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संसद में सियासी संग्राम तेज, हंगामे के बीच सरकार को पूरे करने हैं अहम काम

नई दिल्ली : संसद के मानसून सत्र के तीसरे सप्ताह की शुरुआत सोमवार से होने जा रही है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल को देखते हुए सदन की कार्यवाही एक बार फिर हंगामेदार रहने के पूरे आसार हैं। सत्र के शुरुआती 10 दिन लगातार विपक्ष के विरोध, नारेबाजी और राजनीतिक टकराव के कारण प्रभावित रहे हैं। विपक्षी दल कई मुद्दों को लेकर सरकार पर हमलावर हैं और आने वाले दिनों में भी इन मुद्दों को लेकर संसद में जोरदार विरोध की तैयारी कर रहे हैं।
विपक्ष की ओर से पेपर लीक, राम मंदिर में दान से जुड़े कथित आरोप, जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और अन्य राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई गई है। विपक्ष का कहना है कि इन मुद्दों पर सरकार को जवाब देना चाहिए और संसद में विस्तृत चर्चा कराई जानी चाहिए। वहीं, सरकार लगातार आरोप लगा रही है कि विपक्ष जानबूझकर संसद की कार्यवाही बाधित कर रहा है और महत्वपूर्ण विधायी कार्यों में रुकावट पैदा कर रहा है।
मानसून सत्र के शुरुआती दिनों में लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों में कई बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। हंगामे के कारण प्रश्नकाल और अन्य महत्वपूर्ण चर्चाएं प्रभावित हुईं। हालांकि भारी विरोध के बीच सरकार कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में सफल रही है, लेकिन अब भी कई बड़े बिल संसद के सामने लंबित हैं।
संसदीय कार्यसूची के अनुसार, मानसून सत्र में अब केवल नौ दिन की बैठकें शेष रह गई हैं। ऐसे में सरकार के सामने अपने विधायी एजेंडे को पूरा करने की बड़ी चुनौती है। सरकार की प्राथमिकता कई महत्वपूर्ण विधेयकों को सदन से मंजूरी दिलाना है। इनमें वित्तीय सुधारों से जुड़े प्रस्ताव, प्रशासनिक बदलाव और अन्य जरूरी सरकारी कामकाज शामिल हैं।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विपक्ष के लगातार विरोध के बीच सदन को सुचारू रूप से चलाया जाए। सत्ता पक्ष की ओर से कोशिश की जाएगी कि विपक्ष के साथ बातचीत कर गतिरोध खत्म किया जाए और सदन की कार्यवाही आगे बढ़ाई जा सके। हालांकि विपक्षी दल अपने मुद्दों पर पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे हैं।
विपक्ष का कहना है कि संसद केवल कानून पारित करने का मंच नहीं है, बल्कि जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने का स्थान भी है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सरकार गंभीर विषयों पर चर्चा से बचना चाहती है। वहीं, सरकार का कहना है कि वह हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन संसद की कार्यवाही बाधित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए उचित नहीं है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मानसून सत्र के बाकी दिन भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस और टकराव देखने को मिल सकता है। सरकार जहां अपने विधायी कामकाज को पूरा करने की कोशिश करेगी, वहीं विपक्ष जनहित से जुड़े मुद्दों को लेकर दबाव बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ेगा।
संसद के बचे हुए नौ दिनों में सरकार को कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए विपक्ष का सहयोग जरूरी होगा। यदि दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बनती है तो आने वाले दिनों में भी सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित हो सकती है। ऐसे में मानसून सत्र का अंतिम चरण राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।





