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New दिल्ली : दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को लाल किले पर इंडियन नेशनल आर्मी (INA) के शहीदों की याद में विशेष स्मारक बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी स्मारक का निर्माण करना और उसके लिए भूमि आवंटित करना सरकार के नीतिगत और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र का विषय है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के फैसले लेने के लिए न्यायपालिका सरकार को आदेश नहीं दे सकती।
चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच के सामने यह जनहित याचिका सुनवाई के लिए आई थी। याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी कि लाल किले पर इंडियन नेशनल आर्मी के जवानों की स्मृति में एक विशेष स्मारक बनाया जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि देश की आजादी की लड़ाई में INA के जवानों ने महत्वपूर्ण योगदान और बलिदान दिया था, इसलिए उनकी स्मृति को सम्मान देने के लिए लाल किले पर स्मारक बनाया जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने याचिका के कानूनी आधार पर सवाल उठाए। बेंच ने कहा कि अदालत किसी प्रस्ताव को लागू कराने के लिए सरकार के खिलाफ सीधे तौर पर 'रिट ऑफ मैंडमस' जारी नहीं कर सकती, खासकर तब जब मामला सरकार की नीति, भूमि आवंटन और स्मारक निर्माण जैसे प्रशासनिक फैसलों से जुड़ा हो।
रिट ऑफ मैंडमस एक ऐसा न्यायिक आदेश होता है, जिसके जरिए किसी सार्वजनिक प्राधिकरण को उसके कानूनी कर्तव्य का पालन करने का निर्देश दिया जा सकता है। हालांकि हाई कोर्ट ने इस मामले में कहा कि केवल इस आधार पर ऐसा आदेश जारी नहीं किया जा सकता कि स्मारक बनाने का प्रस्ताव रखा गया है और याचिकाकर्ता चाहता है कि सरकार उस प्रस्ताव को लागू करे।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि किसी खास जगह पर स्मारक बनाने का फैसला सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके लिए जमीन की उपलब्धता, प्रशासनिक निर्णय, योजना और अन्य पहलुओं पर सरकार को विचार करना होता है। ऐसे मामलों में न्यायालय सीधे हस्तक्षेप कर किसी विशेष स्थान पर स्मारक बनाने का आदेश नहीं दे सकता।
यह जनहित याचिका 'महान स्वतंत्रता सेनानी लल्टी राम ट्रस्ट' की ओर से दायर की गई थी। याचिका वकील नवीन बामेल और मानव त्रिवेदी के जरिए हाई कोर्ट में दाखिल की गई थी। याचिका में मांग की गई थी कि केंद्र सरकार को लाल किले पर INA के शहीदों के लिए स्मारक बनाने की दिशा में जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया जाए।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि इंडियन नेशनल आर्मी के सैनिकों का भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ऐसे में उनके बलिदान और संघर्ष की याद को संरक्षित करने तथा आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए एक विशेष स्मारक बनाया जाना चाहिए। इसके लिए लाल किले को स्थान के रूप में चुने जाने की मांग की गई थी।
हाई कोर्ट ने हालांकि याचिका की भावना पर टिप्पणी करने के बजाय उसके कानूनी पक्ष को देखा। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या किसी स्मारक निर्माण को लेकर सरकार को बाध्य करने का कोई ऐसा कानूनी अधिकार या दायित्व मौजूद है, जिसके आधार पर अदालत रिट जारी कर सके। बेंच ने स्पष्ट किया कि अदालत केवल इसलिए सरकार को कोई कदम उठाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती क्योंकि किसी संगठन या व्यक्ति ने स्मारक निर्माण का प्रस्ताव रखा है।
अदालत के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या स्मारक निर्माण जैसे नीतिगत मामले में न्यायिक आदेश जारी किया जा सकता है। बेंच ने इस पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि इस तरह के निर्णय कार्यपालिका यानी सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। कौन-सा स्मारक कहां बनाया जाए, उसके लिए कितनी जमीन दी जाए और किस तरह की योजना बनाई जाए, इन विषयों पर निर्णय लेना सरकार का काम है।
कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका का दायरा कानून के तहत तय है और वह किसी नीतिगत फैसले को केवल जनहित याचिका के आधार पर लागू कराने का आदेश नहीं दे सकती। अगर सरकार किसी स्मारक के निर्माण पर विचार करती है तो यह उसका प्रशासनिक निर्णय होगा। अदालत इस प्रक्रिया को अपने आदेश से नियंत्रित नहीं कर सकती।
सुनवाई के दौरान बेंच की टिप्पणियों से यह साफ हुआ कि अदालत स्मारक निर्माण की मांग के बजाय इस बात पर विचार कर रही थी कि क्या इस तरह की राहत देने का कोई कानूनी आधार मौजूद है। कोर्ट ने माना कि भूमि आवंटन और निर्माण से संबंधित फैसलों में कई प्रशासनिक और नीतिगत पहलू जुड़े होते हैं, जिनका निर्णय सरकार को ही करना होता है।
दिल्ली हाई कोर्ट के इस रुख के बाद लाल किले पर INA शहीदों के लिए स्मारक बनाने की मांग वाली जनहित याचिका को न्यायिक आदेश के जरिए आगे बढ़ाने का रास्ता नहीं खुल सका। अदालत ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि स्मारक बनाना या उसके लिए भूमि उपलब्ध कराना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आने वाला विषय है और ऐसे फैसले अदालत के आदेश से नहीं कराए जा सकते।
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