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नई दिल्ली। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान (रिटायर्ड) ने ऑपरेशन सिंदूर से पहले भारत की सैन्य रणनीति को लेकर हुई उच्चस्तरीय बैठक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य बल के इस्तेमाल को लेकर अहम निर्णय 29 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिया गया था। मंगलवार को नई दिल्ली में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के एक कार्यक्रम में चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर से पहले हुई चर्चाओं का पहली बार विस्तार से ब्योरा दिया।
जनरल चौहान के मुताबिक, बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सैन्य नेतृत्व के सामने स्पष्ट किया कि भारत को सीमा पार से होने वाले आतंकवाद के खिलाफ कड़ा जवाब देना होगा। उन्होंने कहा कि देश अब पाकिस्तान की ओर से प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा और उसे एक बड़ा सबक सिखाने की जरूरत है।
सैन्य जवाब को लेकर हुई अहम चर्चा
पूर्व CDS ने बताया कि बैठक के दौरान पाकिस्तान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई के स्वरूप को लेकर विस्तार से चर्चा हुई। इस दौरान यह विचार सामने आया कि जवाब ऐसा होना चाहिए जिसकी पाकिस्तान को उम्मीद तक न हो।
चौहान के अनुसार, बैठक में कार्रवाई की प्रकृति को लेकर ‘सोच से परे’ और ‘अकल्पनीय’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इसका उद्देश्य ऐसा सैन्य विकल्प तैयार करना था, जो पारंपरिक प्रतिक्रियाओं से अलग हो और पाकिस्तान को भारत की कार्रवाई का अंदाजा पहले से न हो सके।
यह बैठक पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, तीनों सेनाओं के प्रमुख और तत्कालीन CDS जनरल अनिल चौहान शामिल थे।
प्रधानमंत्री ने दी कार्रवाई के समय की छूट
जनरल चौहान ने बताया कि प्रधानमंत्री ने सैन्य नेतृत्व को कार्रवाई के समय को लेकर पर्याप्त स्वतंत्रता दी थी। हालांकि, इसके साथ उन्होंने एक महत्वपूर्ण शर्त भी रखी थी कि अभियान में किसी भी तरह की विफलता नहीं होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री के इस निर्देश का मतलब यह था कि सैन्य नेतृत्व को अपनी रणनीतिक और परिचालन जरूरतों के अनुसार कार्रवाई का समय तय करने की स्वतंत्रता थी, लेकिन मिशन की सफलता सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकता थी।
चौहान के मुताबिक, इस निर्देश ने सैन्य नेतृत्व को योजना तैयार करने में आवश्यक स्वतंत्रता दी। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया गया कि अभियान को पूरी तैयारी और सटीकता के साथ अंजाम देना होगा।
पहलगाम हमले के बाद बढ़ा था तनाव
पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव तेजी से बढ़ा था। हमले के बाद भारत में आतंकवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग तेज हुई। सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान के सामने यह चुनौती थी कि पाकिस्तान से जुड़े आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ ऐसी कार्रवाई की जाए, जिससे आतंकवाद को लेकर भारत की नीति का स्पष्ट संदेश जाए।
इसी पृष्ठभूमि में 29 अप्रैल की उच्चस्तरीय बैठक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बैठक में राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य नेतृत्व ने संभावित विकल्पों पर विचार किया। जनरल चौहान के अनुसार, चर्चा का केंद्रीय बिंदु यह था कि भारत को किस तरह की सैन्य कार्रवाई करनी चाहिए और उसका स्वरूप ऐसा कैसे रखा जाए कि पाकिस्तान को इसकी पहले से जानकारी न हो।
तीनों सेनाओं के नेतृत्व की मौजूदगी
बैठक में थल सेना, नौसेना और वायु सेना के प्रमुखों की मौजूदगी ने इसे सैन्य दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाया। तीनों सेनाओं के शीर्ष नेतृत्व के साथ CDS और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े शीर्ष अधिकारियों ने संभावित कार्रवाई के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया।
ऐसी उच्चस्तरीय बैठकों में सैन्य कार्रवाई की रणनीति, उपलब्ध विकल्पों, जोखिम और संभावित परिणामों का आकलन किया जाता है। जनरल चौहान की ओर से साझा की गई जानकारी से यह संकेत मिलता है कि ऑपरेशन सिंदूर को लेकर निर्णय प्रक्रिया में राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य नेतृत्व के बीच व्यापक समन्वय हुआ था।
‘अकल्पनीय’ कार्रवाई पर जोर
जनरल चौहान ने अपने संबोधन में खास तौर पर इस बात का उल्लेख किया कि चर्चा में ऐसी कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया गया, जिसे पाकिस्तान पहले से सोच भी न सके। ‘सोच से परे’ और ‘अकल्पनीय’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल इसी रणनीतिक सोच को दर्शाता था।
इसका उद्देश्य केवल सैन्य कार्रवाई करना नहीं, बल्कि ऐसी प्रतिक्रिया देना था जिसका प्रभाव पाकिस्तान के आतंकवाद समर्थित रवैये पर पड़े। भारत की ओर से कार्रवाई की योजना बनाते समय आश्चर्य के तत्व को महत्वपूर्ण माना गया।
सैन्य नेतृत्व के लिए चुनौती
प्रधानमंत्री की ओर से कार्रवाई के समय को लेकर छूट मिलने के बावजूद मिशन में किसी भी तरह की विफलता न होने की शर्त ने सैन्य नेतृत्व के सामने बड़ी जिम्मेदारी रखी। इसका अर्थ था कि अभियान की योजना, खुफिया जानकारी, लक्ष्य चयन और सैन्य तैयारियों को अत्यंत सावधानी के साथ अंतिम रूप देना जरूरी था।
पूर्व CDS के बयान से यह भी पता चलता है कि ऑपरेशन सिंदूर अचानक लिया गया कोई फैसला नहीं था। इसके पीछे उच्चस्तरीय राजनीतिक और सैन्य विचार-विमर्श तथा विस्तृत रणनीतिक योजना शामिल थी।
पहली बार सामने आया विस्तृत विवरण
जनरल अनिल चौहान का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर से पहले की चर्चाओं और निर्णय प्रक्रिया के बारे में सार्वजनिक रूप से विस्तार से जानकारी दी। उनके मुताबिक, 29 अप्रैल की बैठक में पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य जवाब की दिशा स्पष्ट हुई और प्रधानमंत्री ने सैन्य नेतृत्व को कार्रवाई की जिम्मेदारी सौंपते हुए उसकी सफलता सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के कार्यक्रम में दिए गए इस विवरण से ऑपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि और भारत की रणनीतिक सोच के कुछ महत्वपूर्ण पहलू सामने आए हैं। जनरल चौहान के अनुसार, पाकिस्तान को ऐसा जवाब देने की आवश्यकता पर सहमति बनी थी जिसकी उसने कल्पना भी न की हो और जिसकी सफलता को लेकर कोई समझौता न किया जाए।





