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UPI MDR चार्ज के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में PIL

Kiran
17 Sept 2026 10:37 AM IST
UPI MDR चार्ज के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में PIL
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Delhi दिल्ली सरकार ने ₹2,000 से ज़्यादा के UPI पेमेंट (P2M ट्रांज़ैक्शन) पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू किया है। हालांकि, ₹2,000 तक के UPI ट्रांज़ैक्शन पर कोई MDR नहीं लगेगा। वकील अंजन दत्ता द्वारा दायर PIL में केंद्र सरकार के 14 सितंबर के नोटिफिकेशन (वित्त मंत्रालय द्वारा जारी) और 15 सितंबर को घोषित MDR फ्रेमवर्क को चुनौती दी गई है। यह फ्रेमवर्क 15 अक्टूबर से लागू होना है।
₹2,000 से ज़्यादा के सामान्य P2M UPI ट्रांज़ैक्शन पर 0.4% MDR लगेगा, लेकिन ₹75,000 और उससे ज़्यादा के ट्रांज़ैक्शन के लिए इसकी अधिकतम सीमा ₹300 तय की गई है। कुछ खास ज़रूरी सेक्टर के लिए ₹5 का फ्लैट चार्ज है, कैपिटल-मार्केट पेमेंट पर 0.02% लेवी है और महीने में ₹1 लाख तक की कमाई करने वाले मर्चेंट को इससे छूट दी गई है। सरकार का दावा है कि लगभग 96% मर्चेंट ट्रांज़ैक्शन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि या तो वे ₹2,000 से कम के हैं या फिर UPI QR कोड के ज़रिए महीने में ₹1 लाख तक कमाने वाले छोटे मर्चेंट के लिए ज़ीरो-MDR प्रावधानों के दायरे में आते हैं।
दत्ता ने तर्क दिया कि भले ही अधिकारी यह दावा करें कि मर्चेंट इन लागतों का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल सकते, लेकिन जिन पेमेंट पर यह फीस लगेगी, वे अनिवार्य रूप से कीमतों में शामिल हो जाएंगी, वर्किंग कैपिटल कम करेंगी या कम मार्जिन वाले व्यापारियों के बीच UPI पेमेंट लेने से इनकार करने या ट्रांज़ैक्शन को कई हिस्सों में बांटने (transaction-splitting) जैसी स्थिति पैदा करेंगी। उन्होंने कहा, "किसी स्पष्ट आर्थिक परिणाम के खिलाफ सिर्फ़ एक निर्देश जारी करने से उसका बोझ खत्म नहीं हो जाता।"
इस PIL में केंद्र सरकार, RBI, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया (NPCI) और UPI एंड सर्विसेज़ स्टीयरिंग कमिटी को प्रतिवादी (respondents) बनाया गया है। दत्ता ने बताया कि जहां ₹2,000 से ज़्यादा के UPI पेमेंट पर लेवी लगाई गई है, वहीं RuPay-पावर्ड डेबिट कार्ड को बिना किसी मौद्रिक सीमा के "नो-चार्ज" (बिना शुल्क) सुरक्षा का लाभ मिलना जारी है।
यह स्पष्ट करते हुए कि वह सुरक्षित पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए रखने के खिलाफ नहीं हैं, दत्ता ने कहा कि वह लागत संबंधी स्टडी, इसके पीछे की कार्यप्रणाली या लागत को ग्राहकों पर डालने से रोकने वाले प्रभावी सुरक्षा उपायों का खुलासा किए बिना देशव्यापी अनिवार्य पेमेंट का बोझ डालने के खिलाफ हैं। PIL में कहा गया कि ₹2,000 के ट्रांज़ैक्शन और ₹1 लाख की मासिक प्राप्ति की सीमा जैसे नियम, सार्वजनिक किए गए डेटा पर आधारित नहीं थे। याचिकाकर्ता ने बताया कि ₹2,001 के ट्रांज़ैक्शन पर प्रतिशत के हिसाब से फ़ीस लगती है, जबकि ₹2,000 पर नहीं; इससे वित्तीय "असंतुलन" (cliffs) पैदा होते हैं जो बाज़ार के व्यवहार को बिगाड़ते हैं और एक जैसी स्थिति वाले व्यापारियों के बीच भेदभाव करते हैं, साथ ही सीमा तय करके बहुत ज़्यादा मूल्य वाले ट्रांज़ैक्शन को फ़ायदा पहुँचाते हैं।
PIL में इस कई स्तरों वाले शुल्क को साफ़ तौर पर मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 19(1)(g) (किसी भी पेशे, काम, व्यापार या कारोबार को करने का अधिकार) का उल्लंघन करने वाला बताया गया। इसमें यह भी कहा गया कि नोटिफ़ाई किए गए कानूनी नियमों के बजाय प्रेस रिलीज़ के ज़रिए वित्तीय शुल्क तय करना, ज़रूरी वित्तीय कामों को एक गैर-निगमित संचालन समिति (unincorporated steering committee) को बहुत ज़्यादा अधिकार सौंपने जैसा था।
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