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महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, SEBI को निर्देश देने से अदालत का इनकार
Ratna Netam
29 Oct 2026 2:19 PM IST

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नई दिल्ली : 29 अक्टूबर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा को बड़ा झटका देते हुए उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के वास्तविक लाभकारी मालिकों की पहचान सार्वजनिक करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक ऐसा करने के लिए कोई मौजूदा कानूनी या नियामकीय ढांचा नहीं है, तब तक न्यायालय इस तरह का अनिवार्य निर्देश जारी नहीं कर सकता।
तीन जजों की पीठ ने सुनाया फैसला
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति डीके उपाध्याय की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए वह ऐसा निर्देश नहीं दे सकती, जिसके लिए पहले से कोई स्पष्ट कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं है।पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि निवेशकों की जानकारी नियामक संस्थाओं के पास उपलब्ध होने और उस जानकारी को आम जनता के लिए सार्वजनिक करने में महत्वपूर्ण अंतर है।अदालत के मुताबिक, सेबी को निवेश संबंधी आवश्यक जानकारियां उपलब्ध कराई जाती हैं, जिससे नियामकीय निगरानी संभव होती है। हालांकि, सभी निवेशकों के अंतिम लाभकारी स्वामित्व और पोर्टफोलियो को सार्वजनिक करने का अनिवार्य प्रावधान वर्तमान व्यवस्था में नहीं है।
महुआ मोइत्रा की याचिका में क्या थी मांग?
महुआ मोइत्रा ने अपनी याचिका में भारतीय शेयर बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने मांग की थी कि सेबी को निर्देश दिया जाए कि वह AIFs, FPIs और उनसे जुड़े मध्यस्थों के अंतिम लाभकारी मालिकों तथा निवेश पोर्टफोलियो की जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य बनाए।याचिका में आशंका जताई गई थी कि विभिन्न विदेशी संस्थाओं और निवेश फंडों के माध्यम से भारतीय कंपनियों में बड़ी रकम निवेश की जाती है, लेकिन कई मामलों में आम निवेशकों को यह जानकारी नहीं मिल पाती कि इन निवेशों के पीछे वास्तविक व्यक्ति कौन हैं।मोइत्रा की ओर से दलील दी गई कि ऐसी स्थिति से शेयर बाजार में पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है और संभावित बाजार हेरफेर की पहचान करना कठिन हो सकता है।
प्रशांत भूषण ने उठाए गंभीर सवाल
महुआ मोइत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय कंपनियों में विदेशी निवेश के पीछे वास्तविक मालिकों की जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है, ताकि निवेशकों को पता चल सके कि बाजार में पूंजी किसके माध्यम से लगाई जा रही है।भूषण ने आशंका जताई कि कुछ परिस्थितियों में कंपनियों के प्रवर्तक निवेश फंडों या विदेशी निवेश संस्थाओं का इस्तेमाल कर अपने ही शेयरों की कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।उन्होंने कहा कि यदि आम निवेशकों को वास्तविक मालिकों की जानकारी उपलब्ध हो, तो वे निवेश संबंधी फैसले अधिक समझदारी से ले सकेंगे।अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि जानकारी प्राप्त करने का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और वित्तीय बाजारों में पारदर्शिता निवेशकों के हित में है।
केंद्र सरकार ने जताई आर्थिक प्रभाव की चिंता
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका में की गई मांगों का विरोध किया।उन्होंने दलील दी कि इस प्रकार के व्यापक सार्वजनिक खुलासे का देश की अर्थव्यवस्था और विदेशी निवेश पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।सरकार की ओर से कहा गया कि नियामकीय आवश्यकताओं के तहत संबंधित जानकारियां सेबी और कस्टोडियन को उपलब्ध कराई जाती हैं। इसलिए नियामक को जानकारी देना और उसे सार्वजनिक करना दो अलग-अलग मुद्दे हैं।इस पर प्रशांत भूषण ने कहा कि पारदर्शिता बढ़ाने से निवेशकों को लाभ होगा और केवल वास्तविक मालिकों की पहचान सामने आने से बाजार को नुकसान होने की आशंका उचित नहीं है।
2018 के नियमों में बदलाव का भी उठा मुद्दा
सुनवाई के दौरान वर्ष 2018 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों से संबंधित प्रकटीकरण व्यवस्था में हुए बदलावों का मुद्दा भी उठाया गया।प्रशांत भूषण ने दलील दी कि पहले अंतिम लाभकारी मालिकों की पहचान से जुड़े नियम अधिक व्यापक थे, लेकिन बाद में कुछ आवश्यकताओं में बदलाव कर दिया गया।उन्होंने अडानी-हिंडनबर्ग मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की टिप्पणियों का भी उल्लेख किया और कहा कि नियामकीय व्यवस्था में बदलाव से निवेश संरचनाओं की पारदर्शिता को लेकर सवाल पैदा हुए हैं।हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता और न्यायालय द्वारा नया नियामकीय दायित्व लागू करने का निर्देश देना अलग-अलग विषय हैं।
क्या होते हैं AIF और FPI?
अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स यानी AIF ऐसे निवेश फंड होते हैं, जिनमें निवेशकों से पूंजी जुटाकर निर्धारित रणनीति के अनुसार विभिन्न परिसंपत्तियों में निवेश किया जाता है। इनमें निजी इक्विटी, वेंचर कैपिटल और अन्य वैकल्पिक निवेश रणनीतियां शामिल हो सकती हैं।वहीं, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी FPI वे विदेशी निवेशक या संस्थाएं होती हैं, जो भारतीय शेयर बाजार और अन्य पात्र वित्तीय प्रतिभूतियों में निवेश करती हैं।इन दोनों निवेश माध्यमों की भारतीय वित्तीय बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका है। इनके माध्यम से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की पूंजी विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से फिलहाल AIF और FPI के अंतिम लाभकारी मालिकों की पहचान व्यापक रूप से सार्वजनिक करने की कोई नई न्यायिक बाध्यता लागू नहीं हुई है।हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि इन निवेश संस्थाओं को सेबी के मौजूदा नियमों के तहत आवश्यक जानकारी देने से छूट मिल गई है।अदालत का निर्णय मुख्य रूप से सार्वजनिक खुलासे की नई अनिवार्य व्यवस्था लागू करने की मांग से संबंधित है।इस फैसले के बाद वित्तीय बाजारों में पारदर्शिता, निवेशकों की निजता और नियामकीय जवाबदेही के बीच संतुलन का मुद्दा महत्वपूर्ण बना हुआ है।फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की मांग स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने संकेत दिया कि इस विषय पर उपयुक्त व्यवस्था बनाने का प्रश्न संबंधित नियामकीय और नीतिगत प्राधिकारियों के विचार का विषय है।
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