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रेल सुरक्षा को मिलेगी मजबूती कवच 4.0 पर बड़ा फैसला

Ratna Netam
19 Sept 2026 10:13 PM IST
रेल सुरक्षा को मिलेगी मजबूती कवच 4.0 पर बड़ा फैसला
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नई दिल्ली। भारतीय रेलवे ने यात्रियों की सुरक्षा को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा फैसला लिया है। रेलवे ने उत्तर पूर्व रेलवे के लखनऊ मंडल में स्वदेशी ट्रेन सुरक्षा प्रणाली ‘कवच 4.0’ लगाने के लिए 252 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी दे दी है। इसके तहत लखनऊ मंडल के 607.7 रूट किलोमीटर में कवच वर्जन 4.0 का विस्तार किया जाएगा।रेल मंत्रालय ने शनिवार, 19 सितंबर को इसकी जानकारी देते हुए कहा कि मंजूर परियोजना के तहत लखनऊ मंडल के उन चिन्हित शेष रेल खंडों को कवच 4.0 के दायरे में लाया जाएगा, जहां अभी यह सुरक्षा प्रणाली उपलब्ध नहीं है। इससे ट्रेन संचालन के दौरान सुरक्षा की एक अतिरिक्त तकनीकी परत तैयार होगी।रेलवे का यह फैसला देशभर में कवच नेटवर्क के तेजी से विस्तार की रणनीति का हिस्सा है। कवच एक स्वदेशी Automatic Train Protection यानी ATP प्रणाली है, जिसे ट्रेन संचालन के दौरान मानवीय चूक से पैदा होने वाले कुछ जोखिमों को कम करने के लिए विकसित किया गया है।
607.7 किलोमीटर में लगेगा कवच 4.0
रेलवे की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के मुताबिक नई परियोजना उत्तर पूर्व रेलवे के लखनऊ मंडल के 607.7 रूट किलोमीटर को कवर करेगी।इसके लिए कुल 252 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं।रेलवे का कहना है कि कवच 4.0 का विस्तार होने से इन रेल मार्गों पर उपलब्ध सुरक्षा ढांचा मजबूत होगा। कवच ट्रेन की गतिविधियों की निगरानी करता है और जरूरत पड़ने पर स्वचालित रूप से हस्तक्षेप कर सकता है।यह व्यवस्था विशेष रूप से उस स्थिति में मदद करती है जब लोको पायलट किसी कारण से निर्धारित सुरक्षा निर्देश के मुताबिक समय पर कार्रवाई नहीं कर पाता।
क्या है रेलवे का कवच सिस्टम?
कवच भारत में विकसित Automatic Train Protection सिस्टम है। इसका उद्देश्य लोको पायलट को सुरक्षित तरीके से ट्रेन चलाने में तकनीकी सहायता देना और कुछ गंभीर परिचालन जोखिमों को कम करना है।रेल मंत्रालय के मुताबिक कवच Signal Passing at Danger यानी SPAD जैसी स्थिति को रोकने में मदद करता है। SPAD उस स्थिति को कहा जाता है जब कोई ट्रेन रुकने के संकेत वाले सिग्नल को पार करने की स्थिति में पहुंच जाए।ऐसी परिस्थिति में कवच जरूरत के अनुसार ट्रेन के ब्रेक स्वचालित रूप से लगा सकता है।इसके अलावा यह ट्रेन की गति और परिचालन परिस्थितियों की निगरानी कर सुरक्षा बढ़ाने में सहायता करता है।कवच का उद्देश्य लोको पायलट की जगह लेना नहीं बल्कि उसे एक अतिरिक्त तकनीकी सुरक्षा प्रणाली उपलब्ध कराना है।
खुद ब्रेक लगा सकता है कवच
कवच की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में स्वचालित ब्रेकिंग शामिल है।अगर ट्रेन निर्धारित गति सीमा से ज्यादा चल रही है और लोको पायलट आवश्यक कार्रवाई नहीं करता तो सिस्टम हस्तक्षेप कर सकता है।इसी तरह खतरे की स्थिति में कवच ट्रेन की गति नियंत्रित करने और जरूरत पड़ने पर ब्रेक लगाने में सहायता करता है।रेलवे के मुताबिक खराब मौसम जैसी परिस्थितियों में भी यह सुरक्षित ट्रेन संचालन में मदद करता है।हालांकि कवच को हर तरह की रेल दुर्घटना रोकने वाली तकनीक समझना सही नहीं होगा। रेलवे सुरक्षा ट्रैक, सिग्नलिंग, रोलिंग स्टॉक, मानवीय संचालन, रखरखाव और कई अन्य व्यवस्थाओं पर भी निर्भर करती है।
कवच 4.0 में क्या है खास?
