
न्यायपालिका पर टिप्पणियों को लेकर राउत पहले से चर्चा में
संजय राउत का अल्बानिया से जुड़ा बयान ऐसे समय सामने आया है, जब भारत में न्यायपालिका को लेकर उनकी पिछली टिप्पणियों पर भी विवाद चल रहा है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायपालिका को लेकर की गई टिप्पणियों के संबंध में संजय राउत से स्पष्टीकरण मांगा था।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से राउत और पत्रकार निखिल वागले के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की मांग की गई थी।
16 अक्टूबर को राउत ने कहा था कि उनका न्यायपालिका का अपमान करने का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अदालत को उनकी कोई टिप्पणी अनुचित लगती है, तो वह माफी मांगने के लिए तैयार हैं।
राउत ने न्यायपालिका को लोकतंत्र की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण संस्था बताया था।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर बहस
अल्बानिया की घटनाओं को लेकर राउत की टिप्पणी ने लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जनता के भरोसे का सवाल सामने रखा है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार, संसद और न्यायपालिका की अलग-अलग जिम्मेदारियां निर्धारित होती हैं।
सरकारी नीतियों का विरोध करना और संस्थाओं की जवाबदेही पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि किसी देश में होने वाली हिंसक घटनाओं को दूसरे देश की राजनीतिक परिस्थितियों से सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा।
अल्बानिया और भारत की राजनीतिक तथा संवैधानिक व्यवस्थाएं अलग हैं। इसलिए दोनों देशों की परिस्थितियों का मूल्यांकन उनके अपने तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो
अल्बानिया के सुप्रीम कोर्ट में आग लगने का वीडियो सामने आने के बाद यह घटना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है।
संजय राउत की ओर से वीडियो साझा किए जाने के बाद भारत में भी इस पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं की संभावना बढ़ गई है।
फिलहाल अल्बानिया में जारी हिंसक प्रदर्शनों के पीछे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा और सरकारी नीतियों से जुड़े कई मुद्दे सामने आए हैं।
संजय राउत ने इन घटनाओं को भारत सहित अन्य देशों के लिए चेतावनी के रूप में प्रस्तुत किया है। हालांकि न्यायपालिका की भूमिका को लेकर उनके विशिष्ट आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अब अल्बानिया में आगे की राजनीतिक परिस्थितियों और सरकार की प्रतिक्रिया पर नजर बनी हुई है।





