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प्रियंका गांधी ने समर्थकों को किया सतर्क कहा चेहरा देखकर भी करें जांच
Ratna Netam
10 Sept 2026 4:54 PM IST

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नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर अगर आपको कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा का कोई ऐसा वीडियो दिखाई दे, जिसमें वह किसी खास निवेश योजना में पैसे लगाने और मोटा मुनाफा कमाने की बात करती नजर आएं, तो उस पर तुरंत भरोसा मत कीजिए। वीडियो में चेहरा प्रियंका गांधी का हो सकता है, आवाज भी उन्हीं जैसी सुनाई दे सकती है और बोलने का अंदाज भी असली लग सकता है, लेकिन पूरा वीडियो फर्जी हो सकता है। इसी खतरे को देखते हुए प्रियंका गांधी के कार्यालय ने गुरुवार को लोगों के लिए ‘स्कैम अलर्ट’ जारी किया है।
प्रियंका गांधी के कार्यालय के मुताबिक WhatsApp, Instagram और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर AI से तैयार किए गए फर्जी वीडियो प्रसारित हो रहे हैं। इनमें प्रियंका गांधी की तस्वीर, चेहरा और आवाज का इस्तेमाल कर लोगों को पैसा निवेश करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि ये स्कैम हैं और लोगों को इनमें पैसा नहीं लगाना चाहिए।
प्रियंका गांधी के दफ्तर ने क्या कहा?
प्रियंका गांधी के कार्यालय की ओर से सोशल मीडिया पर चेतावनी जारी करते हुए बताया गया कि AI से तैयार तस्वीरों और आवाज वाले वीडियो WhatsApp, Instagram और अन्य प्लेटफॉर्म पर घूम रहे हैं।
इन वीडियो में लोगों को किसी निवेश योजना में पैसा लगाने के लिए कहा जा रहा है।
प्रियंका गांधी के कार्यालय ने लोगों को साफ तौर पर सलाह दी कि वे ऐसे वीडियो में दिखाई देने वाले लिंक पर क्लिक न करें और किसी तरह का निवेश न करें। साथ ही फर्जी पोस्ट को रिपोर्ट और ब्लॉक करने के लिए कहा गया है।
यानी चेतावनी का संदेश बिल्कुल साफ है—वीडियो में प्रियंका गांधी दिखाई देने मात्र से उसे असली न मानें।
AI ने मुश्किल किया असली और नकली का फर्क
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का इस्तेमाल है।
नई AI तकनीक के जरिए किसी व्यक्ति के चेहरे की गतिविधियों और आवाज की नकल करके ऐसा वीडियो तैयार किया जा सकता है, जो पहली नजर में वास्तविक दिखाई दे।
इसे आमतौर पर डीपफेक या AI-generated manipulated content कहा जाता है।
भारत सरकार भी डीपफेक के बढ़ते खतरे को लेकर आगाह कर चुकी है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक AI आधारित डीपफेक में सिंथेटिक ऑडियो, वीडियो और टेक्स्ट शामिल हो सकते हैं। सरकार ने पहचान की चोरी, प्रतिरूपण और भ्रामक AI सामग्री से निपटने के लिए IT Act तथा IT Rules के विभिन्न प्रावधानों का उल्लेख किया है।
यही तकनीक साइबर अपराधियों के हाथ में पहुंचने पर ज्यादा खतरनाक हो जाती है।
चेहरा देखकर भरोसा करना अब सुरक्षित नहीं
पहले ऑनलाइन फ्रॉड में अक्सर फर्जी ईमेल, नकली वेबसाइट, लॉटरी या बैंक खाते बंद होने जैसे संदेश भेजे जाते थे।
अब ठगों की रणनीति ज्यादा आधुनिक हो गई है।
किसी चर्चित नेता, अभिनेता, उद्योगपति या दूसरे लोकप्रिय व्यक्ति का चेहरा और आवाज इस्तेमाल कर वीडियो तैयार किया जा सकता है। वीडियो देखने वाले व्यक्ति को लगता है कि जब इतनी बड़ी हस्ती खुद किसी निवेश की बात कर रही है तो योजना विश्वसनीय होगी।
यहीं से ठगी का जाल शुरू हो सकता है।
प्रियंका गांधी से जुड़े मौजूदा मामले में भी उनके कार्यालय ने कहा है कि AI से बने वीडियो में लोगों से पैसे निवेश करने को कहा जा रहा है।
निर्मला सीतारमण के नाम पर भी आया था फर्जी वीडियो
यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े राजनीतिक चेहरे की AI से नकल कर निवेश से जुड़ा फर्जी वीडियो सामने आया हो।
इससे पहले केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का भी AI से तैयार किया गया एक फर्जी वीडियो सामने आया था। इसमें कथित निवेश प्लेटफॉर्म का प्रचार दिखाया गया था।
PIB Fact Check ने उस वीडियो को फर्जी बताया था और स्पष्ट किया था कि वित्त मंत्री ने ऐसी किसी निवेश योजना या प्लेटफॉर्म का समर्थन नहीं किया है।
इस तरह के मामलों से यह साफ होता है कि साइबर ठग किसी एक राजनीतिक दल या नेता तक सीमित नहीं हैं। जिस चेहरे पर लोगों का भरोसा हो सकता है, उसका दुरुपयोग किया जा सकता है।
डीपफेक कैसे बनता है?
