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डिजिटल ऑडिट पर ओम बिरला का बड़ा सुझाव, विधानसभाओं में बढ़ेगी पारदर्शिता
Ratna Netam
4 Nov 2026 5:12 PM IST

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नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम। देश में सरकारी धन के इस्तेमाल को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने महत्वपूर्ण पहल करने पर जोर दिया है। उन्होंने संसद और राज्य विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों (पीएसी) को आधुनिक तकनीक से सशक्त बनाने तथा ऑडिट संबंधी आपत्तियों की निगरानी के लिए बेहतर डिजिटल व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता बताई। इस पहल का उद्देश्य सरकारी खर्च की समीक्षा को प्रभावी बनाना, लंबित ऑडिट मामलों का समय पर निपटारा सुनिश्चित करना और सार्वजनिक धन के उपयोग में जवाबदेही बढ़ाना है।केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में 3 नवंबर को संसद और राज्य विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों के अध्यक्षों के दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए ओम बिरला ने कहा कि जनता के पैसे का एक-एक रुपया निर्धारित उद्देश्य के लिए खर्च होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि सरकारी योजनाओं और परियोजनाओं पर खर्च की गई राशि का हिसाब रखने के साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि संबंधित योजनाओं से जनता को अपेक्षित लाभ मिला या नहीं।लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि लोक लेखा समितियां संसदीय लोकतंत्र की महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं। इन समितियों की जिम्मेदारी केवल सरकारी विभागों के खर्च का परीक्षण करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि सार्वजनिक संसाधनों का सही उपयोग हो। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से वित्तीय निगरानी, समीक्षा और अनुशंसाओं पर कार्रवाई की व्यवस्था मजबूत करने का आग्रह किया।
डिजिटल तकनीक से मजबूत होगी ऑडिट निगरानी
लोकसभा अध्यक्ष ने वित्तीय निगरानी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), डेटा एनालिटिक्स और अन्य आधुनिक तकनीकों के उपयोग को महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना था कि तकनीक की सहायता से सरकारी खर्च के बड़े आंकड़ों का विश्लेषण करना आसान हो सकता है। इससे खर्च के पैटर्न को समझने, संभावित वित्तीय अनियमितताओं की पहचान करने और ऑडिट आपत्तियों पर हुई कार्रवाई की निगरानी करने में मदद मिलेगी।संसद और विधानसभाओं के लिए साझा डिजिटल निगरानी व्यवस्था का विचार इसी दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसी व्यवस्था विकसित होने पर विभिन्न राज्यों की लोक लेखा समितियां ऑडिट से संबंधित सूचनाओं और कार्रवाई की प्रगति की समीक्षा अधिक व्यवस्थित तरीके से कर सकेंगी। हालांकि, साझा मंच के औपचारिक गठन, तकनीकी स्वरूप और इसे लागू करने की समयसीमा की घोषणा अभी सामने नहीं आई है।
लंबित ऑडिट आपत्तियों के निपटारे पर विशेष जोर
ओम बिरला ने लंबे समय से लंबित ऑडिट आपत्तियों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में सामने आने वाली वित्तीय कमियों और अनियमितताओं से संबंधित मामलों का समयबद्ध समाधान जरूरी है।कई बार ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों पर संबंधित विभागों से जवाब मिलने और सुधारात्मक कदम उठाने में काफी समय लग जाता है। इससे वित्तीय जवाबदेही की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। लोकसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि ऑडिट संबंधी टिप्पणियों पर केवल जवाब देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आवश्यक सुधारों को वास्तविक रूप से लागू करना भी जरूरी है।उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई। उनका मानना है कि दोनों स्तरों पर निगरानी व्यवस्था मजबूत होने से लंबित मामलों के समाधान में तेजी आ सकती है।
सरकारी योजनाओं के परिणामों की भी हो समीक्षा
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि लोक लेखा समितियों को अपने काम का दायरा सरकारी खर्च की औपचारिक जांच तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उन्हें यह भी देखना चाहिए कि जिस उद्देश्य से योजनाओं के लिए धन आवंटित किया गया था, वह उद्देश्य पूरा हुआ या नहीं।उदाहरण के तौर पर, यदि किसी क्षेत्र में सड़क निर्माण, पेयजल व्यवस्था, शिक्षा या स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास के लिए राशि स्वीकृत की गई है, तो समीक्षा में केवल खर्च का विवरण ही नहीं, बल्कि परियोजना की वास्तविक स्थिति और जनता को मिले लाभ को भी महत्व दिया जाना चाहिए।यह दृष्टिकोण सरकारी योजनाओं के मूल्यांकन को अधिक परिणाम-केंद्रित बना सकता है। इससे उन परियोजनाओं की पहचान करने में भी सहायता मिल सकती है, जिनमें धन खर्च होने के बावजूद अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुए।
राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर काम करने की अपील
ओम बिरला ने लोक लेखा समितियों के कामकाज में राजनीतिक सहमति और निष्पक्षता को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक धन की निगरानी ऐसा विषय है, जिसमें राजनीतिक दलों को मतभेदों से ऊपर उठकर काम करना चाहिए।उन्होंने लोक लेखा समिति की अध्यक्षता विपक्ष के सदस्य को सौंपने की संसदीय परंपरा का भी उल्लेख किया। यह व्यवस्था वित्तीय निगरानी में स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है।लोकसभा अध्यक्ष ने समितियों से विभिन्न राज्यों में अपनाए जा रहे सफल तरीकों और नवाचारों को साझा करने का आग्रह किया। इससे बेहतर कार्यप्रणालियों को अन्य विधानसभाओं में अपनाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
दो दिवसीय सम्मेलन में वित्तीय जवाबदेही पर मंथन
तिरुवनंतपुरम में 3 और 4 नवंबर को आयोजित सम्मेलन का विषय 'ऑडिट, जवाबदेही और सुशासन—लोक लेखा समिति की बदलती भूमिका' रखा गया है। इसमें संसद, राज्य विधानसभाओं और केंद्रशासित प्रदेशों की विधायी संस्थाओं से जुड़े प्रतिनिधि वित्तीय निगरानी को मजबूत बनाने के उपायों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।सम्मेलन में सरकारी खर्च की जांच, ऑडिट रिपोर्ट पर कार्रवाई, तकनीक के उपयोग और संस्थागत सहयोग जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई है। इन चर्चाओं से भविष्य में वित्तीय निगरानी के लिए अधिक प्रभावी और तकनीक आधारित व्यवस्थाएं विकसित करने की दिशा मिल सकती है।विशेषज्ञों के अनुसार, यदि राज्य विधानसभाओं में ऑडिट संबंधी सूचनाओं की डिजिटल निगरानी मजबूत होती है, तो सरकारी विभागों की जवाबदेही बढ़ाने में सहायता मिल सकती है। इससे लंबित आपत्तियों की पहचान, उनके समाधान की प्रगति और सुधारात्मक कदमों का मूल्यांकन अधिक व्यवस्थित हो सकेगा।लोकसभा अध्यक्ष का संदेश स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती के लिए सार्वजनिक धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है। आधुनिक डिजिटल तकनीक और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय के माध्यम से वित्तीय निगरानी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
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