रेलवे ने पुराने संस्करणों से मिले अनुभव के आधार पर कवच में कई तकनीकी सुधार किए हैं।कवच वर्जन 4.0 को रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन यानी RDSO ने जुलाई 2024 में मंजूरी दी थी।इस संस्करण में लोकेशन की सटीकता बढ़ाई गई है। बड़े रेलवे यार्ड में सिग्नल से संबंधित जानकारी को बेहतर बनाया गया है।इसके अलावा स्टेशन से स्टेशन कवच इंटरफेस के लिए ऑप्टिकल फाइबर केबल और मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम के साथ सीधे इंटरफेस जैसी सुविधाओं में सुधार किया गया है।इन तकनीकी बदलावों के बाद रेलवे ने कवच 4.0 को बड़े स्तर पर नेटवर्क में लागू करना शुरू किया है।
पहले से हजारों किलोमीटर में पहुंच चुका कवच 4.0
भारतीय रेलवे पिछले कुछ वर्षों से कवच का तेजी से विस्तार कर रहा है।रेल मंत्रालय के 5 अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक 31 जुलाई तक कवच 4.0 को कुल 2,633 रूट किलोमीटर पर सफलतापूर्वक चालू किया जा चुका था।इसमें दिल्ली-मुंबई रूट के 1,423 रूट किलोमीटर और दिल्ली-हावड़ा रूट के 1,210 रूट किलोमीटर शामिल थे।दिल्ली-मुंबई कॉरिडोर पर तिलक ब्रिज-जंक्शन केबिन-पलवल-मथुरा-कोटा-नागदा-रतलाम-वडोदरा-विरार सेक्शन और वडोदरा-अहमदाबाद सेक्शन जैसे हिस्से इसके दायरे में आ चुके हैं।दिल्ली-हावड़ा कॉरिडोर पर भी कई महत्वपूर्ण सेक्शन में कवच 4.0 चालू किया गया है।अब लखनऊ मंडल में 607.7 रूट किलोमीटर की नई मंजूरी इस नेटवर्क को और आगे बढ़ाएगी।
कानपुर-लखनऊ सेक्शन पर पहले से कवच
रेल मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली-हावड़ा कॉरिडोर के तहत कानपुर-लखनऊ के करीब 71 रूट किलोमीटर हिस्से में कवच 4.0 पहले से चालू किया जा चुका है।नई ₹252 करोड़ की परियोजना लखनऊ मंडल के शेष चिन्हित हिस्सों को कवर करने के लिए है।इसलिए नई मंजूरी का अर्थ यह नहीं है कि पूरे लखनऊ क्षेत्र में कवच पहली बार लगाया जा रहा है। इसका उद्देश्य उन बाकी हिस्सों में सुरक्षा प्रणाली पहुंचाना है जिन्हें परियोजना में चिन्हित किया गया है।
कैसे काम करता है कवच?
कवच केवल ट्रेन के इंजन में लगाया जाने वाला एक उपकरण नहीं है। इसे काम करने के लिए ट्रैक, स्टेशन, सिग्नलिंग और लोकोमोटिव स्तर पर अलग-अलग उपकरणों का नेटवर्क तैयार करना पड़ता है।रेलवे के मुताबिक इसके कार्यान्वयन में प्रत्येक स्टेशन और ब्लॉक सेक्शन में स्टेशन कवच, रेलवे ट्रैक पर RFID टैग, टेलीकॉम टावर, ट्रैक के साथ ऑप्टिकल फाइबर केबल और लोकोमोटिव में लोको कवच जैसी व्यवस्थाएं शामिल होती हैं।ये सभी घटक आपस में मिलकर ट्रेन की स्थिति और परिचालन से संबंधित जानकारी का आदान-प्रदान करते हैं।इसी वजह से कवच का विस्तार केवल इंजन में उपकरण लगाने तक सीमित नहीं होता बल्कि पूरे रेल सेक्शन में आवश्यक डिजिटल और सिग्नलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना पड़ता है।
रेलवे सुरक्षा पर लगातार बढ़ रहा निवेश
