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संसद का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी तेज, भाजपा की विपक्षी दलों से बातचीत

नई दिल्ली। संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की अटकलों के बीच देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। केंद्र सरकार महिला आरक्षण और लोकसभा तथा विधानसभा सीटों के परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रही है। इसके लिए भाजपा और सरकार की ओर से द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सहित कई विपक्षी दलों के साथ बातचीत की जा रही है। हालांकि, द्रमुक ने अब तक समर्थन को लेकर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है। राजनीतिक चर्चाओं के मुताबिक, पार्टी कुछ शर्तों के साथ सरकार के प्रस्ताव का समर्थन कर सकती है। दूसरी ओर, संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बावजूद अब तक उसका औपचारिक सत्रावसान नहीं हुआ है। इससे संसद की विशेष बैठक बुलाए जाने की संभावनाओं को और बल मिला है।
विशेष सत्र को लेकर राजनीतिक हलचल तेज
संसद के विशेष सत्र की चर्चाएं ऐसे समय तेज हुई हैं, जब सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधायी प्रस्तावों पर राजनीतिक सहमति बनाने का प्रयास कर रही है।
सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्टों के अनुसार, सरकार अक्टूबर के अंतिम सप्ताह या नवंबर की शुरुआत में संसद की विशेष बैठक बुलाने की संभावना पर विचार कर रही है।
हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की गई है। सरकार ने विशेष बैठक के संभावित एजेंडे को लेकर भी अंतिम जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।
बताया जा रहा है कि प्रस्तावित संवैधानिक संशोधनों को पारित कराने के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाना सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।
द्रमुक के समर्थन पर बना हुआ है संशय
द्रमुक की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इंडिया गठबंधन से अलग हो चुकी द्रमुक ने सरकार के प्रस्तावों को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट संदेश नहीं दिया है।
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा और द्रमुक के बीच परोक्ष बातचीत जारी है। हालांकि इन चर्चाओं का अब तक कोई निर्णायक परिणाम सामने नहीं आया है।
राजनीतिक स्तर पर यह संभावना जताई जा रही है कि द्रमुक कुछ शर्तों के साथ प्रस्तावों का समर्थन कर सकती है।
लेकिन पार्टी की ओर से ऐसी किसी सहमति की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में द्रमुक का अंतिम रुख क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
कई विपक्षी दलों से सरकार ने किया संपर्क
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने 19 अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को भेजे जवाब में बताया कि सरकार परिसीमन से संबंधित प्रस्ताव पर व्यापक सहमति बनाने के लिए विपक्षी दलों से बातचीत कर रही है।
रिजिजू के अनुसार, सरकार ने समाजवादी पार्टी, द्रमुक, वाईएसआर कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार), शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजू जनता दल के प्रतिनिधियों से चर्चा की है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेतृत्व से भी बातचीत का प्रयास किया गया था, लेकिन सरकार के बार-बार अनुरोध करने के बावजूद चर्चा के लिए तारीख नहीं मिल सकी।
हालांकि किसी दल से बातचीत होने का अर्थ यह नहीं है कि उसने प्रस्तावित विधेयक का समर्थन करने पर सहमति दे दी है।
मानसून सत्र का अब तक नहीं हुआ सत्रावसान
इस पूरे मामले में सबसे अधिक चर्चा संसद के मानसून सत्र के औपचारिक सत्रावसान को लेकर हो रही है।
संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त 2026 को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था। लेकिन 20 अक्टूबर तक इसका औपचारिक सत्रावसान नहीं किया गया है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया है कि संविधान में सदन के अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद सत्रावसान करने के लिए कोई निश्चित समयसीमा निर्धारित नहीं है।
उन्होंने कहा कि पहले भी ऐसे उदाहरण रहे हैं, जब सदन स्थगित होने और औपचारिक सत्रावसान के बीच लंबा अंतर रहा है।
रिजिजू के मुताबिक, केवल सत्रावसान में देरी होने से किसी संवैधानिक या संसदीय प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखा पत्र
कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मानसून सत्र के सत्रावसान में देरी पर सवाल उठाए थे।
उन्होंने सरकार से परिसीमन से संबंधित प्रस्तावों को अंतिम रूप देने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी।
खरगे ने आशंका जताई थी कि सरकार विपक्ष के साथ पर्याप्त विचार-विमर्श किए बिना संवैधानिक संशोधन विधेयक आगे बढ़ाने का प्रयास कर सकती है।
कांग्रेस का कहना है कि परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर सभी राजनीतिक दलों की राय ली जानी चाहिए।
इसके जवाब में सरकार ने दावा किया कि विपक्ष से चर्चा के प्रयास पहले से जारी हैं।
दो-तिहाई बहुमत जुटाना बड़ी चुनौती
महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित संभावित संवैधानिक संशोधन विधेयकों के लिए संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता हो सकती है।
संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए प्रत्येक सदन में कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई समर्थन आवश्यक होता है।
यही कारण है कि सरकार विभिन्न विपक्षी दलों के साथ सहमति बनाने पर जोर दे रही है।
द्रमुक जैसे दलों का समर्थन मिलने से सरकार के लिए आवश्यक मत जुटाना आसान हो सकता है। हालांकि वास्तविक स्थिति विधेयक के स्वरूप, मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों और राजनीतिक दलों के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगी।
महिला आरक्षण और परिसीमन पर नजर
महिला आरक्षण तथा परिसीमन को लेकर लंबे समय से राजनीतिक चर्चा जारी है।
परिसीमन के तहत जनसंख्या और अन्य संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर लोकसभा तथा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व संबंधी व्यवस्थाओं में बदलाव किया जाता है।
दक्षिण भारत के कुछ राजनीतिक दलों ने पहले भी जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्निर्धारण को लेकर चिंताएं व्यक्त की हैं।
ऐसे में सरकार के सामने विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व से जुड़ी चिंताओं का समाधान निकालने की चुनौती भी है।
अक्टूबर के अंत में हो सकती है विशेष बैठक
रिपोर्टों के मुताबिक, यदि सरकार को आवश्यक राजनीतिक समर्थन मिलने के संकेत मिलते हैं, तो अक्टूबर के अंतिम सप्ताह या नवंबर के शुरुआती दिनों में संसद की विशेष बैठक बुलाने पर फैसला लिया जा सकता है।
हालांकि अभी इस संबंध में कोई औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं हुई है।
इसलिए विशेष बैठक की तारीख, अवधि और विधायी एजेंडे को लेकर फिलहाल अटकलें ही लगाई जा रही हैं।
कुल मिलाकर, संसद के संभावित विशेष सत्र से पहले सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बातचीत महत्वपूर्ण दौर में पहुंच गई है। द्रमुक के रुख, कांग्रेस की सर्वदलीय बैठक की मांग और सरकार के अगले कदम पर सभी की नजर बनी हुई है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो सकेगा कि विशेष बैठक बुलाई जाएगी या इन प्रस्तावों पर चर्चा आगे के संसदीय सत्र में होगी।





