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दिल्ली-एनसीआर
प्रोफेसर की मुश्किलें बढ़ीं, कोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से किया इनकार
Kiran
21 Oct 2026 9:47 AM IST

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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गोमती मनोचा ने कहा, "अगर आरोपी को अग्रिम जमानत (anticipatory bail) मिल जाती है, तो इस बात का काफी खतरा है कि वह पीड़िता को प्रभावित कर सकता है या उसे धमका सकता है। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने, दोबारा धमकी देने या जबरन संपर्क करने की भी संभावना है।" प्रोफेसर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए, अदालत ने निर्देश दिया कि मामले की जांच किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सौंपी जाए, ताकि निष्पक्ष जांच हो सके और इलेक्ट्रॉनिक सबूत सुरक्षित रखे जा सकें।
अदालत ने जांच अधिकारी से इस आरोप की भी जांच करने को कहा कि आरोपी या उसके साथी पीड़िता पर केस वापस लेने या आगे न बढ़ाने के लिए दबाव डाल रहे थे। 12 अक्टूबर के अपने आदेश में अदालत ने कहा, "न्याय के हित में, यह अदालत जरूरी समझती है कि जांच किसी वरिष्ठ अधिकारी को सौंपी जाए, ताकि मोबाइल फोन जैसे मूल सबूतों को हासिल करके उन्हें सुरक्षित रखा जा सके... और पीड़िता तथा आरोपी, दोनों के साथ निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।"
अदालत ने कहा कि आपत्तिजनक रिकॉर्डिंग बनाने और उन्हें वायरल करने की धमकी देने के आरोपों से यह चिंता पैदा होती है कि गवाहों के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है और शिकायतकर्ता पर लगातार दबाव डाला जा सकता है। महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी, जो दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व प्रोफेसर है, ने शादी का झूठा वादा करके कई बार उसका यौन शोषण किया। उसने यह भी धमकी दी कि अगर महिला उसकी मांगें नहीं मानती है, तो वह उसके आपत्तिजनक वीडियो वायरल कर देगा।
महिला ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने उसे कोई नशीला या बेहोश करने वाला पदार्थ देकर उसके साथ यौन संबंध बनाए और उसकी मर्जी के बिना आपत्तिजनक वीडियो रिकॉर्ड कर लिए। आरोपी ने इन आरोपों से इनकार किया और दावा किया कि वे तीन साल से अधिक समय से आपसी सहमति से रिश्ते में थे। उसके वकील ने तर्क दिया कि यह FIR जुलाई में आरोपी पर हुए कथित हमले के बाद दर्ज एक अलग मामले के जवाब में (बदले की भावना से) दर्ज कराई गई है।
याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि प्यार भरे या यौन प्रकृति के संदेशों के आदान-प्रदान से यह साबित नहीं होता कि हर कथित यौन कृत्य के लिए महिला की पूरी तरह से स्वतंत्र और समझदारी भरी सहमति थी। अदालत ने यह भी गौर किया कि आरोपी, शिकायतकर्ता का शिक्षक था। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है, जिससे यह पता चलता है कि उनके बीच शक्ति का असंतुलन (power imbalance) हो सकता है, और आरोपी ने दबाव या डरा-धमकाकर काम लिया हो सकता है।
अदालत ने कहा कि अगर आरोपी को अग्रिम जमानत दी जाती है, तो इस बात का काफी खतरा है कि वह शिकायतकर्ता को प्रभावित कर सकता है या धमका सकता है, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है, और दोबारा धमकियां दे सकता है। इसमें यह भी कहा गया है कि वीडियो के स्टोरेज और ट्रांसमिशन से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक सबूत जुटाने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ की जरूरत पड़ सकती है।
जज ने कहा, "जांच अधिकारी इस आरोप की भी जांच करेंगे कि आरोपी या उसके साथी पीड़िता पर केस आगे न बढ़ाने का दबाव डाल रहे हैं। साथ ही, वे उन लोगों के बयान भी दर्ज करेंगे जिन्हें इस दबाव के बारे में जानकारी है।" अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे असली मोबाइल फोन, पूरी व्हाट्सएप चैट, मेटाडेटा, क्लाउड बैकअप और फोरेंसिक इमेज को सुरक्षित रखें। दिल्ली पुलिस कमिश्नर से कहा गया है कि वे इस मामले की जांच किसी वरिष्ठ अधिकारी को सौंपें और 15 दिनों के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट को इस बारे में रिपोर्ट दें।
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