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ब्रिक्स मंच से पीएम मोदी की चेतावनी, तकनीक और जरूरी खनिजों को हथियार न बनाएं देश

Kavita2
13 Sept 2026 2:48 PM IST
ब्रिक्स मंच से पीएम मोदी की चेतावनी, तकनीक और जरूरी खनिजों को हथियार न बनाएं देश
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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन तकनीक और जरूरी खनिजों के बढ़ते रणनीतिक इस्तेमाल को लेकर दुनिया को आगाह किया। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स यानी जरूरी खनिजों को दबाव बनाने या हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने अपनी समापन टिप्पणी में समावेशी तकनीकी विकास की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि आधुनिक संसाधनों और नवाचारों का लाभ सभी देशों तथा समाज के सभी वर्गों तक पहुंचना चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सहित ब्रिक्स देशों के नेताओं की मौजूदगी में यह संदेश दिया। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी और जरूरी खनिजों पर अत्यधिक नियंत्रण या उनका सीमित देशों तक सिमट जाना वैश्विक प्रगति में बाधा पैदा कर सकता है। मौजूदा समय में तकनीक और खनिज केवल औद्योगिक विकास के साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि इनका संबंध देशों की आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक हितों से भी जुड़ चुका है।

पीएम मोदी की टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है, जब दुनिया में सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, दूरसंचार और आधुनिक रक्षा प्रणालियों के लिए जरूरी खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इन संसाधनों का उत्पादन और आपूर्ति सीमित देशों में केंद्रित होने से वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। किसी भी तरह का प्रतिबंध या अनुचित नियंत्रण विकासशील देशों के औद्योगिक तथा तकनीकी विकास की रफ्तार को धीमा कर सकता है।

क्रिटिकल मिनरल्स में ऐसे खनिज शामिल होते हैं, जिनका इस्तेमाल आधुनिक तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और औद्योगिक उत्पादन में किया जाता है। इनकी उपलब्धता बाधित होने पर कई प्रमुख क्षेत्रों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। प्रधानमंत्री ने इसी संदर्भ में संसाधनों तक निष्पक्ष और भरोसेमंद पहुंच की जरूरत रेखांकित की। उनका संदेश था कि इन खनिजों का इस्तेमाल सहयोग बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए, न कि देशों पर दबाव डालने के साधन के रूप में।

प्रधानमंत्री मोदी ने टेक्नोलॉजी को अपनाने की प्रक्रिया में समावेशिता को जरूरी बताया। उन्होंने संकेत दिया कि डिजिटल और तकनीकी परिवर्तन तभी सार्थक होगा, जब उसका लाभ केवल विकसित अर्थव्यवस्थाओं या बड़े उद्योगों तक सीमित न रहे। विकासशील देशों, छोटे उद्यमों, युवाओं और समाज के वंचित वर्गों को भी नई तकनीक के अवसरों में बराबर भागीदारी मिलनी चाहिए। तकनीकी असमानता बढ़ने पर देशों और समाजों के बीच विकास का अंतर और गहरा हो सकता है।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री की टिप्पणी भारत की उस सोच को सामने रखती है, जिसमें तकनीकी प्रगति को मानव केंद्रित और सभी के लिए सुलभ बनाने पर जोर दिया जाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल भुगतान, डेटा, साइबर सुरक्षा और दूरसंचार जैसी तकनीकों का प्रभाव दुनियाभर में बढ़ रहा है। ऐसे में इनके उपयोग के लिए ऐसे नियमों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता है, जो नवाचार को बढ़ावा देने के साथ समान अवसर भी सुनिश्चित करें।

