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दिल्ली-एनसीआर
प्रदर्शन ड्यूटी में बॉडी कैमरा जरूरी हो हाई कोर्ट में PIL
Ratna Netam
6 Oct 2026 7:14 PM IST

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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर मांग की गई है कि विरोध प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण की ड्यूटी में तैनात दिल्ली पुलिस तथा रैपिड एक्शन फोर्स यानी RAF के जवानों के लिए बॉडी-वर्न कैमरे पहनना अनिवार्य किया जाए। याचिका में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और संबंधित अधिकारियों को इस संबंध में बाध्यकारी नियम या स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर यानी SOP तैयार करने का निर्देश देने की मांग की गई है।यह याचिका अधिवक्ता चाहत राघव ने दाखिल की है। इसमें कहा गया है कि भीड़ को नियंत्रित करने और विरोध प्रदर्शन संभालने के दौरान तैनात सुरक्षाकर्मियों के बॉडी कैमरे लगातार चालू रहने चाहिए, ताकि घटनाओं का स्वतंत्र और विश्वसनीय रिकॉर्ड मौजूद रहे। साथ ही कैमरों में रिकॉर्ड वीडियो के स्टोरेज, सुरक्षा, रिकॉर्ड की अवधि और अदालत में उसके इस्तेमाल को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।
याचिका जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विभिन्न प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में दाखिल की गई है। इसमें ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से जुड़े प्रदर्शन और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता के मुताबिक इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई और कथित बल प्रयोग की कई घटनाओं का रिकॉर्ड मुख्य रूप से आसपास मौजूद लोगों या प्रदर्शनकारियों द्वारा मोबाइल फोन से बनाए गए वीडियो से सामने आया था।जुलाई में सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाए जाने से जुड़े एक अन्य मामले में भी बॉडी-वर्न कैमरों और CCTV रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की मांग दिल्ली हाई कोर्ट के सामने आई थी। उस याचिका में कथित पुलिस कार्रवाई के वीडियो रिकॉर्ड और अन्य सबूतों को संरक्षित करने की मांग की गई थी। हालांकि हाई कोर्ट ने उस मामले में संबंधित PIL को आगे सुनने से इनकार कर दिया था और याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध दूसरे उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी थी।
नई PIL में याचिकाकर्ता का तर्क है कि बॉडी-वर्न कैमरों के लिए स्पष्ट और बाध्यकारी व्यवस्था होने से पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों के हितों की रक्षा की जा सकती है। ऐसी रिकॉर्डिंग से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किसी विवादित स्थिति में घटनाक्रम किस तरह आगे बढ़ा, किस स्तर पर बल प्रयोग किया गया और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों की भूमिका क्या रही।याचिका में कहा गया है कि केवल कैमरे उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए ऐसी SOP जरूरी है जिसमें यह स्पष्ट हो कि कैमरा कब चालू किया जाएगा, उसे कब बंद किया जा सकता है, रिकॉर्डिंग को कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा और फुटेज से किसी तरह की छेड़छाड़ न हो, इसके लिए क्या व्यवस्था होगी। इसके अलावा जांच या न्यायिक कार्यवाही के दौरान रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी निर्धारित करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता ने इस मुद्दे को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) और अनुच्छेद 21 से भी जोड़ा है। अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा से जुड़े अधिकारों से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रदान करता है। याचिका का दावा है कि भीड़ नियंत्रण के दौरान जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला स्पष्ट बॉडी-कैमरा ढांचा नहीं होने से इन अधिकारों के संरक्षण पर असर पड़ सकता है।इस बीच दिल्ली में हाल के विरोध प्रदर्शनों के दौरान बॉडी कैमरों का इस्तेमाल भी शुरू किया गया है। रिपोर्टों के अनुसार, नई दिल्ली क्षेत्र में फ्रंटलाइन ड्यूटी पर तैनात कुछ पुलिसकर्मियों को बॉडी-वर्न कैमरे उपलब्ध कराए गए हैं। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब प्रदर्शन प्रबंधन के दौरान पुलिसकर्मियों के आचरण को लेकर विभिन्न आरोप सामने आए हैं। हालांकि PIL में मांग इससे आगे जाकर दिल्ली पुलिस और RAF के सभी संबंधित कर्मियों के लिए एक समान और अनिवार्य नीति बनाने की है।
हाल के दिनों में जंतर-मंतर और मध्य दिल्ली में प्रदर्शन लगातार बढ़े हैं। पुलिस ने कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की और प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोका। पुलिस का कहना रहा है कि कुछ समूहों ने बिना अनुमति प्रदर्शन करने या प्रतिबंधित क्षेत्र में जाने की कोशिश की, जिसके कारण अतिरिक्त बल तैनात करना पड़ा।दूसरी ओर प्रदर्शनकारी समूहों की ओर से पुलिस कार्रवाई और बल प्रयोग को लेकर सवाल उठाए गए हैं। यही विवाद बॉडी-वर्न कैमरों की मांग को और महत्वपूर्ण बनाता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि पूरी कार्रवाई कैमरे में रिकॉर्ड हो तो बाद में किसी भी आरोप या शिकायत की निष्पक्ष जांच आसान हो सकती है।
बॉडी-वर्न कैमरे पुलिसकर्मियों की वर्दी पर लगाए जाने वाले छोटे कैमरे होते हैं, जिनके जरिए ड्यूटी के दौरान वीडियो और ऑडियो रिकॉर्ड किया जा सकता है। ऐसे उपकरणों का मकसद कानून लागू करने वाली एजेंसियों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना माना जाता है। हालांकि इनसे जुड़ी रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल में डेटा सुरक्षा, निजता और फुटेज के संरक्षण जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण होते हैं।याचिका में इसलिए केवल कैमरा पहनने को अनिवार्य करने की मांग नहीं की गई है, बल्कि रिकॉर्ड किए गए डेटा की सुरक्षा और प्रमाणिकता सुनिश्चित करने के लिए विस्तृत नियम बनाने की मांग भी की गई है। कोर्ट अब यह तय करेगा कि याचिका पर आगे किस तरह सुनवाई की जाए और संबंधित सरकारी एजेंसियों से जवाब मांगा जाए या नहीं।यदि अदालत इस मांग पर दिशा-निर्देश जारी करती है, तो दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों और भीड़ नियंत्रण की पुलिसिंग में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल मामला दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष है और बॉडी-वर्न कैमरों को अनिवार्य बनाने पर अंतिम फैसला अदालत तथा संबंधित सरकारी प्राधिकरणों की आगे की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
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