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रेलवे को बुलेट ट्रेन के पुर्जों में आत्मनिर्भर बनाने की सिफारिश

nidhi
11 Aug 2026 7:19 AM IST
रेलवे को बुलेट ट्रेन के पुर्जों में आत्मनिर्भर बनाने की सिफारिश
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बुलेट ट्रेन के लिए विदेशी पुर्जों पर निर्भरता घटाए रेलवे संसदीय समिति

नई दिल्ली: भारत की महत्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना को लेकर संसदीय समिति ने रेलवे से देश में ही ट्रेन के अधिक से अधिक पुर्जों और उपकरणों का निर्माण बढ़ाने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं में केवल ट्रैक और इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि लंबे समय में ट्रेनसेट, स्पेयर पार्ट्स, इलेक्ट्रिकल सिस्टम और अन्य तकनीकी उपकरणों के मामले में भी भारत को आत्मनिर्भर बनना होगा।

संसदीय समिति ने रेल मंत्रालय से कहा है कि बुलेट ट्रेन परियोजना में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण घटकों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए और आयात पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जाए। समिति की यह सिफारिश ऐसे समय आई है जब मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना के रूप में तेजी से आकार ले रहा है।
बुलेट ट्रेन परियोजना में आत्मनिर्भरता पर जोर
भारत में हाई-स्पीड रेल का अनुभव अभी शुरुआती चरण में है। ऐसे में परियोजना के निर्माण के साथ-साथ तकनीकी क्षमता विकसित करना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संसदीय समिति ने इस बात पर जोर दिया है कि बुलेट ट्रेन के लिए आवश्यक पुर्जों और तकनीकी उपकरणों का उत्पादन देश में बढ़ाया जाए। इससे न केवल आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि भारत में हाई-स्पीड रेल से जुड़ा एक मजबूत औद्योगिक इकोसिस्टम भी तैयार किया जा सकेगा। अगर ट्रेन के पुर्जों का घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो भविष्य में देश में बनने वाली अन्य हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं के लिए भी वही तकनीकी और विनिर्माण क्षमता इस्तेमाल की जा सकेगी।
मुंबई-अहमदाबाद कॉरिडोर पहली बड़ी परीक्षा
भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर है। करीब 508 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर पर हाई-स्पीड ट्रेनें चलाने की योजना है। इस परियोजना में जापान की तकनीकी और वित्तीय सहायता महत्वपूर्ण है। जापान की शिंकानसेन तकनीक दुनिया की सबसे उन्नत हाई-स्पीड रेल प्रणालियों में गिनी जाती है। भारत के लिए यह परियोजना केवल एक रेल लाइन का निर्माण नहीं है। इसके माध्यम से देश हाई-स्पीड रेल के निर्माण, संचालन, रखरखाव और तकनीकी प्रबंधन में विशेषज्ञता हासिल करने की कोशिश कर रहा है। इसी वजह से संसदीय समिति की स्वदेशी पुर्जों पर जोर देने वाली सिफारिश को लंबी अवधि की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
पुर्जों में आत्मनिर्भरता क्यों जरूरी?
हाई-स्पीड ट्रेन सामान्य ट्रेनों की तुलना में कहीं अधिक जटिल तकनीक पर निर्भर करती है। इनमें अत्याधुनिक सिग्नलिंग, संचार प्रणाली, ट्रैक तकनीक, ब्रेकिंग सिस्टम, इलेक्ट्रिकल उपकरण, ट्रेन नियंत्रण प्रणाली, कोच संरचना और कई अन्य महत्वपूर्ण घटक शामिल होते हैं।
यदि इन सभी उपकरणों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़े तो ट्रेन के संचालन और रखरखाव की लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा किसी तकनीकी खराबी या स्पेयर पार्ट की तत्काल आवश्यकता होने पर आयात प्रक्रिया में समय लग सकता है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से ऐसी समस्याओं को कम किया जा सकता है।
'मेक इन इंडिया' को मिलेगा बढ़ावा