कवच के साथ भारतीय रेलवे सिग्नलिंग और दूसरे सुरक्षा ढांचे को भी आधुनिक बनाने में निवेश कर रहा है।19 सितंबर को रेलवे ने चार अलग-अलग परियोजनाओं के लिए कुल करीब ₹736 करोड़ की मंजूरी दी। इनमें लखनऊ मंडल में ₹252 करोड़ का कवच 4.0 प्रोजेक्ट सबसे बड़ा है।इसके अलावा मध्य रेलवे के सोलापुर मंडल के सात स्टेशनों पर इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग लगाने के लिए ₹209 करोड़ स्वीकृत किए गए हैं।आंध्र प्रदेश में सावल्यापुरम-गुंटूर के 73 रूट किलोमीटर सेक्शन पर इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन सिस्टम को 2x25 kV में अपग्रेड करने के लिए ₹142 करोड़ और गुजरात में उधना-उकाई सोनगढ़ सेक्शन पर चार लेन रोड ओवर ब्रिज के लिए करीब ₹133 करोड़ मंजूर किए गए हैं।
सोलापुर में भी आधुनिक सिग्नलिंग
सोलापुर मंडल में जिन सात स्टेशनों पर इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम लगाने की मंजूरी मिली है, उनमें मोहोल, मुंढेवाड़ी, बाले, सोलापुर, होटगी जंक्शन-होटगी ए केबिन, शाहाबाद और वाडी जंक्शन शामिल हैं।
इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग एक कंप्यूटर आधारित आधुनिक सिग्नलिंग व्यवस्था है, जो परंपरागत रिले आधारित प्रणाली की जगह लेती है।यह पॉइंट और सिग्नल के अधिक विश्वसनीय नियंत्रण, खराबी की जल्दी पहचान और रखरखाव को बेहतर बनाने में मदद करती है।इस तरह की आधुनिक सिग्नलिंग व्यवस्था कवच के क्रियान्वयन के लिए भी महत्वपूर्ण आधार तैयार करती है।
पहले मुरादाबाद मंडल के लिए भी मिली थी मंजूरी
लखनऊ से पहले रेलवे ने 1 सितंबर 2026 को उत्तर रेलवे के मुरादाबाद मंडल के शेष 712 रूट किलोमीटर में कवच 4.0 लगाने के लिए ₹170 करोड़ की मंजूरी दी थी।रेल मंत्रालय ने उस समय कहा था कि परियोजना से मंडल में स्वदेशी Automatic Train Protection सिस्टम के जरिए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी।लखनऊ मंडल के लिए अब ₹252 करोड़ की नई मंजूरी यह दिखाती है कि रेलवे अलग-अलग जोन और मंडलों में चरणबद्ध तरीके से कवच का विस्तार कर रहा है।
यात्रियों को क्या फायदा होगा?
यात्रियों के नजरिए से इस परियोजना का मुख्य लाभ रेल परिचालन की सुरक्षा व्यवस्था में अतिरिक्त तकनीकी सुरक्षा परत जुड़ना है।कवच सिग्नल को खतरे की स्थिति में पार करने से रोकने, जरूरत पड़ने पर स्वचालित ब्रेक लगाने और ट्रेन की गति पर निगरानी रखने में सहायता करता है।इससे लोको पायलट को भी अतिरिक्त तकनीकी सहायता मिलती है।लेकिन किसी खास मार्ग पर कवच लगाने से दुर्घटना का जोखिम पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। रेलवे सुरक्षा के लिए ट्रैक और पुलों का रखरखाव, सिग्नलिंग, ट्रेन की तकनीकी स्थिति और कर्मचारियों का प्रशिक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
स्वदेशी तकनीक के विस्तार पर जोर
कवच को रेलवे ने जुलाई 2020 में राष्ट्रीय Automatic Train Protection सिस्टम के रूप में अपनाया था। इससे पहले फरवरी 2016 में यात्री ट्रेनों पर इसके फील्ड ट्रायल शुरू हुए थे।इसके बाद अलग-अलग संस्करणों में तकनीकी सुधार किए गए और जुलाई 2024 में कवच 4.0 को मंजूरी मिली।अब रेलवे का फोकस इसे प्रमुख और अधिक यातायात वाले रेल मार्गों से आगे दूसरे सेक्शन तक पहुंचाने पर है।लखनऊ मंडल के 607.7 रूट किलोमीटर के लिए ₹252 करोड़ की मंजूरी इसी प्रक्रिया की नई कड़ी है। परियोजना पूरी होने के बाद उत्तर पूर्व रेलवे के संबंधित सेक्शनों पर ट्रेन संचालन को स्वदेशी Automatic Train Protection तकनीक की अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी।
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