- Home
- /
- दिल्ली-एनसीआर
- /
- असम में कृषि विकास को...

x
नई दिल्ली/गुवाहाटी। असम के वित्त मंत्री जयंत मल्लाबरुआ ने कृषि क्षेत्र में आय बढ़ाने और खेती को अधिक आधुनिक एवं लाभकारी बनाने के लिए कृषि वित्त व्यवस्था में क्षेत्र-विशेष दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा कि किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए केवल ऋण उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मजबूत संस्थागत क्रेडिट सिस्टम, बेहतर बाजार संपर्क और पूरी वैल्यू चेन विकसित करना जरूरी है।
नई दिल्ली में आयोजित "भारत की विकसित भारत की ओर यात्रा के लिए फाइनेंसिंग" विषय पर दो दिवसीय सम्मेलन के दूसरे दिन कृषि क्षेत्र में बदलाव के लिए फाइनेंसिंग विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए जयंत मल्लाबरुआ ने कृषि क्षेत्र की चुनौतियों और संभावनाओं पर विस्तार से अपनी बात रखी। इस सम्मेलन में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अलावा विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री तथा वित्त मंत्री भी मौजूद रहे।
असम के वित्त मंत्री ने कहा कि भारत जैसे विविधता वाले देश में कृषि क्षेत्र के लिए एक समान वित्तीय मॉडल प्रभावी नहीं हो सकता। हर राज्य और क्षेत्र की कृषि परिस्थितियां, फसल पैटर्न, जलवायु, संसाधन और बाजार की जरूरतें अलग-अलग हैं। ऐसे में स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर कृषि वित्त पोषण की रणनीति तैयार करनी होगी।
उन्होंने असम की कृषि क्षमता का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में विकास की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। यहां चाय, बागवानी, मत्स्य पालन, पशुपालन और अन्य कृषि गतिविधियों के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए वित्तीय सहायता को उत्पादन से लेकर बाजार तक पूरी प्रक्रिया से जोड़ना आवश्यक है।
जयंत मल्लाबरुआ ने कहा कि कृषि क्षेत्र में वास्तविक बदलाव के लिए संस्थागत ऋण व्यवस्था को और मजबूत करना होगा। छोटे और सीमांत किसानों तक आसान और समय पर वित्तीय सहायता पहुंचाना जरूरी है, ताकि वे आधुनिक तकनीक, बेहतर बीज, सिंचाई व्यवस्था और कृषि उपकरणों का उपयोग कर सकें।
उन्होंने कहा कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए एंड-टू-एंड वैल्यू चेन विकसित करने की आवश्यकता है। इसका मतलब केवल खेती तक सीमित नहीं रहना, बल्कि उत्पादन, प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन और बाजार तक पहुंच की पूरी व्यवस्था को मजबूत करना है। इससे किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकेगा और कृषि क्षेत्र अधिक टिकाऊ बन पाएगा।
मंत्री ने भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि देश की बड़ी आबादी आज भी कृषि और उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है। उन्होंने बताया कि भारत की करीब 40 से 46 प्रतिशत कार्यबल कृषि गतिविधियों से जुड़ी हुई है, जबकि कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 18 प्रतिशत योगदान है। यह आंकड़े बताते हैं कि कृषि क्षेत्र में उत्पादकता और आय बढ़ाने के लिए लगातार सुधार की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्पादकता बढ़ाने, मूल्य संवर्धन करने और किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की है। वित्तीय संसाधनों का सही इस्तेमाल करके इन चुनौतियों को अवसरों में बदला जा सकता है।
असम के वित्त मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि कृषि वित्त को केवल ऋण वितरण तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसमें जोखिम प्रबंधन, बीमा, तकनीकी सहायता, डिजिटल सेवाओं और बाजार से जुड़ाव को भी शामिल करना होगा। इससे किसान अधिक आत्मनिर्भर बन सकेंगे और कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
सम्मेलन में कृषि क्षेत्र के वित्त पोषण को लेकर विभिन्न राज्यों के अनुभवों और सुझावों पर चर्चा की गई। इस दौरान विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने कृषि में निवेश बढ़ाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और किसानों की आय में सुधार के उपायों पर विचार-विमर्श किया।
जयंत मल्लाबरुआ ने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र का मजबूत होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय के साथ ऐसी वित्तीय नीतियां बनानी होंगी, जो स्थानीय जरूरतों के अनुरूप हों।
उन्होंने कहा कि असम जैसे राज्यों में कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने के लिए विशेष वित्तीय योजनाओं और निवेश की जरूरत है। क्षेत्र आधारित रणनीति, मजबूत क्रेडिट सिस्टम और बेहतर वैल्यू चेन के माध्यम से कृषि को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।
इस दौरान उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र और राज्यों के संयुक्त प्रयासों से देश का कृषि क्षेत्र आधुनिक, प्रतिस्पर्धी और किसानों के लिए अधिक आय देने वाला क्षेत्र बन सकेगा।
Next Story





