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नई दिल्ली। रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को समाप्त कराने के लिए भारत और चीन ने समाधान तलाशने में सहयोग की पेशकश की है। नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अपनी अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकों में इस विषय पर चर्चा की। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव के अनुसार, दोनों नेताओं ने यूक्रेन संकट का समाधान खोजने में सक्रिय मदद की पेशकश की, जिसका पुतिन ने स्वागत किया।
पेस्कोव ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी ने द्विपक्षीय बातचीत के दौरान यूक्रेन से संबंधित स्थिति के शांतिपूर्ण समाधान में गहरी रुचि दिखाई। उन्होंने पुतिन के सामने मध्यस्थता और समाधान की दिशा में सहायता देने का प्रस्ताव रखा। क्रेमलिन प्रवक्ता के मुताबिक, रूसी राष्ट्रपति ने दोनों नेताओं की पेशकश का सकारात्मक रूप से स्वागत किया।
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान हुई यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि भारत और चीन दोनों रूस के साथ मजबूत संबंध रखते हैं। भारत ने युद्ध शुरू होने के बाद से लगातार संवाद और कूटनीति के जरिए समाधान की बात कही है। प्रधानमंत्री मोदी विभिन्न अवसरों पर कह चुके हैं कि युद्ध के मैदान में स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता और सभी पक्षों को बातचीत के रास्ते पर लौटना चाहिए।
चीन भी रूस और यूक्रेन के बीच राजनीतिक समाधान की वकालत करता रहा है। बीजिंग ने युद्धविराम, बातचीत और सुरक्षा चिंताओं के समाधान से जुड़े अपने विचार पहले भी सामने रखे हैं। हालांकि, चीन की भूमिका और रूस के साथ उसके संबंधों को लेकर पश्चिमी देशों में सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद ब्रिक्स सम्मेलन में शी चिनपिंग की मध्यस्थता की पेशकश को राजनयिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
भारत की स्थिति रूस और पश्चिमी देशों के बीच संतुलन बनाए रखने वाली रही है। नई दिल्ली ने रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक संबंध जारी रखे हैं, वहीं यूक्रेन को मानवीय सहायता भी उपलब्ध कराई है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर, देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर जोर देते हुए हिंसा समाप्त करने की अपील की है।
प्रधानमंत्री मोदी की पुतिन से बातचीत में युद्ध के मानवीय प्रभाव और शांतिपूर्ण समाधान की जरूरत पर चर्चा होने की जानकारी सामने आई है। भारत का कहना रहा है कि संघर्ष का असर केवल युद्ध में शामिल देशों तक सीमित नहीं है। इससे खाद्य, ऊर्जा और उर्वरक की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होती है, जिसका सबसे अधिक असर विकासशील तथा गरीब देशों पर पड़ता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को कई स्तरों पर प्रभावित किया है। ऊर्जा की कीमतों, अनाज आपूर्ति, व्यापारिक मार्गों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों पर इसके परिणाम दिखाई दिए हैं। ऐसे में भारत और चीन जैसे बड़े देशों की शांति प्रक्रिया में संभावित भागीदारी पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर रहेगी।
दिमित्री पेस्कोव के बयान से संकेत मिलता है कि रूस ने दोनों देशों की सहायता की पेशकश को खारिज नहीं किया है। हालांकि, मध्यस्थता का वास्तविक स्वरूप क्या होगा, बातचीत किस मंच पर आगे बढ़ेगी और इसमें यूक्रेन की सहमति होगी या नहीं, इन सवालों पर अभी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। किसी भी औपचारिक शांति प्रक्रिया के लिए संघर्ष से जुड़े दोनों प्रमुख पक्षों की भागीदारी आवश्यक होगी।
क्रेमलिन की प्रतिक्रिया केवल रूस का पक्ष प्रस्तुत करती है। यूक्रेन की ओर से भारत और चीन की कथित मध्यस्थता पेशकश पर तत्काल आधिकारिक प्रतिक्रिया की जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए इस पहल को फिलहाल एक प्रारंभिक कूटनीतिक प्रस्ताव के रूप में देखा जा रहा है। इसे औपचारिक मध्यस्थता प्रक्रिया मानना जल्दबाजी होगी।
भारत पहले भी रूस और यूक्रेन के नेताओं के साथ संवाद करता रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन के साथ कई बैठकों और फोन वार्ताओं में शांति का विषय उठाया है। उन्होंने यूक्रेनी नेतृत्व के साथ बातचीत में भी भारत की ओर से हर संभव सहयोग देने की इच्छा व्यक्त की है। भारत ने स्वयं को ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत किया है जो दोनों पक्षों से संवाद कर सकता है।
चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग ने भी यूक्रेन संकट के राजनीतिक समाधान का समर्थन किया है। ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी और शी की ओर से लगभग समान दिशा में सहयोग का प्रस्ताव सामने आना महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच अपने द्विपक्षीय मतभेद हैं, लेकिन वैश्विक संघर्षों के समाधान और बहुपक्षीय कूटनीति पर कुछ साझा बिंदु दिखाई दे सकते हैं।
नई दिल्ली में हुए सम्मेलन में ब्रिक्स नेताओं ने व्यापक वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति पर जोर दिया। सम्मेलन से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, सदस्य देशों ने अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत और शांतिपूर्ण साधनों से हल करने की आवश्यकता दोहराई। ब्रिक्स सम्मेलन की रिपोर्ट में भी नेताओं द्वारा कूटनीति, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक स्थिरता पर जोर दिए जाने का उल्लेख है।
रूस की ओर से भारत और चीन की भूमिका का स्वागत किए जाने के बावजूद शांति प्रक्रिया के सामने कई कठिन चुनौतियां मौजूद हैं। युद्धविराम की शर्तें, कब्जे वाले क्षेत्रों की स्थिति, सुरक्षा गारंटी और भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था जैसे मुद्दों पर रूस तथा यूक्रेन के रुख में गहरे अंतर हैं। इन मतभेदों को दूर किए बिना किसी स्थायी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा।
भारत और चीन की पेशकश का महत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश अपने प्रस्ताव को किस रूप में आगे बढ़ाते हैं। वे अलग-अलग बातचीत करेंगे, संयुक्त पहल लाएंगे या किसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय मंच के माध्यम से प्रयास करेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है। रूस के साथ-साथ यूक्रेन और उसके सहयोगी देशों की प्रतिक्रिया भी निर्णायक होगी।
फिलहाल क्रेमलिन ने संकेत दिया है कि राष्ट्रपति पुतिन भारत और चीन के शांति प्रयासों को सकारात्मक रूप से देखते हैं। ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान सामने आए इस घटनाक्रम ने रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त कराने के लिए संभावित कूटनीतिक विकल्पों पर नई चर्चा शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में होने वाली आधिकारिक बातचीत से ही स्पष्ट होगा कि यह पेशकश एक औपचारिक शांति पहल का रूप लेती है या केवल राजनयिक स्तर पर सहयोग के प्रस्ताव तक सीमित रहती है।





