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मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक तमिलनाडु सरकार को राहत

Ratna Netam
14 Aug 2026 4:23 PM IST
मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक तमिलनाडु सरकार को राहत
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नई दिल्ली : करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के पात्र परिजनों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत मिल गई है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के अमल पर रोक लगा दी, जिसके माध्यम से राज्य सरकार की नीति को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद पीड़ित परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया फिलहाल आगे बढ़ सकेगी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए अंतरिम आदेश पारित किया। राज्य सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ के 27 जुलाई के फैसले को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए हाईकोर्ट के आदेश के प्रभाव पर फिलहाल रोक लगा दी है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित परिवारों को नौकरी देने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दिए जाने पर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने एक दुखद त्रासदी के बाद प्रभावित परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने की पेशकश की थी। अदालत ने पूछा कि त्रासदी में किसी परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की मृत्यु हो जाए तो उसके बेटे या बेटी को रोजगार उपलब्ध कराने में क्या परेशानी है।
तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी अदालत में पेश हुए। सरकार की तरफ से दलील दी गई कि प्रभावित परिवारों को रोजगार देने का फैसला कार्यपालिका की नीति के तहत लिया गया था। सरकार ने इसे संविधान के अनुच्छेद 162 के अंतर्गत प्राप्त कार्यकारी शक्तियों के आधार पर उठाया गया पुनर्वास और राहत का कदम बताया।
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने इससे पहले करूर भगदड़ में मारे गए लोगों के परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति देने वाली नीति को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक रोजगार को केवल सहानुभूति या मुआवजे के रूप में नहीं बांटा जा सकता। सरकारी नौकरी में नियुक्ति संवैधानिक प्रावधानों, निर्धारित प्रक्रिया और योग्यता के अनुसार होनी चाहिए।
हाईकोर्ट का यह भी कहना था कि अनुकंपा नियुक्ति सामान्यतः उस सरकारी कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देने के लिए होती है, जिसकी सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है। इसे प्रत्येक सार्वजनिक दुर्घटना या त्रासदी के बाद सामान्य पुनर्वास योजना के रूप में लागू करने से इसी तरह की दूसरी मांगों का रास्ता खुल सकता है। अदालत ने विभिन्न दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों की परिस्थितियों का भी उल्लेख किया था।
करूर में यह भगदड़ सितंबर 2025 में एक राजनीतिक रैली के दौरान हुई थी। कार्यक्रम में भारी संख्या में समर्थक और प्रशंसक पहुंचे थे। उपलब्ध विवरण के अनुसार, आयोजन स्थल के आसपास करीब 30 हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई थी। अत्यधिक भीड़ और अव्यवस्था के बीच अचानक भगदड़ मच गई, जिसमें 41 लोगों की मौत हो गई थी। मृतकों में आठ बच्चे भी शामिल बताए गए थे। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे।
हादसे के बाद तमिलनाडु सरकार ने पीड़ित परिवारों की आर्थिक सहायता और पुनर्वास के लिए कई कदम उठाने की बात कही थी। इसी क्रम में पात्र परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी देने का फैसला किया गया। इसके तहत 31 परिजनों को नियुक्ति देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई थी। इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई, जिसके बाद मद्रास हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा आदेश केवल अंतरिम राहत है। शीर्ष अदालत ने अभी तमिलनाडु सरकार की नीति की अंतिम संवैधानिक वैधता तय नहीं की है। मामले में संबंधित पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अंतिम फैसला सुनाया जाएगा। फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगने से राज्य सरकार और पीड़ित परिवारों को राहत मिली है।
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