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सुप्रीम कोर्ट तक INDIA गठबंधन के मार्च पर भड़के निशिकांत दुबे

Ratna Netam
12 Oct 2026 8:20 PM IST
सुप्रीम कोर्ट तक INDIA गठबंधन के मार्च पर भड़के निशिकांत दुबे
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट तक INDIA गठबंधन के विरोध मार्च को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद निशिकांत दुबे ने सोमवार को विपक्ष के प्रदर्शन की कड़ी आलोचना करते हुए कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाया। उन्होंने विपक्ष के इस कदम पर सवाल उठाते हुए इसकी तुलना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में लगाए गए आपातकाल से की। दुबे ने कहा कि संवैधानिक अधिकारियों से जुड़ी शिकायतों का समाधान निर्धारित कानूनी और संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए।
मीडिया से बातचीत के दौरान निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट तक विरोध मार्च निकालने के INDIA गठबंधन के फैसले पर आपत्ति जताई। उन्होंने सवाल किया कि संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े मामलों को लेकर इस तरह का प्रदर्शन करना कितना उचित है। भाजपा सांसद ने राहुल गांधी पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि उनका राजनीतिक रवैया संवैधानिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकता है। हालांकि, ये आरोप निशिकांत दुबे के राजनीतिक बयान का हिस्सा हैं और इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
निशिकांत दुबे ने कहा, "क्या आपने 1947 से आज तक कभी सुना है कि लोग विरोध या प्रदर्शन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाते हैं? इंदिरा गांधी ने देश के संविधान को खतरे में डाला था और आपातकाल लगाया था। यह व्यक्ति उन्हीं की संतान है और आपातकाल लगाना चाहता है। वह देश के संविधान को खत्म करना चाहता है।"
भाजपा सांसद के इस बयान में राहुल गांधी और कांग्रेस की राजनीतिक भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासनकाल का उल्लेख करते हुए वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम से उसकी तुलना की। भारत में वर्ष 1975 से 1977 के बीच आपातकाल लागू रहा था। उस दौर में नागरिक स्वतंत्रताओं, राजनीतिक गतिविधियों और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़े कई फैसले विवाद का विषय बने थे। निशिकांत दुबे ने इसी ऐतिहासिक घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए विपक्ष के मौजूदा प्रदर्शन की आलोचना की।
भाजपा सांसद ने कहा कि संवैधानिक अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों को उठाने के लिए देश में कानूनी और संसदीय व्यवस्थाएं मौजूद हैं। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि संवैधानिक संस्थाओं से संबंधित विवादों का समाधान संस्थागत माध्यमों से होना चाहिए।
दुबे के बयान का प्रमुख केंद्र विपक्ष के विरोध प्रदर्शन का तरीका रहा। उन्होंने राहुल गांधी पर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाया और कहा कि राजनीतिक असहमति को व्यक्त करते समय संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। हालांकि, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। भारत का संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है, जो कानून के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन है। इसलिए किसी विशेष मार्च की वैधानिकता का आकलन उसके वास्तविक स्वरूप, लागू नियमों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।
INDIA गठबंधन का सुप्रीम कोर्ट तक विरोध मार्च ऐसे समय चर्चा में आया है, जब विपक्षी दल संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज से जुड़े मुद्दों को लेकर अपनी आपत्तियां सामने रख रहे हैं। विपक्ष के इस कदम पर भाजपा नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। निशिकांत दुबे ने इसी क्रम में विरोध मार्च को लेकर राहुल गांधी की आलोचना की।
भाजपा सांसद ने विपक्ष के नेता की राजनीतिक रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि शिकायतों को उठाने के लिए उपलब्ध कानूनी रास्तों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उनके बयान से स्पष्ट है कि भाजपा और विपक्ष के बीच विवाद केवल संबंधित शिकायतों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें उठाने के तरीके को लेकर भी मतभेद हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक भूमिका भी महत्वपूर्ण है। देश की सर्वोच्च अदालत संवैधानिक और कानूनी विवादों के निपटारे के लिए न्यायिक मंच प्रदान करती है। किसी मुद्दे पर न्यायिक राहत मांगने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार याचिका दाखिल की जा सकती है। दूसरी ओर, राजनीतिक दल सार्वजनिक प्रदर्शन के माध्यम से भी अपने मुद्दों को सामने रखते हैं। दोनों प्रक्रियाओं की प्रकृति और उद्देश्य अलग-अलग होते हैं।
निशिकांत दुबे ने अपने बयान में इसी अंतर को रेखांकित करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक अधिकारियों से जुड़ी शिकायतों का समाधान कानूनी और संसदीय प्रक्रियाओं के जरिए होना चाहिए। हालांकि, उनके इस तर्क से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सर्वोच्च अदालत के आसपास किया जाने वाला प्रत्येक विरोध प्रदर्शन अपने आप में असंवैधानिक है। किसी भी प्रदर्शन के संबंध में लागू कानून और प्रशासनिक नियम महत्वपूर्ण होते हैं।
दुबे ने राहुल गांधी की आलोचना करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का भी जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी का रवैया संविधान के लिए खतरा है। यह एक गंभीर राजनीतिक आरोप है, जिसके समर्थन में दुबे के उपलब्ध बयान में किसी विशिष्ट संवैधानिक उल्लंघन या न्यायिक निष्कर्ष का उल्लेख नहीं किया गया है।
इस मामले में राहुल गांधी या INDIA गठबंधन की ओर से निशिकांत दुबे के इन विशेष आरोपों पर प्रतिक्रिया उपलब्ध कराए गए विवरण में शामिल नहीं है। इसलिए उनके पक्ष को लेकर कोई अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह विवाद संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेही, विपक्ष के विरोध प्रदर्शन के अधिकार और शिकायतों के समाधान की प्रक्रियाओं जैसे विषयों को सामने लाता है। एक ओर भाजपा सांसद ने कानूनी और संसदीय रास्तों को प्राथमिकता देने की बात कही है, वहीं विपक्ष ने मार्च के माध्यम से अपनी आपत्तियां सार्वजनिक रूप से उठाने का फैसला किया।
सोमवार को दिए गए बयान में निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर तीखे आरोप लगाए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक INDIA गठबंधन के विरोध मार्च की आलोचना करते हुए कहा कि संवैधानिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन होना चाहिए।
फिलहाल यह मामला राजनीतिक बयानबाजी का विषय बना हुआ है। विपक्ष के विरोध मार्च और भाजपा सांसद की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर संवैधानिक संस्थाओं, राजनीतिक असहमति और लोकतांत्रिक विरोध के तरीकों पर चर्चा को प्रमुखता दी है।
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