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6 साल तक नहीं हुई गिरफ्तारी MCOCA केस में दिल्ली पुलिस पर कोर्ट सख्त
Ratna Netam
6 Oct 2026 4:58 PM IST

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नई दिल्ली। दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट (MCOCA) के तहत आरोपी बनाए गए दो लोगों को छह साल तक गिरफ्तार नहीं किए जाने पर दिल्ली पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। स्पेशल कोर्ट ने कहा कि इतने सख्त कानून के तहत मामला दर्ज होने के बावजूद आरोपियों को लंबे समय तक गिरफ्तार नहीं करना कानून के उद्देश्य को कमजोर करता है।
मामला मुकेश उर्फ पुनीत और प्रदीप उर्फ गुरी से जुड़ा है। कोर्ट के सामने यह बात सामने आई कि दोनों आरोपियों को MCOCA मामले में आरोपी बनाए जाने के बाद भी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए लंबे समय तक प्रभावी कार्रवाई नहीं की। अदालत ने इस लापरवाही को गंभीर मानते हुए मामले की जांच कराने और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।
स्पेशल कोर्ट ने टिप्पणी की कि MCOCA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल संगठित अपराध को रोकने और ऐसे गिरोहों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए किया जाता है। ऐसे में यदि इस कानून के तहत आरोपी बनाए गए लोगों को वर्षों तक गिरफ्तार ही नहीं किया जाए तो कानून लागू करने का उद्देश्य प्रभावित होता है।
अदालत ने यह भी कहा कि छह साल की इस अवधि के दौरान आरोपियों के खिलाफ हत्या और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर अपराधों में शामिल रहने के आरोप सामने आए। कोर्ट ने माना कि अगर समय रहते कार्रवाई की जाती और आरोपियों को गिरफ्तार किया जाता तो आगे के अपराधों को रोकने की संभावना हो सकती थी। अदालत ने इसी पहलू को पुलिस की कार्यप्रणाली से जोड़ते हुए गंभीर सवाल उठाए।
स्पेशल कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला दिल्ली पुलिस कमिश्नर के संज्ञान में नहीं लाया गया था। इसे देखते हुए अदालत ने आदेश की एक प्रति दिल्ली पुलिस कमिश्नर को भेजने का निर्देश दिया ताकि पूरे मामले की विस्तृत जांच कराई जा सके।
अदालत ने कहा कि जांच में हुई भारी देरी और आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर बरती गई कथित लापरवाही की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर से कहा कि जांच में जो भी अधिकारी या जांच अधिकारी दोषी पाए जाएं, उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए।
कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर विशेष जोर दिया कि पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ मामला दर्ज करने तक सीमित नहीं होती। संगठित अपराध के मामलों में आरोपी व्यक्तियों को पकड़ना, उनकी गतिविधियों पर रोक लगाना और जांच को तेजी से आगे बढ़ाना भी जरूरी होता है। यदि गिरफ्तारी में वर्षों की देरी होती है तो इससे न सिर्फ जांच प्रभावित होती है, बल्कि कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े होते हैं।
अदालत ने कहा कि कानून का मकसद केवल कागजों पर कठोर धाराएं लगाने से पूरा नहीं होता। इन धाराओं के तहत प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है। खासकर MCOCA जैसे कानून में, जिसे संगठित अपराध से निपटने के लिए बनाया गया है, पुलिस से ज्यादा सतर्कता और तेजी की अपेक्षा की जाती है।
मामले में कोर्ट की नाराजगी इसलिए भी बढ़ी क्योंकि जिन दो आरोपियों को छह साल तक गिरफ्तार नहीं किया गया, उनके बारे में बाद की अवधि में भी गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल होने के आरोप सामने आए। अदालत ने इसे जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली की गंभीर खामी के रूप में देखा।
स्पेशल कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपी पर संगठित अपराध से जुड़ा कानून लगाया गया है तो उसके खिलाफ समय पर कार्रवाई होना बेहद जरूरी है। लंबे समय तक गिरफ्तारी नहीं होने से आरोपी न केवल कानून की पकड़ से बाहर रह सकता है, बल्कि उसके द्वारा आगे भी कथित आपराधिक गतिविधियां जारी रखने का खतरा बना रहता है।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मामले में सिर्फ संबंधित जांच अधिकारी की भूमिका ही नहीं, बल्कि पूरी जांच प्रक्रिया की समीक्षा की जरूरत है। यह पता लगाया जाना चाहिए कि आखिर आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए छह वर्षों तक प्रभावी प्रयास क्यों नहीं किए गए और इस दौरान मामले की निगरानी किस स्तर पर की जा रही थी।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करने के लिए विस्तृत जांच जरूरी है। इसके बाद लापरवाही या कर्तव्य में चूक पाए जाने पर विभागीय या अन्य उचित कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने दिल्ली पुलिस के शीर्ष अधिकारी को मामला भेजकर इसे संस्थागत स्तर पर गंभीरता से लेने का संदेश दिया है।
MCOCA का इस्तेमाल संगठित अपराध, अपराध सिंडिकेट और लगातार गंभीर अपराधों में शामिल गिरोहों के खिलाफ किया जाता है। इसके तहत जांच एजेंसियों को कई विशेष प्रावधान उपलब्ध होते हैं। यही कारण है कि अदालत ने इस बात पर आपत्ति जताई कि इतना कठोर कानून लगाए जाने के बावजूद आरोपियों की गिरफ्तारी में असाधारण देरी हुई।
कोर्ट के इस आदेश के बाद अब दिल्ली पुलिस कमिश्नर स्तर पर मामले की जांच होने की उम्मीद है। जांच में यह देखा जाएगा कि गिरफ्तारी में देरी किन परिस्थितियों में हुई, किस अधिकारी की क्या जिम्मेदारी थी और क्या जांच में जानबूझकर या लापरवाही के कारण कोई चूक हुई।
यह मामला पुलिस जांच की जवाबदेही से जुड़ा भी माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि गंभीर अपराधों और संगठित अपराध से संबंधित मामलों में जांच एजेंसियों से समयबद्ध कार्रवाई अपेक्षित है। कानून कितना भी सख्त क्यों न हो, यदि उसे प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जाए तो उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।
फिलहाल स्पेशल कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को पूरे मामले की जांच करवाने और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर विचार करने का निर्देश दिया है। इसके बाद पुलिस विभाग की आंतरिक जांच में सामने आने वाले तथ्यों पर आगे की कार्रवाई निर्भर करेगी।
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