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चुनाव आयोग पर सचिन पायलट का हमला, आजीवन छूट पर उठाए सवाल
Ratna Netam
6 Nov 2026 8:59 PM IST

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नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की निष्पक्षता और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को मिलने वाले कानूनी संरक्षण पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पायलट ने केंद्र सरकार से पूछा कि आखिर ऐसा कानून बनाने की क्या आवश्यकता थी, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद छोड़ने के बाद भी आधिकारिक कार्यों के संबंध में कानूनी कार्रवाई से संरक्षण मिलता है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और पारदर्शिता को लेकर उठ रहे सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा रहा है। पायलट के इस बयान के बाद चुनाव आयोग की जवाबदेही और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।समाचार एजेंसी एएनआई को दिए एक साक्षात्कार में सचिन पायलट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतंत्र में चुनाव कराने वाली संस्था का निष्पक्ष होना बेहद जरूरी है। उन्होंने क्रिकेट मैच का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि अंपायर की निष्पक्षता पर ही सवाल उठने लगें, तो खेल की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसी तरह चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है।
पायलट ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की कुछ गतिविधियों और फैसलों ने उसकी निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा किया है। उन्होंने कहा कि देश के नागरिकों को यह भरोसा होना चाहिए कि चुनाव प्रक्रिया किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में प्रभावित नहीं होगी। उन्होंने निर्वाचन आयोग से जुड़े विवादों की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की।कांग्रेस नेता ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में किए गए बदलावों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पहले मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की भागीदारी वाली चयन व्यवस्था थी। इसके बाद सरकार ने कानून बनाकर चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया। पायलट ने इस बदलाव को लेकर कहा कि इससे चयन प्रक्रिया में सरकार का प्रभाव बढ़ने की आशंका पैदा होती है।उन्होंने सवाल किया कि जब चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसे स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए, तो उसकी नियुक्ति प्रक्रिया ऐसी क्यों नहीं होनी चाहिए, जिससे सभी पक्षों का भरोसा बना रहे। पायलट ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था की विश्वसनीयता केवल उसके संवैधानिक दर्जे से नहीं, बल्कि उसकी कार्यप्रणाली और पारदर्शिता से भी तय होती है।
सचिन पायलट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों तथा कार्यकाल से संबंधित वर्ष 2023 के कानून में दिए गए कानूनी संरक्षण पर विशेष आपत्ति जताई। उन्होंने पूछा कि सरकार को ऐसा प्रावधान लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी, जो पद छोड़ने के बाद भी चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के संबंध में कानूनी कार्रवाई से संरक्षण देता है।हालांकि, कानूनी स्थिति स्पष्ट करना आवश्यक है। वर्ष 2023 के कानून की धारा 16 के तहत यह संरक्षण केवल मुख्य चुनाव आयुक्त तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य चुनाव आयुक्तों पर भी लागू होता है। यह उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए या कथित तौर पर किए गए कार्यों से संबंधित है। इसे सभी प्रकार के व्यक्तिगत कार्यों के लिए पूर्ण कानूनी छूट नहीं माना जाना चाहिए।पायलट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि मतदाता सूचियों से 13.3 करोड़ नाम हटाए जाने का मुद्दा गंभीर है और इस पर चुनाव आयोग को विस्तृत स्पष्टीकरण देना चाहिए। हालांकि, यह आंकड़ा कांग्रेस नेता का दावा है और इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में किसी भी प्रकार की अनियमितता लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अवसर मिलना चाहिए और मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। पायलट ने मांग की कि चुनाव से संबंधित आंकड़ों और दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जाए, ताकि किसी भी प्रकार की आशंका का समाधान हो सके।कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा केवल किसी राजनीतिक दल की जीत या हार से जुड़ा नहीं है। उनका कहना था कि चुनाव में चाहे कोई भी पार्टी जीते, प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनी रहनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस ने चुनाव आयोग से संबंधित अपनी शिकायतों के समर्थन में दस्तावेज और आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम कानूनी निष्कर्ष सामने नहीं आया है।इस बीच मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को मिलने वाले कानूनी संरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गया है। 4 नवंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2023 के कानून की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा। याचिका में इस संरक्षण के दायरे और जवाबदेही से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। अदालत ने अभी इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है।
पायलट ने कहा कि विपक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों को संसद, न्यायपालिका और जनता के बीच उठाता रहेगा। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता बताई।कांग्रेस और विपक्षी दलों की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं, निर्वाचन आयोग की ओर से विभिन्न आरोपों पर स्पष्टीकरण भी दिया गया है। ऐसे में यह विवाद अब राजनीतिक बहस के साथ न्यायिक परीक्षण का विषय भी बन गया है।सचिन पायलट के बयान ने एक बार फिर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, नियुक्ति प्रक्रिया और कानूनी जवाबदेही के मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब इस मामले में केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किए जाने वाले जवाब महत्वपूर्ण होंगे।
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