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चुनाव आयोग में कथित एकतरफा फैसलों पर सवाल CEC के खिलाफ जांच की मांग
Ratna Netam
25 Sept 2026 6:20 PM IST

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नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित तौर पर वैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में CEC के अलावा चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। याचिका में लगाए गए आरोप अभी अदालत में साबित नहीं हुए हैं और सुप्रीम कोर्ट ने इनके गुण-दोष पर कोई निर्णय नहीं दिया है।यह याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग, चुनाव आयोग की महानिदेशक (आईटी) सीमा खन्ना और अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत शिकायत दर्ज कर अभियोजन शुरू करने के निर्देश देने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने इन अधिकारियों पर आधिकारिक कर्तव्यों के कथित उल्लंघन का आरोप लगाया है।
याचिका में चुनाव आयोग की ओर से SIR के दौरान लिए गए कुछ फैसलों पर सवाल उठाए गए हैं। इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में बदलाव, ECINet के माध्यम से मतदाता सूची के डेटा के कथित केंद्रीकरण और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया शामिल है। याचिकाकर्ता का दावा है कि इन कदमों के कारण कुछ योग्य मतदाता भी मतदाता सूची से बाहर हो गए।मामले का एक प्रमुख आधार 23 सितंबर को प्रकाशित ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच रिपोर्ट है। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग के विभिन्न फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इनमें कुछ फैसले ऐसे थे जिनके बारे में दोनों चुनाव आयुक्तों ने कहा कि उन्हें जानकारी नहीं दी गई या उनकी सहमति नहीं ली गई।
रिपोर्ट के अनुसार इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, SIR से जुड़े मामलों में अपील तथा चुनावी डेटा की सुरक्षा और नियंत्रण जैसे विषयों से था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सहित संबंधित अधिकारियों को भेजी गई थीं।Form-6 में किए गए बदलाव इस विवाद के प्रमुख मुद्दों में से एक हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक नए मतदाता के आवेदन में SIR से संबंधित सवाल जोड़े गए थे। आवेदकों से पूछा जा रहा था कि उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि नियमों में आवश्यक संशोधन के बिना Form-6 में इस तरह बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। सुखबीर सिंह संधू ने भी बाद में इसे कथित तौर पर “अनधिकृत और अवैध” बताते हुए हटाने की बात कही थी।
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा मतदाता सूची के डिजिटल डेटा तक पहुंच का है। रिपोर्ट में कहा गया कि चुनाव आयुक्तों ने ECINet और इससे पहले इस्तेमाल होने वाले ERONet के जरिए मतदाता सूची के नियंत्रण के कथित केंद्रीकरण पर चिंता जताई थी। सामान्य व्यवस्था में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी ERO अपने निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करने और उसमें आवश्यक बदलाव करने के लिए वैधानिक रूप से जिम्मेदार होते हैं।रिपोर्ट के अनुसार विवेक जोशी ने मई में मतदाता सूची डेटाबेस के “क्रमिक केंद्रीकरण” पर सवाल उठाते हुए ऑडिट की जरूरत बताई थी। वहीं अगस्त में सुखबीर सिंह संधू ने कथित तौर पर कहा था कि राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों से उन्हें यह जानकारी मिली कि उन्हें डिजिटल सिस्टम तक पर्याप्त और पूर्ण पहुंच नहीं मिल रही है।
याचिका में चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी मुद्दा बनाया गया है। इंडियन एक्सप्रेस की जांच के अनुसार 9 सितंबर को CEC और दोनों चुनाव आयुक्तों की बैठक हुई थी और यह चार महीने से अधिक समय में आयोग की पहली पूर्ण बैठक थी। याचिकाकर्ता ने इसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया है कि इस दौरान कई आदेश एकतरफा तरीके से जारी किए गए।कानूनी रूप से चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्त निर्णय प्रक्रिया में शामिल होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुसार आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। मतभेद होने की स्थिति में फैसला बहुमत की राय के अनुसार किया जाता है।
याचिका में SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) या न्यायिक जांच की मांग भी की गई है। साथ ही याचिकाकर्ता ने कथित रूप से अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए फैसलों को वापस लेने की मांग की है।याचिका में गोवा से जुड़े घटनाक्रम का भी संदर्भ है। इंडियन एक्सप्रेस की जांच के अनुसार वहां 97 मतदाताओं को स्थानीय ERO ने दस्तावेजों की जांच के बाद योग्य पाया था, लेकिन डिजिटल सिस्टम में पहले की कार्रवाई को वापस लेने का विकल्प समय पर उपलब्ध नहीं होने के कारण वे अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए। रिपोर्ट में कहा गया कि गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने संबंधित चुनाव आयोग अधिकारियों को इस संबंध में कई बार लिखा था।
हालांकि यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मीडिया रिपोर्ट में दर्ज आंतरिक आपत्तियां और सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में लगाए गए आरोप अपने आप में CEC या अन्य अधिकारियों की आपराधिक जिम्मेदारी साबित नहीं करते। अभियोजन शुरू करने, जांच कराने या किसी फैसले को रद्द करने की मांग पर अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।इस मामले ने चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, SIR, मतदाता पंजीकरण और चुनावी डेटाबेस के प्रबंधन को लेकर चल रही बहस को और तेज कर दिया है। अब सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के जरिए याचिकाकर्ता ने इन मुद्दों की न्यायिक जांच और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है। आगे अदालत इस याचिका को किस तरह सुनती है और संबंधित पक्षों से क्या जवाब मांगती है, इस पर नजर रहेगी।
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