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TMC में बगावत और विलय विवाद से राजनीतिक हलचल तेज, NCPI के रुख में बदलाव

Delhi दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी संकट ने अब नया मोड़ ले लिया है। पार्टी से जुड़े बागी नेताओं के दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCPI) के भीतर भी मतभेद का कारण बन गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया है।
जानकारी के अनुसार, शुरुआत में NCPI के कुछ नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 बागी नेताओं के किसी अन्य पार्टी में शामिल होने या विलय का विरोध किया था। लेकिन अब पार्टी के भीतर रुख बदलता नजर आ रहा है और कुछ नेता नए शामिल होने वालों का स्वागत करने के लिए तैयार दिख रहे हैं।
यह विवाद तब और चर्चा में आ गया जब NCPI से जुड़े एक बागी सांसद ने घोषणा की कि वह बंगाल की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी के साथ विलय करने जा रहे हैं, जिसने त्रिपुरा में भी अपने राजनीतिक कदम रखे थे। इस घोषणा के बाद राजनीतिक हलकों में कई तरह की अटकलें तेज हो गईं।
हालांकि NCPI के महासचिव शांतनु डे ने इस फैसले पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और अन्य पदाधिकारियों से सलाह किए बिना लिया गया है। उनके अनुसार, पार्टी के अधिकांश सदस्य इस तरह के विलय के खिलाफ हैं और इससे संगठन की मूल विचारधारा प्रभावित हो सकती है।
हावड़ा के रहने वाले और NCPI के अध्यक्ष शांतनु डे ने इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के बागी नेताओं पर उनकी पार्टी में शामिल होने के लिए पैसे लेने के आरोप भी सामने आ रहे हैं। शांतनु डे ने स्पष्ट कहा कि वे इस तरह के किसी भी समझौते या विलय का समर्थन नहीं करते।
उन्होंने यह भी कहा, “पार्टी अध्यक्ष कुछ नेताओं के साथ समझौता करना चाहते हैं, लेकिन मैं इस कदम के पक्ष में नहीं हूं।” उनके इस बयान के बाद पार्टी के अंदर मतभेद और स्पष्ट रूप से सामने आ गए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल पार्टी बदलने या विलय का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे आने वाले चुनावी समीकरण और संगठनात्मक नियंत्रण की लड़ाई भी जुड़ी हुई है। तृणमूल कांग्रेस के बागी नेताओं का एक साथ किसी नई राजनीतिक दिशा में जाना राज्य की राजनीति में नए समीकरण बना सकता है।
इसी बीच NCPI के भीतर चल रही असहमति ने पार्टी की रणनीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां कुछ नेता नए सदस्यों को शामिल करने के पक्ष में हैं, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नेतृत्व इस फैसले को संगठनात्मक अनुशासन के खिलाफ मान रहा है।
फिलहाल पूरे मामले में स्थिति स्पष्ट नहीं है और सभी दल अपने-अपने स्तर पर रणनीति तय करने में लगे हुए हैं। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि आने वाले समय में और भी बागी नेता नई पार्टियों में शामिल हो सकते हैं, जिससे पश्चिम बंगाल की राजनीति में और अधिक उथल-पुथल देखने को मिल सकती है।





