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डिजिटल डकैती करने वालों पर कसेगा शिकंजा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश

Rajeshwari Nishad
28 Oct 2026 1:21 PM IST
डिजिटल डकैती करने वालों पर कसेगा शिकंजा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश
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Digital Arrest Scam: देशभर में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बुजुर्गों और रिटायर्ड कर्मचारियों से करोड़ों रुपये की ठगी के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस तरह के संगठित साइबर अपराधों को 'डिजिटल डकैती' करार दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे अपराधियों के खिलाफ बेहद सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है। अदालत ने विशेष रूप से उन मामलों पर चिंता जताई, जिनमें अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई या अन्य जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर बुजुर्गों को डराते हैं और उनकी जिंदगीभर की जमा पूंजी हड़प लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के अपराध सामान्य धोखाधड़ी से कहीं अधिक गंभीर हैं। यह टिप्पणी देश के अलग-अलग राज्यों में दर्ज साइबर अपराध के मामलों को एक साथ जोड़ने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। बाद में याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी करने वालों पर भड़का सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान देश में तेजी से सामने आ रहे डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की।चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि संगठित साइबर अपराधी विशेष रूप से बुजुर्गों और सेवानिवृत्त लोगों को निशाना बना रहे हैं। कई मामलों में पीड़ितों की पूरी जिंदगी की बचत कुछ ही घंटों या दिनों में ठगों के खातों में पहुंच जाती है।अदालत ने इस प्रकार की धोखाधड़ी को डिजिटल डकैती बताते हुए कहा कि इससे निपटने के लिए कठोर कानूनी कार्रवाई जरूरी है।
सीजेआई ने टिप्पणी की कि यदि कानून में मुकदमे की सुनवाई से पहले ऐसे अपराधियों के विरुद्ध किसी प्रकार की कठोर वैधानिक कार्रवाई की गुंजाइश मौजूद है, तो अपराध की गंभीरता को देखते हुए उस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
हालांकि, अदालत की इस मौखिक टिप्पणी को बिना मुकदमे के सजा देने का आदेश नहीं समझा जाना चाहिए। किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने और दंडित करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
देशभर की FIR एक साथ जोड़ने की मांग पर हुई सुनवाई
यह मामला उस समय सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, जब एक याचिकाकर्ता ने देश के अलग-अलग हिस्सों में दर्ज साइबर अपराध के मामलों को एक साथ जोड़ने की मांग की।याचिका में विभिन्न राज्यों में दर्ज मामलों की जांच और कानूनी कार्यवाही को लेकर राहत मांगी गई थी।सुनवाई के दौरान अदालत ने डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों की गंभीरता को रेखांकित किया। कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट हुआ कि संगठित साइबर ठगी को केवल व्यक्तिगत आर्थिक नुकसान का मामला नहीं माना जा सकता।इस तरह के अपराध देशभर में कानून-व्यवस्था, बैंकिंग सुरक्षा और आम नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा के लिए चुनौती बन चुके हैं।सुनवाई के दौरान अदालत का कड़ा रुख सामने आने के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस लेने का निर्णय लिया।सुप्रीम कोर्ट ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए मामले का निपटारा कर दिया।इस सुनवाई में अदालत ने सभी साइबर अपराध मामलों को एक साथ जोड़ने का कोई आदेश पारित नहीं किया।
बुजुर्ग और रिटायर्ड कर्मचारी क्यों बन रहे निशाना?
डिजिटल अरेस्ट के मामलों में साइबर अपराधियों का सबसे बड़ा निशाना वरिष्ठ नागरिक और सेवानिवृत्त कर्मचारी बन रहे हैं।इन लोगों के पास अक्सर पेंशन, रिटायरमेंट फंड और जीवनभर की बचत के रूप में बड़ी रकम होती है। अपराधी इसी जमा पूंजी को हड़पने के लिए डर और दबाव का सहारा लेते हैं।कई मामलों में ठग खुद को पुलिस अधिकारी, सीबीआई कर्मचारी, प्रवर्तन निदेशालय या अन्य सरकारी एजेंसियों का प्रतिनिधि बताते हैं।वे पीड़ित को फोन करके कहते हैं कि उसका आधार कार्ड, बैंक खाता या मोबाइल नंबर किसी आपराधिक गतिविधि में इस्तेमाल हुआ है।इसके बाद गिरफ्तारी, संपत्ति जब्ती या कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर पीड़ित से पैसे ट्रांसफर कराए जाते हैं।सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि वरिष्ठ नागरिकों से उनकी मेहनत की कमाई छीनने वाले ऐसे अपराध बेहद गंभीर हैं और इनके खिलाफ कठोर कदम उठाए जाने चाहिए।
क्या है डिजिटल अरेस्ट और कैसे चलता है ठगी का खेल?
डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का ऐसा तरीका है, जिसमें अपराधी किसी व्यक्ति को फोन या वीडियो कॉल के जरिए मानसिक रूप से बंधक बना लेते हैं।अपराधी फर्जी पुलिस वर्दी पहनकर या नकली सरकारी कार्यालय का दृश्य दिखाकर लोगों को विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि वे किसी गंभीर मामले की जांच कर रहे हैं।कई बार फर्जी गिरफ्तारी वारंट और अदालत के आदेश भी दिखाए जाते हैं। पीड़ित को बताया जाता है कि वह जांच पूरी होने तक वीडियो कॉल बंद नहीं कर सकता।इसके बाद बैंक खातों की जांच, सुरक्षा जमा या मामले से नाम हटाने के बहाने रकम मांगी जाती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के कानून में डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई वैध गिरफ्तारी प्रक्रिया नहीं है। कोई भी वास्तविक जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को डिजिटल रूप से गिरफ्तार करके पैसे जमा कराने का आदेश नहीं देती।
पहले भी डिजिटल ठगी पर सख्त निर्देश दे चुका है सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अपराधों को लेकर पहले भी कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं।अगस्त 2026 में अदालत ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और विभिन्न जांच एजेंसियों को साइबर ठगी रोकने के लिए बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया था।अदालत ने संदिग्ध बैंक खातों के इस्तेमाल को रोकने, ठगी की रकम को सुरक्षित करने और पीड़ितों को पैसा वापस दिलाने की प्रक्रिया मजबूत करने के निर्देश भी दिए थे।सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से साइबर अपराध के मामलों में त्वरित कार्रवाई के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं अपनाने को कहा था।
अदालत की चिंता यह रही है कि साइबर अपराधी कई बैंक खातों और अलग-अलग राज्यों में फैले नेटवर्क का इस्तेमाल करके ठगी की रकम इधर-उधर भेज देते हैं। इससे जांच एजेंसियों के लिए पैसे का पता लगाना और उन्हें बरामद करना मुश्किल हो जाता है।
डिजिटल अरेस्ट से बचने के लिए क्या करें?
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और सरकारी एजेंसियों के अनुसार, ऐसे मामलों में जागरूकता सबसे बड़ा बचाव है।अगर कोई अनजान व्यक्ति खुद को पुलिस, सीबीआई या ईडी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी की धमकी देता है, तो उसकी बातों से घबराने की जरूरत नहीं है।किसी भी अनजान व्यक्ति को बैंक खाते की जानकारी, ओटीपी, पासवर्ड या व्यक्तिगत दस्तावेज नहीं देने चाहिए।अगर कोई व्यक्ति जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने को कहे, तो तुरंत कॉल बंद करके संबंधित पुलिस स्टेशन से संपर्क करना चाहिए।
साइबर ठगी का शिकार होने पर तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। इसके अलावा सरकारी पोर्टल cybercrime.gov.in पर भी शिकायत की सुविधा उपलब्ध है।
शिकायत जितनी जल्दी दर्ज कराई जाएगी, ठगी की रकम को बैंकिंग प्रणाली में रोकने की संभावना उतनी बेहतर हो सकती है।सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी से स्पष्ट है कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर हो रही संगठित ठगी को न्यायपालिका बेहद गंभीरता से देख रही है। अदालत ने अपराधियों के प्रति कठोर रुख अपनाने की जरूरत बताई है। साथ ही ऐसे मामलों में नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा और कानूनी अधिकारों की रक्षा करना भी महत्वपूर्ण है।
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