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Congress में विदेश नीति पर बयानबाजी तेज, शशि थरूर और पवन खेड़ा के बीच जुबानी जंग

New Delhi नई दिल्ली : कांग्रेस पार्टी के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं शशि थरूर और पवन खेड़ा के बीच बयानबाजी तेज हो गई है, जिससे राजनीतिक माहौल गरमा गया है।
मामला तब सामने आया जब पवन खेड़ा ने शशि थरूर की एक टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि थरूर उन बातों को भी स्वीकार कर लेते हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी ने कही ही नहीं। इस टिप्पणी के बाद पार्टी के भीतर बहस और तेज हो गई तथा दोनों नेताओं के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से दिखने लगे।
पवन खेड़ा के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए शशि थरूर ने सख्त जवाब दिया। उन्होंने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि भारतीय नागरिकों और नाविकों की सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे को एकतरफा राजनीतिक विवाद में बदल दिया गया है। थरूर ने स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों को राजनीतिक लाभ या बहस का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।
थरूर के इस बयान ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा को जन्म दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों को गंभीरता से देखा जाना चाहिए और इन्हें राजनीतिक खींचतान से दूर रखना चाहिए।
वहीं पवन खेड़ा ने पहले कहा था कि थरूर की टिप्पणियां कई बार पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग दिखाई देती हैं, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है। उनके अनुसार, ऐसे बयानों से पार्टी के भीतर असहमति और सार्वजनिक स्तर पर गलत संदेश जा सकता है।
कांग्रेस के भीतर इस तरह के मतभेदों ने संगठनात्मक एकता को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब विपक्षी दल किसी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दे पर एकमत नहीं दिखते, तो उसका असर उनकी राजनीतिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।
हालांकि अब तक पार्टी नेतृत्व की ओर से इस विवाद पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन माना जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व इस मामले को शांत करने और आंतरिक स्तर पर सुलझाने की कोशिश कर सकता है।
विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषय पर कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं के बीच इस तरह की सार्वजनिक बहस ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की बयानबाजी पार्टी की छवि और उसकी रणनीतिक स्थिति पर असर डाल सकती है।
फिलहाल यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस आंतरिक विवाद को कैसे संभालता है और क्या इस मतभेद को सुलझाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाता है या यह मुद्दा आगे भी चर्चा का विषय बना रहता है।





