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चुनाव आयोग को लेकर विरोध पर साल्वे ने उठाए सवाल

Ratna Netam
7 Oct 2026 5:07 PM IST
चुनाव आयोग को लेकर विरोध पर साल्वे ने उठाए सवाल
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नई दिल्ली। मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों के जारी विरोध प्रदर्शन के बीच पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने बुधवार को राजनीतिक दलों को संयम बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि राजनीति और राजनीतिक आलोचना की अपनी सीमाएं होती हैं और संवैधानिक संस्थाओं को सीधे राजनीतिक हमलों का निशाना बनाना उचित नहीं है।साल्वे ने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों और उनके विरोधियों की आलोचना स्वाभाविक है, लेकिन संविधान द्वारा स्थापित संस्थाओं को लेकर ऐसी भाषा और तरीके से बचना चाहिए जिससे उनकी विश्वसनीयता या संस्थागत कामकाज कमजोर हो। उनका बयान ऐसे समय आया है जब विपक्षी दल SIR और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग भी उठाई है। हाल के दिनों में दिल्ली में इस मुद्दे पर बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
साल्वे ने कहा, “मुझे लगता है कि राजनीति अपनी उचित सीमाओं से थोड़ी आगे बढ़ रही है। मैं राजनीतिक दलों और राजनीतिक विरोधियों की आलोचना को तो समझ सकता हूं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक हमलों का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए, और आज ठीक यही होता दिख रहा है।”उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं का कामकाज देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद से जुड़ा होता है। राजनीतिक मतभेद कितने भी गहरे क्यों न हों, संस्थाओं पर आरोप लगाते समय सावधानी बरती जानी चाहिए। साल्वे का तर्क था कि अगर हर राजनीतिक विवाद में संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जाने लगें तो इससे लंबे समय में संस्थागत ढांचे पर असर पड़ सकता है।
विपक्षी दल पिछले कई दिनों से चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। कांग्रेस समेत INDIA गठबंधन के कई दल SIR प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का आरोप लगा रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए और आयोग को राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ तत्काल बैठक करनी चाहिए। दूसरी ओर चुनाव आयोग इन आरोपों से असहमति जताता रहा है और अपनी प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बताता है।मंगलवार को विपक्षी सांसदों ने चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर मार्च करने की कोशिश की थी। पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका, जिसके बाद राहुल गांधी और अन्य नेता आकाशवाणी भवन के पास धरने पर बैठ गए। प्रदर्शन के दौरान कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया और बाद में छोड़ दिया गया। बुधवार को विपक्ष ने जंतर-मंतर पर अपना विरोध जारी रखा।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसदों ने इस मुद्दे पर संयुक्त रणनीति बनाई है। विपक्ष की मांगों में SIR प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण, चुनाव आयोग से सीधे संवाद और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग शामिल है। राहुल गांधी ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि विपक्ष इस मामले में पीछे हटने वाला नहीं है।हरीश साल्वे की टिप्पणी इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में सामने आई है। उन्होंने विपक्ष के आरोपों के गुण-दोष पर विस्तार से टिप्पणी करने के बजाय व्यापक संवैधानिक सिद्धांत पर जोर दिया। उनका कहना था कि राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करते समय उस संस्थागत व्यवस्था को ध्यान में रखना चाहिए जिसके तहत ये निकाय काम करते हैं।
साल्वे भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं और कई संवैधानिक तथा महत्वपूर्ण कानूनी मामलों में पैरवी कर चुके हैं। इसलिए चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर उनकी टिप्पणी ने राजनीतिक बहस में एक अलग आयाम जोड़ दिया है।इस बीच SIR का विवाद लगातार व्यापक होता जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया में मतदाता सूचियों से नाम हटाने या जोड़ने के तरीके को लेकर गंभीर सवाल हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राजद और अन्य विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक प्रदर्शन और चुनाव आयोग से बातचीत की मांग तेज कर दी है।
वहीं भाजपा और चुनाव आयोग विपक्ष के आरोपों को खारिज कर रहे हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष चुनावी प्रक्रिया पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि आयोग का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण तय कानून और नियमों के अनुसार किया जाता है।साल्वे ने अपने बयान में यही संदेश देने की कोशिश की कि संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना और राजनीतिक हमले में अंतर होना चाहिए। उनके मुताबिक राजनीतिक दल अपने विरोधियों की नीतियों और फैसलों की तीखी आलोचना कर सकते हैं, लेकिन संस्थाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता को कमजोर करने वाली राजनीति से बचना चाहिए।
यह मुद्दा अब केवल SIR तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि चुनाव आयोग की भूमिका, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और राजनीतिक आलोचना की सीमा पर भी बहस शुरू हो गई है। विपक्ष जहां इसे मतदाता अधिकारों और निष्पक्ष चुनाव से जुड़ा सवाल बता रहा है, वहीं साल्वे जैसे कानूनी विशेषज्ञ संस्थागत संतुलन और संवैधानिक मर्यादा पर जोर दे रहे हैं।आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने की संभावना है, क्योंकि विपक्ष ने अपने आंदोलन को जारी रखने के संकेत दिए हैं। फिलहाल हरीश साल्वे का बयान इस पूरे विवाद में संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक संघर्ष से अलग रखने की अपील के रूप में सामने आया है।
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