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नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव 2026 के नतीजों में कांग्रेस से संबद्ध छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) केंद्रीय पैनल के चार में से एक भी पद नहीं जीत सका। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के तीन पदों पर जीत दर्ज की, जबकि उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन विजयी रहे। पिछले चुनाव में उपाध्यक्ष पद जीतने वाली NSUI इस बार केंद्रीय पैनल में कोई सीट हासिल नहीं कर सकी।
इन नतीजों की चर्चा इसलिए भी अधिक हो रही है क्योंकि कांग्रेस और उससे जुड़े युवा संगठनों ने हाल के महीनों में छात्रों और युवाओं तक पहुंच बढ़ाने के लिए ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को प्रमुखता दी है। राहुल गांधी ने शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक, भर्ती में देरी और विद्यार्थियों से जुड़े दूसरे मुद्दों को लेकर अलग-अलग शहरों में छात्रों के साथ संवाद किया है। 19 सितंबर को DUSU के नतीजे आने के दिन ही राहुल गांधी इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल हुए।
DUSU चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण अध्यक्ष पद पर मुकाबला काफी करीबी रहा। मतगणना के शुरुआती और मध्य चरण में NSUI के विजय शंकर मीणा ने ABVP उम्मीदवार यश डबास को कड़ी टक्कर दी। 14वें राउंड में तो NSUI प्रत्याशी एक वोट से आगे थे। हालांकि बाद के राउंड में तस्वीर बदल गई और अंतिम परिणाम में यश डबास ने अध्यक्ष पद जीत लिया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि NSUI का शून्य पर रहना यह नहीं बताता कि संगठन हर पद पर मुकाबले से बाहर था; कम से कम अध्यक्ष पद पर चुनाव काफी प्रतिस्पर्धी रहा।
चुनाव का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू दीपांशु शौकीन की जीत रही। दीपांशु पहले NSUI से जुड़े थे और संगठन से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उपाध्यक्ष पद पर मैदान में उतरे। उन्होंने जीत दर्ज कर NSUI और ABVP दोनों के उम्मीदवारों को पीछे छोड़ दिया। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 17 वर्षों बाद DUSU केंद्रीय पैनल में किसी निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत हासिल की है।
दीपांशु की जीत NSUI के लिए संगठनात्मक दृष्टि से भी चर्चा का विषय है। संगठन जिस नेता को टिकट नहीं दे सका, उसी ने निर्दलीय चुनाव लड़कर केंद्रीय पैनल में जगह बनाई। ऐसे में उम्मीदवार चयन और आंतरिक संगठन से जुड़े फैसलों पर भी सवाल उठ सकते हैं। हालांकि उम्मीदवार चयन ने कुल चुनाव परिणाम को कितना प्रभावित किया, इसका निश्चित निष्कर्ष केवल नतीजों के आधार पर नहीं निकाला जा सकता।
ABVP ने इस चुनाव में अध्यक्ष के अलावा सचिव और संयुक्त सचिव पद भी अपने नाम किए। सचिव पद पर ABVP उम्मीदवार को 21,650 वोट मिले, जबकि NSUI उम्मीदवार को 14,869 वोट मिले। संयुक्त सचिव पद पर ABVP प्रत्याशी को 16,615 वोट मिले। इस तरह चार सदस्यीय केंद्रीय पैनल में तीन पद ABVP और एक पद निर्दलीय उम्मीदवार के पास गया।
पिछले साल के मुकाबले NSUI का प्रदर्शन सीटों के लिहाज से कमजोर रहा। पिछले चुनाव में संगठन ने उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की थी, जबकि इस बार उसका खाता नहीं खुला। यही वजह है कि मौजूदा परिणाम को कांग्रेस के छात्र संगठन के लिए राजनीतिक और संगठनात्मक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