संसदीय समिति की सिफारिश केंद्र सरकार की मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की व्यापक नीति के अनुरूप है। रेलवे भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक परिवहन नेटवर्कों में से एक है। अगर रेलवे बड़े पैमाने पर देश में निर्मित उपकरणों और पुर्जों का इस्तेमाल करता है तो इससे घरेलू उद्योगों को बड़ा बाजार मिल सकता है। छोटी और मध्यम औद्योगिक इकाइयां भी हाई-स्पीड रेल सप्लाई चेन का हिस्सा बन सकती हैं। इससे इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, धातु, सॉफ्टवेयर और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में नई कंपनियों के लिए अवसर पैदा हो सकते हैं।
सिर्फ ट्रेन बनाना नहीं, पूरी सप्लाई चेन जरूरी
आत्मनिर्भरता का मतलब केवल ट्रेनसेट को भारत में असेंबल करना नहीं है। बुलेट ट्रेन के पूरे इकोसिस्टम में बड़ी संख्या में अलग-अलग पुर्जे और तकनीकी प्रणालियां शामिल होती हैं। इनमें से कई का स्थानीय निर्माण करना होगा। रेलवे को ऐसे सप्लायर विकसित करने होंगे जो अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को पूरा कर सकें। हाई-स्पीड रेल में छोटी तकनीकी गलती भी गंभीर सुरक्षा समस्या पैदा कर सकती है। इसलिए स्वदेशीकरण के साथ गुणवत्ता नियंत्रण पर भी विशेष ध्यान देना जरूरी होगा।
जापानी तकनीक से सीखने का अवसर
मुंबई-अहमदाबाद परियोजना में जापान की भूमिका भारत के लिए तकनीकी सीख का बड़ा अवसर है।
जापान दशकों से शिंकानसेन हाई-स्पीड रेल प्रणाली का संचालन कर रहा है। इस दौरान उसने ट्रेन डिजाइन, ट्रैक, सिग्नलिंग, सुरक्षा और रखरखाव में अत्यधिक विशेषज्ञता विकसित की है।
भारत इस परियोजना के माध्यम से जापानी तकनीक और कार्यप्रणाली से सीख सकता है। लंबी अवधि में यही तकनीकी ज्ञान भारत में हाई-स्पीड रेल के स्वदेशीकरण की नींव बन सकता है।
रेलवे को घरेलू कंपनियों को जोड़ना होगा
संसदीय समिति की सिफारिश को लागू करने के लिए रेलवे और संबंधित एजेंसियों को घरेलू कंपनियों के साथ अधिक सक्रियता से काम करना होगा। कंपनियों को तकनीकी मानकों की जानकारी, परीक्षण सुविधाएं और आवश्यक प्रमाणन प्रक्रिया उपलब्ध करानी होगी। सरकारी खरीद नीति में भी ऐसे प्रावधान किए जा सकते हैं जिनसे योग्य भारतीय कंपनियों को हाई-स्पीड रेल सप्लाई चेन में शामिल होने का अवसर मिले। इससे भारत में हाई-स्पीड रेल उपकरणों का एक मजबूत घरेलू बाजार विकसित हो सकता है।
रोजगार के नए अवसर
स्वदेशीकरण का एक बड़ा फायदा रोजगार के क्षेत्र में भी हो सकता है। हाई-स्पीड रेल के पुर्जों के निर्माण के लिए इंजीनियर, तकनीशियन, डिजाइन विशेषज्ञ, सॉफ्टवेयर डेवलपर और कुशल श्रमिकों की जरूरत होगी। यदि देश में उत्पादन बढ़ता है तो केवल रेलवे परियोजना से जुड़े प्रत्यक्ष रोजगार ही नहीं, बल्कि ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीन टूल्स और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा हो सकते हैं।
भविष्य की हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं के लिए आधार
भारत में आने वाले वर्षों में कई और हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर विकसित करने की योजना है। यदि पहली परियोजना के दौरान भारत घरेलू स्तर पर आवश्यक तकनीकी क्षमता विकसित कर लेता है तो भविष्य की परियोजनाओं में आयात की जरूरत कम हो सकती है। इससे परियोजनाओं की लागत और समय दोनों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। एक बार घरेलू उद्योग हाई-स्पीड रेल के मानकों के अनुरूप उत्पाद बनाने लगे तो भारत भविष्य में दूसरे देशों को भी रेल उपकरण निर्यात करने की स्थिति में आ सकता है।
गुणवत्ता से समझौता नहीं
आत्मनिर्भरता बढ़ाने की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण चुनौती गुणवत्ता की है। हाई-स्पीड ट्रेनें 250 से 300 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे अधिक की गति से चल सकती हैं। इतनी तेज गति पर इस्तेमाल होने वाले हर उपकरण को अत्यधिक विश्वसनीय होना चाहिए। इसलिए घरेलू पुर्जों को केवल इसलिए प्राथमिकता नहीं दी जा सकती कि वे भारत में बने हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरना होगा। संसदीय समिति की सिफारिश का उद्देश्य भी यही होना चाहिए कि स्वदेशीकरण और उच्च गुणवत्ता दोनों साथ-साथ आगे बढ़ें।
