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नई दिल्ली में पेजेश्कियान की मौजूदगी से बढ़ी हलचल

Ratna Netam
14 Aug 2026 3:42 PM IST
नई दिल्ली में पेजेश्कियान की मौजूदगी से बढ़ी हलचल
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नई दिल्ली : ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान सितंबर में भारत की यात्रा कर सकते हैं। ईरानी सूत्रों के मुताबिक वह नई दिल्ली में प्रस्तावित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आएंगे। यह यात्रा ऐसे समय में होने जा रही है, जब ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य एवं कूटनीतिक तनाव बना हुआ है। ऐसे में पेजेश्कियान की भारत यात्रा को क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जानकारी के मुताबिक 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में प्रस्तावित है। भारत वर्ष 2026 में ब्रिक्स समूह की अध्यक्षता कर रहा है और इसी क्रम में वह इस शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। हालांकि ईरानी राष्ट्रपति की यात्रा और सम्मेलन की तारीखों को लेकर विस्तृत आधिकारिक कार्यक्रम की प्रतीक्षा है।
भारत ने वर्ष 2026 की शुरुआत में ब्राजील से ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली थी। भारत की अध्यक्षता का विषय “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” रखा गया है। इसका हिंदी अर्थ मजबूती, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण है। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत की अध्यक्षता मानव केंद्रित दृष्टिकोण और सदस्य देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग पर केंद्रित है। [भारतीय विदेश मंत्रालय](https://www.mea.gov.in/press-releases?dtl/40585/Launch_of_BRICS_India_2026_Logo_Theme_and_Website_by_the_External_Affairs_Minister=)
पेजेश्कियान की प्रस्तावित यात्रा के दौरान उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय मुलाकात होने की संभावना है। दोनों नेता भारत और ईरान के संबंधों के साथ पश्चिम एशिया की स्थिति, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, संपर्क परियोजनाओं और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर बातचीत कर सकते हैं। क्षेत्र में जारी संघर्ष और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा भी चर्चा का अहम विषय बन सकती है।
ईरान वर्ष 2024 में मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात के साथ ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य बना था। इसके बाद वर्ष 2025 में इंडोनेशिया भी समूह में शामिल हुआ। नए देशों के जुड़ने से ब्रिक्स का आर्थिक और राजनीतिक दायरा बढ़ा है। समूह में अब ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया समेत सदस्य देश शामिल हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के बीच इससे पहले अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात हुई थी। दोनों नेताओं ने उस बैठक में द्विपक्षीय सहयोग, क्षेत्रीय घटनाक्रम और संपर्क परियोजनाओं पर विचार विमर्श किया था। सितंबर की संभावित मुलाकात में दोनों देशों के बीच चल रही परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा हो सकती है।
भारत और ईरान के संबंधों में चाबहार बंदरगाह का विशेष महत्व है। यह परियोजना भारत को ईरान के माध्यम से अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, परिवहन और सांस्कृतिक संबंध भी लंबे समय से बने हुए हैं। हालांकि पश्चिमी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनाव ने आर्थिक सहयोग की गति को प्रभावित किया है।
पेजेश्कियान की प्रस्तावित भारत यात्रा से पहले ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए भारत आ चुके हैं। उन्होंने पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और वैश्विक शांति को बढ़ावा देने में भारत की भूमिका की सराहना की थी। ईरानी विदेश मंत्री ने कहा था कि तेहरान सैन्य संघर्ष का पक्षधर नहीं है और विवाद का समाधान बातचीत तथा कूटनीति के माध्यम से होना चाहिए।
अराघची ने भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ हॉर्मुज जलडमरूमध्य और व्यापारिक सुरक्षा से जुड़े विषयों पर भी चर्चा की थी। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव कच्चे तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
भारत के ईरान और अमेरिका दोनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। नई दिल्ली लगातार बातचीत, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करती रही है। ऐसे में ईरानी राष्ट्रपति की प्रस्तावित यात्रा के दौरान भारत पश्चिम एशिया में तनाव कम करने तथा संबंधित पक्षों के बीच संवाद को बढ़ावा देने की आवश्यकता दोहरा सकता है।
ब्रिक्स सम्मेलन में आर्थिक सहयोग, विकासशील देशों की प्राथमिकताएं, वैश्विक संस्थाओं में सुधार, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद, तकनीकी नवाचार और सतत विकास जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। पेजेश्कियान की मौजूदगी से सम्मेलन के दौरान पश्चिम एशिया का संकट भी प्रमुखता से उठ सकता है।
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