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संसद का मॉनसून सत्र अंतिम दौर में, महिला आरक्षण-परिसीमन और FCRA पर सस्पेंस

नई दिल्ली। संसद का मॉनसून सत्र अब अंतिम दौर में पहुंच गया है और इसके समापन में महज चार कार्यदिवस बाकी हैं। इसके बावजूद महिला आरक्षण, परिसीमन और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। सोमवार की लोकसभा कार्यसूची में इन प्रमुख विधेयकों को शामिल नहीं किया गया है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार सत्र के आखिरी दिनों में इन पर कोई बड़ा कदम उठाएगी या फिर इन्हें आगे के लिए टाल दिया जाएगा।
सरकार की ओर से इन मुद्दों को लेकर अब तक कोई अंतिम कार्यक्रम सामने नहीं आया है। वहीं, विपक्ष भी इन विधेयकों को लेकर अपने रुख पर कायम है। खासकर परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों को लेकर दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक दलों की चिंताएं अलग हैं, जबकि FCRA विधेयक पर भी विपक्षी दलों ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं। यही वजह है कि सरकार इन विधेयकों को लेकर राजनीतिक और संसदीय गणित को बेहद सावधानी से साधने की कोशिश कर रही है।
सोमवार की कार्यसूची से अहम बिल बाहर
सत्र के आखिरी सप्ताह की कार्यसूची में सरकार ने कुछ विधेयकों को सूचीबद्ध किया है, लेकिन FCRA विधेयक उसमें शामिल नहीं है। महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव भी सोमवार की सूची में नहीं हैं। संसद की कार्यवाही के अंतिम दिनों में कार्यसूची में बदलाव संभव है और बिजनेस एडवाइजरी कमेटी आगे के दिनों के कार्यक्रम पर फैसला कर सकती है।
यही कारण है कि इन विधेयकों को लेकर अभी पूरी तरह से दरवाजे बंद नहीं माने जा रहे हैं। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक सरकार की कोशिश हो सकती है कि पहले विभिन्न दलों के बीच सहमति का रास्ता तलाशा जाए और उसके बाद ही विधेयकों को सदन में लाया जाए।
सीटों का गणित क्यों है अहम?
लोकसभा में फिलहाल 543 निर्वाचित सीटें हैं। सामान्य विधेयक पारित कराने के लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत पर्याप्त होता है। लेकिन संविधान संशोधन विधेयक के लिए स्थिति अलग है। ऐसे विधेयक को पारित कराने के लिए सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई मत जरूरी होते हैं।
यानी महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े किसी संवैधानिक संशोधन को पारित कराना सामान्य कानून की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। यही वह बिंदु है जहां मौजूदा राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण हो जाता है।
लोकसभा की आधिकारिक पार्टी स्थिति में भाजपा के पास 240 सीटें हैं, जबकि कांग्रेस के पास 98 और समाजवादी पार्टी के पास 37 सीटें हैं। तृणमूल कांग्रेस के पास 28 और डीएमके के पास 22 सीटें दर्ज हैं। तेलुगु देशम पार्टी के 16 और जनता दल (यू) के 12 सांसद हैं।
भाजपा अकेले बहुमत से दूर, सहयोगियों की भूमिका अहम
भाजपा के पास 240 सीटें होने के कारण वह अपने दम पर 272 के सामान्य बहुमत के आंकड़े से नीचे है। ऐसे में सरकार को सामान्य विधेयकों के लिए भी सहयोगी दलों और कुछ गैर-एनडीए दलों के समर्थन की आवश्यकता पड़ सकती है।
वहीं, संवैधानिक संशोधन के मामले में गणित और जटिल हो जाता है। यहां केवल एनडीए की संख्या पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होगी। इसलिए सरकार के लिए विपक्ष के कुछ दलों को साथ लाना या कम से कम मतदान के दौरान व्यापक समर्थन हासिल करना अहम होगा।
यही वजह है कि परिसीमन और महिला आरक्षण के मुद्दे पर सरकार अलग-अलग राजनीतिक दलों से बातचीत के विकल्प खुले रखे हुए है। हाल के दिनों में कुछ विपक्षी दलों के रुख में नरमी के संकेत भी मिले हैं, जबकि कांग्रेस और उसके कई सहयोगी अभी सरकार के प्रस्तावों को लेकर सहमत नहीं हैं।
दक्षिणी राज्यों की चिंता बनी चुनौती
परिसीमन को लेकर सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संभावित बदलाव से जुड़ा है। दक्षिणी राज्यों के कई दलों की चिंता है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्विन्यास उन राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
यही वजह है कि डीएमके जैसे दल परिसीमन के प्रस्तावों को लेकर सावधानी बरत रहे हैं। दूसरी ओर, सरकार महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में परिसीमन को महत्वपूर्ण कड़ी के तौर पर देखती रही है। महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों में परिसीमन के बाद लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने की व्यवस्था से संबंधित प्रावधान हैं।
FCRA पर भी सरकार की रणनीति
FCRA संशोधन विधेयक भी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। विपक्षी दल इसके कुछ प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं और इसे लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में विधेयक को सोमवार की कार्यसूची में जगह नहीं मिलने को लेकर अटकलें तेज हुई हैं कि सरकार फिलहाल इसे आगे बढ़ाने से पहले राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश कर रही है।
कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि FCRA पर सरकार की रणनीति का संबंध परिसीमन को लेकर संभावित समर्थन जुटाने से हो सकता है। हालांकि, इसे लेकर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
अंतिम चार दिन बेहद महत्वपूर्ण
अब संसद के बचे हुए चार कार्यदिवस सरकार और विपक्ष दोनों के लिए अहम हैं। सरकार के सामने एक तरफ लंबित विधायी एजेंडा पूरा करने की चुनौती है, तो दूसरी ओर महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पर्याप्त राजनीतिक समर्थन जुटाना भी जरूरी है।
विपक्ष भी पूरी तरह सक्रिय है। कांग्रेस ने अपने सांसदों को 10, 11 और 12 अगस्त को संसद में उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी किया है। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण राजनीतिक और विधायी टकराव देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर, संसद के मॉनसून सत्र के आखिरी चार दिन बेहद महत्वपूर्ण होने जा रहे हैं। महिला आरक्षण, परिसीमन और FCRA जैसे मुद्दों पर सरकार के पास विकल्प खुले हैं, लेकिन इन पर आगे बढ़ने के लिए केवल सरकार की इच्छा पर्याप्त नहीं होगी। खासकर संवैधानिक संशोधन से जुड़े प्रस्तावों के लिए संख्या बल के साथ राजनीतिक सहमति भी जरूरी है। ऐसे में अब नजर इस बात पर है कि सरकार अंतिम दिनों में इन विधेयकों को सदन में लाती है या व्यापक राजनीतिक सहमति के लिए इन्हें आगे के सत्र तक टाल देती है।