अनुसंधान और विकास पर जोर जरूरी
भारत को हाई-स्पीड रेल में आत्मनिर्भर बनने के लिए अनुसंधान और विकास यानी R&D में निवेश बढ़ाना होगा। विश्वविद्यालयों, IITs, रेलवे की अनुसंधान संस्थाओं और निजी उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाया जा सकता है। नई सामग्री, ऊर्जा दक्षता, ब्रेकिंग सिस्टम, सिग्नलिंग, ट्रैक मॉनिटरिंग और ट्रेन नियंत्रण जैसे क्षेत्रों में भारतीय अनुसंधान क्षमता विकसित की जा सकती है। अगर भारत अपनी जरूरत के अनुरूप तकनीक विकसित करता है तो भविष्य की हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं में विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम हो सकती है।
रखरखाव में भी स्वदेशीकरण महत्वपूर्ण
ट्रेन चलाने के बाद उसका रखरखाव सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है। हाई-स्पीड ट्रेन के स्पेयर पार्ट्स की नियमित जरूरत पड़ सकती है। अगर इन पुर्जों का आयात करना पड़े तो रखरखाव की लागत और समय दोनों बढ़ सकते हैं। घरेलू स्तर पर स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध होने से ट्रेन की सर्विसिंग तेज हो सकती है। इसके अलावा भारतीय तकनीशियनों को खुद सिस्टम की मरम्मत और रखरखाव की विशेषज्ञता हासिल होगी।
सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता
बुलेट ट्रेन परियोजना में सुरक्षा का महत्व सामान्य रेल सेवाओं से कहीं अधिक है। ट्रैक की गुणवत्ता, सिग्नलिंग, ट्रेन कंट्रोल, ब्रेकिंग सिस्टम और संचार व्यवस्था में किसी भी तरह की तकनीकी समस्या गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। इसलिए स्वदेशीकरण की प्रक्रिया में प्रत्येक पुर्जे का परीक्षण और प्रमाणन अनिवार्य होना चाहिए। रेलवे को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता हासिल कर सकें।
भारत के औद्योगिक विकास के लिए अवसर
बुलेट ट्रेन परियोजना को केवल परिवहन परियोजना के रूप में देखना सीमित दृष्टिकोण होगा। इसके जरिए भारत हाई-टेक विनिर्माण में अपनी क्षमता बढ़ा सकता है। एयरोस्पेस, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्र की तरह हाई-स्पीड रेल भी कई उद्योगों को जोड़ने वाला क्षेत्र बन सकता है। एक सफल घरेलू हाई-स्पीड रेल सप्लाई चेन भारत के औद्योगिक आधार को मजबूत कर सकती है।
निर्यात की संभावनाएं
भविष्य में यदि भारत हाई-स्पीड रेल के लिए प्रतिस्पर्धी लागत पर उच्च गुणवत्ता वाले पुर्जे बनाने में सफल होता है तो इनके निर्यात की संभावनाएं भी बन सकती हैं। एशिया, अफ्रीका और अन्य विकासशील देशों में आधुनिक रेल नेटवर्क की मांग बढ़ रही है। भारत पहले से ही कई देशों को रेल उपकरण और इंजीनियरिंग उत्पाद निर्यात करता है। हाई-स्पीड रेल तकनीक में क्षमता बढ़ने के बाद इस बाजार का विस्तार हो सकता है।
रेलवे के लिए बड़ी जिम्मेदारी
संसदीय समिति की सिफारिश के बाद रेल मंत्रालय के सामने अब इसे व्यवहार में लागू करने की चुनौती होगी। घरेलू कंपनियों की पहचान, तकनीकी मानक तय करना, परीक्षण और प्रमाणन व्यवस्था मजबूत करना तथा विदेशी कंपनियों से तकनीकी हस्तांतरण सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण कदम होंगे। रेलवे को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि स्वदेशीकरण केवल आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि वास्तविक तकनीकी क्षमता भारत में विकसित हो।
आत्मनिर्भरता का मतलब तकनीकी क्षमता
किसी उत्पाद को भारत में असेंबल करना और उसके महत्वपूर्ण हिस्सों का निर्माण भारत में करना दो अलग बातें हैं। सच्ची आत्मनिर्भरता तब होगी जब भारतीय कंपनियां हाई-स्पीड ट्रेन के महत्वपूर्ण सिस्टम का डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और रखरखाव खुद करने में सक्षम हों। इस दिशा में धीरे-धीरे स्थानीयकरण का प्रतिशत बढ़ाना अधिक व्यावहारिक रणनीति हो सकती है।
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