इन चुनावों से पहले NSUI ने छात्र हितों से जुड़े कई मुद्दे उठाए थे। उसके चुनावी अभियान में सस्ते छात्र आवास, मेट्रो कन्सेशन, 24 घंटे लाइब्रेरी, सब्सिडी वाली कैंटीन, बेहतर वाई-फाई, स्वच्छ पेयजल, मेंटल हेल्थ सपोर्ट और शैक्षणिक सुधार जैसे विषय शामिल थे। इसके अलावा रोजगार, पेपर लीक, कैंपस सुरक्षा और विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही भी प्रचार का हिस्सा रहे।
दूसरी तरफ कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को आगे बढ़ाया है। राहुल गांधी ने जून में पार्टी संगठन से इस अभियान को समर्थन देने की अपील की थी। अभियान में पेपर लीक, परीक्षाओं का रद्द होना, सरकारी भर्ती में देरी, बेरोजगारी और शिक्षा की लागत जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई।
इंदौर में कार्यक्रम से पहले कांग्रेस ने युवाओं से जुड़ने के लिए अपने पारंपरिक राजनीतिक कार्यक्रमों के प्रारूप में भी बदलाव किया। नेताओं ने कैफे, कॉलेज, पुस्तकालय और हॉस्टल जैसी जगहों पर छात्रों से संपर्क किया। क्रिकेट और संगीत के कार्यक्रमों के जरिए भी जेन-जी से संवाद करने की कोशिश की गई।
DUSU परिणाम आने के बाद भाजपा नेताओं ने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को लेकर कांग्रेस पर राजनीतिक हमला भी किया। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने चुनाव नतीजों को इस अभियान से जोड़ते हुए तंज किया। यह भाजपा की राजनीतिक प्रतिक्रिया है; चुनाव परिणामों से अकेले यह स्थापित नहीं होता कि किसी राष्ट्रीय अभियान को युवाओं ने व्यापक रूप से स्वीकार या खारिज कर दिया है।
इसी तरह DUSU चुनाव को पूरे देश के युवाओं की राजनीतिक पसंद का प्रतिनिधि मानना भी सावधानी की मांग करता है। यह दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों का चुनाव है और इसके परिणाम वहां के मतदाताओं, उम्मीदवारों, संगठनों और स्थानीय कैंपस मुद्दों से प्रभावित होते हैं। इसलिए इन नतीजों को देशभर के युवा मतदाताओं की राय का प्रत्यक्ष पैमाना नहीं माना जा सकता।
फिर भी कांग्रेस और NSUI के लिए इस परिणाम का संगठनात्मक महत्व है। ‘छात्रों की गूंज’ जैसे अभियान के जरिए पार्टी शिक्षा और रोजगार के मुद्दों पर युवाओं के बीच सक्रियता बढ़ा रही है। ऐसे समय में देश के सबसे चर्चित छात्रसंघ चुनावों में उसकी छात्र इकाई का केंद्रीय पैनल में एक भी पद नहीं जीतना संगठन को अपनी कैंपस रणनीति, उम्मीदवार चयन और छात्र संपर्क की समीक्षा का कारण दे सकता है।
दिलचस्प बात यह रही कि जिस समय दिल्ली में NSUI की हार की तस्वीर साफ हुई, उसी दिन राहुल गांधी इंदौर में छात्रों के बीच थे। वहां उन्होंने कहा कि छात्र देश का भविष्य हैं और शिक्षा तथा रोजगार के अवसरों से जुड़े सवालों को उठाया। उन्होंने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए शिक्षा पर सभी के अधिकार की बात कही।
कांग्रेस के लिए अब सवाल यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं से संवाद के अभियान और विश्वविद्यालय परिसरों में उसके छात्र संगठन की चुनावी रणनीति के बीच तालमेल किस तरह विकसित होता है। DUSU के परिणाम बताते हैं कि मुद्दों पर सक्रियता और चुनाव में उन्हें वोट में बदलना अलग-अलग चुनौतियां हैं।
2026 के DUSU नतीजों की अंतिम तस्वीर स्पष्ट है—ABVP ने चार में से तीन केंद्रीय पद जीते, निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद हासिल किया और NSUI कोई पद नहीं जीत सका। अध्यक्ष पद पर NSUI ने कड़ी चुनौती जरूर दी, लेकिन अंतिम जीत उसके हाथ नहीं आई। ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के बीच आया यह परिणाम कांग्रेस और NSUI के लिए अपनी छात्र राजनीति की रणनीति का आकलन करने वाला एक महत्वपूर्ण डेटा-पॉइंट है, लेकिन इससे देशभर के युवाओं के राजनीतिक रुझान पर व्यापक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
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