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BRICS समिट से पहले रूस ने भारत पर जताया भरोसा, ईरान-UAE के मतभेद दूर कराने की उम्मीद

Kavita2
9 Sept 2026 9:49 AM IST
BRICS समिट से पहले रूस ने भारत पर जताया भरोसा, ईरान-UAE के मतभेद दूर कराने की उम्मीद
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नई दिल्ली। भारत में 12 और 13 सितंबर को होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले रूस ने भारत की कूटनीतिक भूमिका को लेकर बड़ा भरोसा जताया है। रूस ने उम्मीद जताई है कि भारत ब्रिक्स के मंच का इस्तेमाल कर सदस्य देशों ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच बढ़े मतभेदों को कम करने और संवाद बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच रूस की इस उम्मीद को काफी अहम माना जा रहा है।

ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के कारण पश्चिम एशिया में हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। इस टकराव का प्रभाव क्षेत्र के दूसरे देशों पर भी पड़ा है। ईरान की ओर से संयुक्त अरब अमीरात में कुछ ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद तेहरान और अबू धाबी के बीच तनाव बढ़ा है। ऐसे समय में दोनों देशों को एक मंच पर लाना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक चुनौती हो सकती है।

भारत की मेजबानी में होगा BRICS सम्मेलन

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत की मेजबानी में आयोजित होने जा रहा है। सम्मेलन में सदस्य देशों के शीर्ष नेताओं के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, व्यापार, बहुपक्षीय सहयोग और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।

इस बार सम्मेलन पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव की छाया भी देखने को मिल सकती है। ईरान और यूएई दोनों ब्रिक्स के सदस्य हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच तनाव संगठन के भीतर सहयोग के लिए भी चुनौती पैदा कर सकता है।

रूस को भारत से बड़ी उम्मीद

रूस का मानना है कि भारत के ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं। यही वजह है कि नई दिल्ली दोनों देशों के बीच संवाद का रास्ता खोलने में उपयोगी भूमिका निभा सकती है।

भारत ने लंबे समय से पश्चिम एशिया के अलग-अलग देशों के साथ संतुलित कूटनीतिक संबंध बनाए रखने की कोशिश की है। ईरान के साथ भारत के ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक हित जुड़े हैं, जबकि यूएई भारत का महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है।

ईरान-UAE को साथ लाना बड़ी चुनौती

मौजूदा परिस्थितियों में ईरान और यूएई के बीच मतभेद कम कराना आसान नहीं माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव और एक-दूसरे पर हमलों के बाद दोनों पक्षों के बीच विश्वास बहाल करना बड़ी चुनौती है।

यदि ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत दोनों देशों के प्रतिनिधियों को बातचीत के लिए तैयार करने में सफल रहता है तो इसे एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है।

पश्चिम एशिया के तनाव पर रहेगी नजर

ब्रिक्स सम्मेलन में पश्चिम एशिया की स्थिति पर चर्चा होने की संभावना है। सदस्य देश क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने, संघर्ष को आगे बढ़ने से रोकने और बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने पर जोर दे सकते हैं।

रूस की ओर से भारत की संभावित मध्यस्थ भूमिका का उल्लेख यह संकेत देता है कि सम्मेलन में केवल आर्थिक और व्यापारिक मुद्दे ही नहीं बल्कि वैश्विक सुरक्षा से जुड़े विषय भी महत्वपूर्ण रहेंगे।

भारत के दोनों देशों से मजबूत रिश्ते

भारत और यूएई के बीच पिछले कुछ वर्षों में व्यापार, निवेश, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है। बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक भी यूएई में रहते और काम करते हैं। ऐसे में वहां की स्थिरता भारत के लिए महत्वपूर्ण है।

दूसरी ओर ईरान के साथ भी भारत के ऐतिहासिक संबंध हैं। चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं दोनों देशों के रणनीतिक सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। मध्य एशिया तक भारत की पहुंच के लिहाज से भी ईरान की भूमिका अहम है।

इसी संतुलित रिश्ते के कारण रूस को उम्मीद है कि भारत दोनों देशों से बातचीत कर तनाव कम करने की दिशा में पहल कर सकता है।

BRICS की एकता के लिए भी अहम

ईरान और यूएई के बीच बढ़ा तनाव केवल द्विपक्षीय संबंधों का मामला नहीं है। दोनों के ब्रिक्स सदस्य होने के कारण इसका असर समूह की आंतरिक एकजुटता पर भी पड़ सकता है।

ब्रिक्स तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने वाले मंच के रूप में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में सदस्य देशों के बीच गंभीर मतभेद संगठन के साझा एजेंडे को प्रभावित कर सकते हैं।

भारत की कूटनीति की होगी परीक्षा

12 और 13 सितंबर को होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन कई मायनों में भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा। मेजबान देश के रूप में भारत के सामने सदस्य देशों को साझा मुद्दों पर एकजुट रखने के साथ पश्चिम एशिया के तनाव से पैदा हुई चुनौतियों को संभालने की जिम्मेदारी भी होगी।

अब नजर इस बात पर रहेगी कि सम्मेलन के दौरान ईरान और यूएई के बीच कोई सीधी बातचीत होती है या नहीं। यदि भारत दोनों देशों के बीच संवाद की शुरुआत कराने में सफल होता है तो वैश्विक मंच पर उसकी कूटनीतिक भूमिका और मजबूत हो सकती है।

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