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चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

Ratna Netam
24 Oct 2026 2:42 PM IST
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
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नई दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के कामकाज और उसकी आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। याचिका में चुनाव आयोग के भीतर कथित संस्थागत कमियों और प्रशासनिक अनियमितताओं की जांच के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई है। प्रस्तावित समिति की अध्यक्षता भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सौंपने का सुझाव दिया गया है। इस याचिका के बाद चुनाव आयोग की पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता से जुड़े सवाल एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं।
अधिवक्ता विशाल तिवारी ने दाखिल की याचिका
सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका अधिवक्ता विशाल तिवारी ने दाखिल की है। इसमें निर्वाचन आयोग के कामकाज की स्वतंत्र समीक्षा कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान में निर्णय लेने की प्रक्रिया पारदर्शी और सामूहिक होनी चाहिए।याचिका में स्पष्ट किया गया है कि इसका उद्देश्य किसी विशेष राजनीतिक दल या पदाधिकारी के खिलाफ निष्कर्ष निकलवाना नहीं है। इसके अलावा किसी चुनाव परिणाम को चुनौती देने की भी मांग नहीं की गई है। याचिका का मुख्य उद्देश्य निर्वाचन प्रणाली में जनता का विश्वास मजबूत करना और भविष्य में संभावित संस्थागत कमियों को दूर करना बताया गया है।
धार्मिक प्रतीकों और नफरत भरे भाषणों पर रोक की मांग
याचिका में चुनाव प्रचार के दौरान धार्मिक पहचान, धार्मिक प्रतीकों और सांप्रदायिक अपीलों के इस्तेमाल को रोकने के लिए चुनाव आयोग को सख्त निर्देश देने की मांग की गई है।याचिकाकर्ता ने कहा है कि राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को धर्म या समुदाय के आधार पर मतदाताओं को प्रभावित करने वाली अपीलों तथा नफरत फैलाने वाले भाषणों से रोका जाना चाहिए। इसके लिए आयोग को प्रभावी नियम लागू करने और उनका पालन सुनिश्चित कराने का निर्देश देने की मांग की गई है।
दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों का जिक्र
याचिका में 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों के दौरान कम से कम 14 अवसरों पर कुछ फैसलों के संबंध में लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं।रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के स्तर पर कुछ फैसले कथित तौर पर अन्य आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना लिए गए। इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस का केंद्रीकरण और पश्चिम बंगाल में अपील संबंधी फैसले शामिल बताए गए हैं।हालांकि, चुनाव आयोग पहले ही इन दावों पर स्पष्टीकरण दे चुका है। आयोग के अनुसार, आंतरिक टिप्पणियां और सुझाव निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं तथा महत्वपूर्ण फैसले सामूहिक रूप से लिए गए हैं।
पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची का मुद्दा भी उठाया
याचिका में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित लंबित अपीलों का मुद्दा भी उठाया गया है।याचिका में उद्धृत रिपोर्टों के अनुसार, मतदाता सूची से बाहर किए गए व्यक्तियों की लगभग 38.20 लाख अपीलें दाखिल हुई थीं, जिनमें से करीब 1.02 लाख का निस्तारण हुआ था। इन आंकड़ों के आधार पर याचिकाकर्ता ने मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया की प्रभावशीलता और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।इसके अलावा महाराष्ट्र की प्रारूप मतदाता सूची में तकनीकी गड़बड़ी के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं की उम्र असामान्य रूप से अधिक दर्ज होने की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया है।
विशेषज्ञ समिति में कई क्षेत्रों के जानकार शामिल करने का प्रस्ताव
याचिका में प्रस्तावित स्वतंत्र समिति में संवैधानिक कानून, चुनाव प्रशासन, सांख्यिकी, प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण के विशेषज्ञों को शामिल करने का सुझाव दिया गया है।याचिकाकर्ता का मानना है कि इस तरह की समिति आयोग की प्रशासनिक व्यवस्था और तकनीकी प्रक्रियाओं का व्यापक परीक्षण कर सकती है। इससे चुनावी प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के उपाय सामने आ सकते हैं।अब इस जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल याचिका में लगाए गए आरोप न्यायिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं। अदालत के रुख से स्पष्ट होगा कि चुनाव आयोग के कामकाज की स्वतंत्र समीक्षा के लिए किसी समिति के गठन की आवश्यकता है या नहीं।
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