प्रधानमंत्री ने अपनी समापन टिप्पणी में यह स्पष्ट किया कि तकनीक पर नियंत्रण की होड़ सामूहिक विकास की भावना के विपरीत हो सकती है। यदि शक्तिशाली देश अत्याधुनिक तकनीक तक पहुंच को सीमित करते हैं या उसे राजनीतिक हितों से जोड़ते हैं तो इसका सबसे ज्यादा असर विकासशील और गरीब देशों पर पड़ता है। इन देशों को नई तकनीक प्राप्त करने, उद्योग विकसित करने और नागरिकों तक आधुनिक सेवाएं पहुंचाने में कठिनाई हो सकती है।

पीएम मोदी का बयान वैश्विक आपूर्ति शृंखला को भरोसेमंद और लचीला बनाने की जरूरत से भी जुड़ा माना जा रहा है। हाल के वर्षों में विभिन्न वैश्विक घटनाओं के कारण सेमीकंडक्टर, ऊर्जा संसाधनों और जरूरी खनिजों की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इससे कई देशों में उत्पादन की लागत बढ़ी और उद्योगों को परेशानी का सामना करना पड़ा। ऐसी परिस्थितियों ने संसाधनों के स्रोतों में विविधता और देशों के बीच सहयोग की अहमियत बढ़ा दी है।

ब्रिक्स के मंच से दिया गया यह संदेश समूह के सदस्य देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है। ब्रिक्स देशों के पास प्राकृतिक संसाधनों, तकनीकी क्षमता, बड़े बाजार और युवा आबादी की महत्वपूर्ण ताकत है। यदि ये देश पारदर्शी और सहयोगपूर्ण व्यवस्था के तहत मिलकर काम करते हैं तो जरूरी खनिजों की खोज, प्रसंस्करण, आपूर्ति और तकनीकी इस्तेमाल के क्षेत्र में नए अवसर तैयार हो सकते हैं। इससे किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।

प्रधानमंत्री ने अपनी बात रखते हुए प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग की भावना पर जोर दिया। उनका संदेश था कि नई तकनीकों और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए होना चाहिए। जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य जैसी चुनौतियों से निपटने में तकनीक की बड़ी भूमिका है। यदि तकनीकी क्षमताएं और आवश्यक संसाधन केवल चुनिंदा देशों तक सीमित रहेंगे तो इन चुनौतियों का सामूहिक समाधान कठिन हो जाएगा।

शी चिनफिंग की मौजूदगी में मोदी का यह वक्तव्य इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चीन वैश्विक स्तर पर कई जरूरी खनिजों के उत्पादन और प्रसंस्करण में अहम भूमिका निभाता है। हालांकि प्रधानमंत्री ने अपनी टिप्पणी में किसी एक देश का नाम लेकर आलोचना नहीं की। उन्होंने व्यापक रूप से दुनिया से ऐसी व्यवस्था बनाने की अपील की, जिसमें संसाधनों और तकनीक का उपयोग साझा प्रगति के लिए किया जाए।

ब्रिक्स सम्मेलन के दूसरे दिन की समापन टिप्पणी में प्रधानमंत्री ने भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था के दो महत्वपूर्ण आधारों—तकनीक और जरूरी खनिजों—पर भारत का दृष्टिकोण रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन क्षेत्रों में नियंत्रण, भेदभाव या राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल की प्रवृत्ति से वैश्विक विश्वास कमजोर हो सकता है। इसके विपरीत पारदर्शिता, समान पहुंच और सहयोग से देशों के बीच भरोसा बढ़ाया जा सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी का यह संदेश विकसित और विकासशील देशों के बीच तकनीकी अंतर कम करने की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। उन्होंने संकेत दिया कि दुनिया की प्रगति तभी वास्तविक मानी जाएगी, जब उसका लाभ प्रत्येक देश तक पहुंचे। ब्रिक्स जैसे मंच इस दिशा में संवाद, सहयोग और नई साझेदारियों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। सम्मेलन के समापन पर प्रधानमंत्री की अपील रही कि तकनीक तथा जरूरी खनिजों को संघर्ष का कारण बनाने के बजाय समावेशी और साझा विकास का माध्यम बनाया जाए।

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