डीपफेक तकनीक में AI मॉडल को किसी व्यक्ति की उपलब्ध तस्वीरों, वीडियो और आवाज के नमूनों के आधार पर उसकी डिजिटल नकल तैयार करने में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके बाद पहले से रिकॉर्ड किए गए या तैयार किए गए वीडियो में चेहरा बदला जा सकता है। इसी तरह AI voice cloning के जरिए किसी व्यक्ति जैसी आवाज बनाई जा सकती है।
जब चेहरे और आवाज दोनों को एक साथ जोड़ दिया जाता है तो वीडियो काफी वास्तविक लग सकता है।
हालांकि हर AI-generated सामग्री धोखाधड़ी नहीं होती। मनोरंजन, शिक्षा और रचनात्मक कार्यों में भी इसका इस्तेमाल होता है। समस्या तब पैदा होती है जब AI का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की पहचान की नकल कर लोगों को धोखा देने, गलत सूचना फैलाने या आर्थिक लाभ लेने के लिए किया जाए।
कैसे पहचानें फर्जी वीडियो?
CERT-In ने डीपफेक को पहचानने और उनसे बचने के लिए कई सावधानियां बताई हैं।
किसी संदिग्ध वीडियो में असामान्य तरीके से पलक झपकना, चेहरे के अजीब भाव, आवाज और होंठों का तालमेल न होना, रोबोट जैसी आवाज, त्वचा के रंग में असामान्यता, सिर या शरीर की अप्राकृतिक गतिविधियां और रोशनी में गड़बड़ी जैसे संकेत दिखाई दे सकते हैं।
लेकिन AI तकनीक लगातार बेहतर हो रही है। इसलिए केवल आंखों से देखकर हर डीपफेक पकड़ लेना संभव नहीं है।
सबसे सुरक्षित तरीका स्रोत की जांच करना है।
अगर कोई बड़ा नेता अचानक किसी कंपनी, ऐप या निवेश योजना को प्रमोट करता दिखाई दे तो उसके आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट और विश्वसनीय समाचार स्रोतों पर इसकी पुष्टि करनी चाहिए।
ज्यादा मुनाफे का लालच सबसे बड़ा रेड फ्लैग
निवेश के नाम पर होने वाली ऑनलाइन ठगी में अक्सर कम समय में बहुत ज्यादा पैसा कमाने का दावा किया जाता है।
किसी मशहूर व्यक्ति का वीडियो दिखाकर लोगों का भरोसा हासिल किया जाता है। उसके बाद वीडियो या पोस्ट के साथ दिए लिंक पर जाने को कहा जा सकता है।
यहां व्यक्ति से मोबाइल नंबर, बैंक खाते, कार्ड या दूसरी निजी जानकारी मांगी जा सकती है। कभी-कभी शुरुआत में छोटी रकम जमा करने को कहा जाता है और स्क्रीन पर नकली मुनाफा दिखाया जाता है।
बाद में ज्यादा रकम लगाने का दबाव बनाया जा सकता है।
इसलिए किसी सेलिब्रिटी या नेता का चेहरा निवेश की विश्वसनीयता का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
लिंक पर क्लिक करने से पहले करें जांच
प्रियंका गांधी के कार्यालय की चेतावनी में खास तौर पर संदिग्ध सामग्री पर क्लिक नहीं करने की सलाह दी गई है।
अगर सोशल मीडिया पर कोई निवेश प्रस्ताव मिलता है तो संबंधित संस्था की आधिकारिक वेबसाइट और नियामकीय जानकारी जांचना जरूरी है।
सिर्फ WhatsApp मैसेज, Instagram Reel, Facebook पोस्ट या वायरल वीडियो देखकर पैसा ट्रांसफर करना जोखिम भरा हो सकता है।
