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नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद और संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी (कम्युनिकेशन एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि कुछ डिजिटल मंच ऐसे कंटेंट को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसे उन्होंने "सरकार-विरोधी" और "लोकतंत्र-विरोधी" बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि दूसरी ओर यही प्लेटफॉर्म महिलाओं और बच्चों से जुड़े गैर-कानूनी और आपत्तिजनक कंटेंट पर प्रभावी रोक लगाने में विफल साबित हुए हैं।
मंगलवार को दिए गए अपने बयान में दुबे ने कहा कि संसदीय स्थायी समिति ने सर्वसम्मति से यह सिफारिश की है कि यदि सोशल मीडिया कंपनियां भारत के कानूनों और नियमों का पालन नहीं करती हैं, तो उन्हें सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत मिलने वाली "सेफ हार्बर" (Safe Harbour) सुरक्षा समाप्त कर दी जानी चाहिए। उनका कहना था कि भारत में कारोबार करने वाली सभी डिजिटल कंपनियों के लिए देश के कानूनों का पालन करना अनिवार्य होना चाहिए।
दुबे ने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते। उन्होंने आरोप लगाया कि कई प्लेटफॉर्म ऐसी सामग्री को तेजी से प्रसारित होने देते हैं, जो समाज में भ्रम, तनाव या संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा कर सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से जुड़ी अवैध सामग्री को हटाने में कई कंपनियां अपेक्षित तत्परता नहीं दिखाती हैं, जो गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि संसदीय समिति ने विभिन्न पक्षों से विचार-विमर्श के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि किसी सोशल मीडिया कंपनी द्वारा भारतीय कानूनों का उल्लंघन किया जाता है या कानूनी निर्देशों का पालन नहीं किया जाता, तो उसे मिलने वाली "सेफ हार्बर" की कानूनी सुरक्षा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि कानून का सम्मान किए बिना किसी भी डिजिटल मंच को विशेष कानूनी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
क्या है 'सेफ हार्बर' सुरक्षा?
"सेफ हार्बर" सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मिलने वाला एक कानूनी प्रावधान है, जिसके अंतर्गत सोशल मीडिया कंपनियों और अन्य ऑनलाइन मध्यस्थों (Intermediaries) को उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए सीमित कानूनी सुरक्षा प्राप्त होती है। हालांकि यह सुरक्षा कुछ शर्तों के साथ आती है। यदि कोई प्लेटफॉर्म सरकार द्वारा निर्धारित नियमों, उचित सावधानी (Due Diligence) और कानूनी निर्देशों का पालन नहीं करता, तो वह इस सुरक्षा का अधिकार खो सकता है और उस पर संबंधित सामग्री के लिए कानूनी जवाबदेही तय की जा सकती है।
दुबे ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्मों की भूमिका लगातार बढ़ रही है और करोड़ों भारतीय नागरिक इन माध्यमों का उपयोग सूचना, संवाद और व्यवसाय के लिए करते हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि इन कंपनियों की जवाबदेही भी स्पष्ट हो और वे भारतीय कानूनों का पूरी तरह पालन करें। उन्होंने कहा कि संसदीय समिति का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्मों को अधिक उत्तरदायी और कानून के प्रति जवाबदेह बनाना है।
उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को अपने कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम को अधिक प्रभावी बनाना चाहिए ताकि महिलाओं, बच्चों और अन्य संवेदनशील वर्गों के खिलाफ गैर-कानूनी सामग्री को समय रहते हटाया जा सके। उनका कहना था कि यदि कंपनियां तकनीकी रूप से करोड़ों पोस्ट और वीडियो का विश्लेषण कर सकती हैं, तो वे अवैध और आपत्तिजनक सामग्री को रोकने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था विकसित कर सकती हैं।
हाल के वर्षों में भारत सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों के बीच कंटेंट मॉडरेशन, फेक न्यूज, राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा संरक्षण और उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता जैसे मुद्दों पर कई बार मतभेद सामने आए हैं। सरकार का कहना रहा है कि सभी डिजिटल मंचों को भारतीय कानूनों और सूचना प्रौद्योगिकी नियमों का पालन करना चाहिए, जबकि कई कंपनियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैश्विक संचालन संबंधी नीतियों का भी हवाला देती रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि "सेफ हार्बर" सुरक्षा को लेकर चल रही बहस का डिजिटल उद्योग पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। यदि किसी कंपनी की यह कानूनी सुरक्षा समाप्त होती है, तो उपयोगकर्ताओं द्वारा साझा की गई सामग्री के संबंध में उसकी कानूनी जिम्मेदारी बढ़ सकती है। इससे कंटेंट मॉडरेशन नीतियों, अनुपालन प्रक्रियाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के संचालन पर भी असर पड़ने की संभावना है।
संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होतीं, लेकिन नीति निर्माण की प्रक्रिया में इन्हें महत्वपूर्ण माना जाता है। सरकार इन सिफारिशों पर विचार करने के बाद आवश्यक कानूनी या नीतिगत कदम उठा सकती है।
फिलहाल निशिकांत दुबे के इस बयान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल नियमन को लेकर बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार संसदीय समिति की सिफारिशों पर क्या निर्णय लेती है और सोशल मीडिया कंपनियां भारतीय कानूनों के अनुपालन को लेकर क्या कदम उठाती हैं।





