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दिल्ली-एनसीआर
केंद्र के FCRA बिल पर संसदीय पैनल तैयार अब होगी समीक्षा
Ratna Netam
3 Sept 2026 8:21 PM IST

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दिल्ली : केंद्र सरकार के **विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक 2026** को लेकर संसदीय प्रक्रिया तेज हो गई है। इस विधेयक की समीक्षा के लिए एक संसदीय समिति का गठन किया गया है, जिसमें अलग-अलग राजनीतिक दलों के सांसदों को शामिल किया गया है। समिति में **भाजपा सांसद निशिकांत दुबे** और **तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद कल्याण बनर्जी** समेत कई प्रमुख सांसदों को जगह दी गई है।
यह समिति विधेयक के विभिन्न प्रावधानों का अध्ययन करेगी और अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपेगी। समिति का उद्देश्य यह देखना होगा कि प्रस्तावित संशोधनों का सामाजिक संगठनों, गैर सरकारी संस्थाओं (NGO) और विदेशी फंडिंग व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा।
FCRA कानून क्या है
**FCRA यानी Foreign Contribution Regulation Act** भारत में विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों और संस्थाओं को नियंत्रित करने वाला कानून है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन का इस्तेमाल देश के हितों के खिलाफ न हो।
FCRA के तहत गैर सरकारी संगठनों, ट्रस्ट और अन्य संस्थाओं को विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए पंजीकरण कराना होता है। इसके अलावा उन्हें मिलने वाले विदेशी धन के इस्तेमाल और खर्च का रिकॉर्ड भी रखना पड़ता है।
सरकार समय-समय पर इस कानून में बदलाव करती रही है, ताकि विदेशी फंडिंग की निगरानी को मजबूत किया जा सके।
संशोधन विधेयक 2026 पर क्यों हो रही चर्चा
FCRA संशोधन विधेयक 2026 को लेकर सरकार का तर्क है कि विदेशी योगदान से जुड़ी व्यवस्था को और पारदर्शी और प्रभावी बनाने की जरूरत है।
सरकार का मानना है कि विदेशी धन का इस्तेमाल केवल तय उद्देश्यों के लिए होना चाहिए और नियमों के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई जरूरी है।
वहीं कुछ विपक्षी दल और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग इस तरह के संशोधनों को लेकर चिंता जताते रहे हैं। उनका कहना है कि नियमों में ज्यादा सख्ती से कई वैध संस्थाओं के काम प्रभावित हो सकते हैं।
संसदीय समिति की भूमिका
संसदीय समिति किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक की समीक्षा करने वाली एक अहम व्यवस्था होती है। समिति विधेयक के प्रावधानों का अध्ययन करती है, विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों से सुझाव ले सकती है और अपनी सिफारिशें देती है।
FCRA संशोधन विधेयक 2026 की समिति भी कानून के हर पहलू का अध्ययन करेगी।
समिति यह देखेगी कि—
* विदेशी फंडिंग की निगरानी कैसे बेहतर हो
* पारदर्शिता कैसे बढ़ाई जाए
* NGO और सामाजिक संस्थाओं के काम में अनावश्यक बाधाएं न आएं
* राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को कैसे मजबूत किया जाए
निशिकांत दुबे और कल्याण बनर्जी की भूमिका
समिति में शामिल भाजपा सांसद निशिकांत दुबे संसद में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। वह वित्त, राजनीति और राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विषयों पर अपनी राय रखते रहे हैं।
वहीं TMC सांसद कल्याण बनर्जी विपक्ष की ओर से एक प्रमुख आवाज माने जाते हैं। वह कई संसदीय बहसों में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं।
दोनों नेताओं की मौजूदगी से समिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भागीदारी सुनिश्चित होगी।
FCRA में पहले भी हुए हैं बदलाव
भारत में FCRA कानून में समय-समय पर बदलाव किए गए हैं। साल 2020 में भी इसमें कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए थे।
इन संशोधनों के तहत विदेशी योगदान के इस्तेमाल, हस्तांतरण और प्रशासनिक खर्च से जुड़े नियमों में बदलाव किए गए थे। सरकार ने इन बदलावों को पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए जरूरी बताया था।
हालांकि इन बदलावों को लेकर कुछ संगठनों ने चिंता जताई थी।
NGO क्षेत्र पर पड़ेगा असर
भारत में हजारों गैर सरकारी संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, सामाजिक विकास और राहत कार्यों में काम करते हैं। इनमें से कई संस्थाएं विदेशी सहायता पर भी निर्भर रहती हैं।
FCRA में किसी भी बदलाव का सीधा असर इन संस्थाओं के कामकाज पर पड़ सकता है।
इसी वजह से संसदीय समिति की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है, ताकि कानून बनाते समय सभी पक्षों की चिंताओं को ध्यान में रखा जा सके।
सरकार और विपक्ष के अलग-अलग तर्क
सरकार का कहना है कि विदेशी फंडिंग की निगरानी मजबूत करना जरूरी है ताकि धन का गलत इस्तेमाल रोका जा सके।
वहीं विपक्ष का कहना है कि नियम बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वास्तविक सामाजिक कार्य करने वाली संस्थाओं को परेशानी न हो।
संसदीय समिति में दोनों पक्षों के प्रतिनिधि होने से इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की संभावना है।
आगे की प्रक्रिया
अब समिति विधेयक के विभिन्न पहलुओं पर विचार करेगी। इसके बाद वह अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसमें संशोधन को लेकर सुझाव दिए जाएंगे।
संसद में विधेयक पर आगे की कार्रवाई समिति की रिपोर्ट के आधार पर हो सकती है।
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