अगर पोस्ट संदिग्ध लगे तो उसे आगे शेयर करने के बजाय रिपोर्ट और ब्लॉक करना बेहतर है।
सरकार भी डीपफेक पर बढ़ा चुकी है सख्ती
AI से तैयार भ्रामक सामग्री के बढ़ते मामलों के बीच सरकार ने 2026 में IT Rules के ढांचे को और मजबूत किया है।
PIB के मुताबिक फरवरी 2026 में किए गए संशोधनों में synthetically generated information यानी AI से तैयार सामग्री को लेकर अतिरिक्त प्रावधान शामिल किए गए। इनमें स्वीकार्य AI-generated content की स्पष्ट लेबलिंग और ट्रेस करने योग्य metadata जैसे उपाय शामिल हैं। सोशल मीडिया इंटरमीडियरी पर भी गैरकानूनी AI सामग्री को लेकर जिम्मेदारियां बढ़ाई गई हैं।
सरकार ने डीपफेक पहचानने के लिए तकनीकी परियोजनाओं को भी समर्थन दिया है। इनमें ऑडियो-विजुअल फर्जी सामग्री और voice deepfake की पहचान से जुड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं।
AI स्कैम का खतरा क्यों बढ़ रहा?
सोशल मीडिया पर सार्वजनिक हस्तियों की हजारों तस्वीरें, भाषण और वीडियो उपलब्ध होते हैं।
ऐसी डिजिटल सामग्री AI मॉडल के जरिए चेहरे और आवाज की नकल करने में इस्तेमाल की जा सकती है। इसी कारण लोकप्रिय लोगों के नाम पर बनाए गए फर्जी वीडियो आम यूजर्स के लिए चुनौती बन रहे हैं।
YouTube की नीतियां भी किसी व्यक्ति की AI-generated आवाज या चेहरे का इस्तेमाल कर दर्शकों को यह गलत विश्वास दिलाने पर रोक लगाती हैं कि वह व्यक्ति वास्तव में वीडियो में शामिल है या किसी उत्पाद का प्रचार कर रहा है।
इससे साफ है कि AI impersonation अब केवल फर्जी खबर का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि ऑनलाइन पहचान और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी चुनौती भी बन चुका है।
प्रियंका की चेतावनी में आम लोगों के लिए बड़ा संदेश
प्रियंका गांधी के कार्यालय की मौजूदा अपील सिर्फ उनके नाम पर चल रहे वीडियो तक सीमित चेतावनी नहीं है।
यह डिजिटल दौर के उस बड़े खतरे की तरफ इशारा करती है जहां **चेहरा असली हो सकता है लेकिन वीडियो असली नहीं; आवाज जानी-पहचानी हो सकती है लेकिन शब्द उस व्यक्ति ने कभी बोले ही न हों।**
ऐसे में सोशल मीडिया यूजर्स को अपनी पुरानी आदत बदलनी होगी। अब केवल ‘देखा और सुना’ किसी बात को सच मानने के लिए पर्याप्त नहीं है।
वीडियो कहां से आया, सबसे पहले किसने पोस्ट किया, क्या संबंधित व्यक्ति के आधिकारिक अकाउंट पर वह मौजूद है और क्या विश्वसनीय स्रोत उसकी पुष्टि करते हैं—इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी हो गया है।
फिलहाल प्रियंका गांधी के कार्यालय ने अपने नाम, तस्वीर और AI-generated आवाज का इस्तेमाल कर निवेश कराने वाले वीडियो को स्कैम बताते हुए स्पष्ट चेतावनी जारी की है। लोगों से ऐसे वीडियो पर क्लिक या निवेश नहीं करने और उन्हें रिपोर्ट तथा ब्लॉक करने की अपील की गई है।
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