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Jails में उम्रदराज कैदियों को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने दिए नए निर्देश

Ratna Netam
16 July 2026 8:35 PM IST
Jails  में उम्रदराज कैदियों को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने दिए नए निर्देश
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New Delhi नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार कैदियों की समय से पहले रिहाई को लेकर तीन महीने के भीतर एक व्यापक नीति तैयार करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी नीति में रिहाई के पात्र कैदियों के लिए स्पष्ट मानदंड और पूरी प्रक्रिया का उल्लेख होना चाहिए, ताकि मानवीय आधार पर मामलों का निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से निपटारा किया जा सके।

जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। अदालत ने कहा कि बुजुर्ग और असाध्य बीमारियों से पीड़ित कैदियों के मामलों पर संवेदनशीलता के साथ विचार किया जाना चाहिए। ऐसे कैदियों की शारीरिक स्थिति और मानवीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समय से पहले रिहाई की व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाना जरूरी है।

दरअसल, इस मामले में राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (नालसा) की ओर से याचिका दायर की गई थी। याचिका में 70 वर्ष से अधिक उम्र के और गंभीर या असाध्य बीमारियों से जूझ रहे कैदियों की समय से पहले रिहाई की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि उम्रदराज और गंभीर रूप से बीमार कैदियों के मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर फैसला सुनाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के अंदर संबंधित नीति तैयार करें और उसे आधिकारिक रूप से अधिसूचित करें। कोर्ट ने कहा कि नीति में यह स्पष्ट होना चाहिए कि किन परिस्थितियों में कैदी समय से पहले रिहाई के पात्र होंगे और इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

अदालत ने यह भी कहा कि नीति तैयार करते समय राज्य सरकारों को अपने संबंधित राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों (एसएलएसए) के साथ मिलकर काम करना चाहिए। इससे प्रशासन और कानूनी सेवा संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होगा और ऐसे कैदियों की पहचान करने में मदद मिलेगी, जो रिहाई के योग्य हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को यह भी निर्देश दिया कि समय से पहले या मानवीय आधार पर रिहाई के लिए आवेदन जमा करने, उनकी समीक्षा करने और निर्णय लेने की प्रक्रिया को पारदर्शी, आसान और समयबद्ध बनाया जाए। अदालत ने कहा कि आवेदन प्रक्रिया में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए और पात्र कैदियों को इसका लाभ मिलना चाहिए।

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जेलों में बंद कैदियों के अधिकारों की रक्षा करना भी कानून व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि अपराध की गंभीरता और अन्य कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है, लेकिन उम्र और गंभीर स्वास्थ्य परिस्थितियों वाले कैदियों के मामलों में मानवीय पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस आदेश के बाद अब सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी-अपनी नीतियां तैयार करनी होंगी। माना जा रहा है कि इससे देशभर में बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों की समय से पहले रिहाई से जुड़े मामलों में एक समान व्यवस्था विकसित हो सकेगी।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को जेल सुधार और कैदियों के मानवीय अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब राज्यों की जिम्मेदारी होगी कि वे तय समय सीमा के भीतर नीति बनाकर उसे लागू करें और पात्र कैदियों के मामलों पर निष्पक्ष तरीके से विचार करें।

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