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शिवसेना विवाद में नया मोड़ शिंदे के मुख्य नेता पद पर सवाल

Ratna Netam
12 Aug 2026 9:36 PM IST
शिवसेना विवाद में नया मोड़ शिंदे के मुख्य नेता पद पर सवाल
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नई दिल्ली : शिवसेना के दो गुटों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के 'मुख्य नेता' पद पर सवाल उठाया। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की ओर से पैरवी कर रहे सिब्बल ने दावा किया कि शिवसेना के 1999 के संविधान में 'मुख्य नेता' नाम का कोई पद ही नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि जब पार्टी संविधान में ऐसा कोई पद नहीं था, तो एकनाथ शिंदे की इस पद पर नियुक्ति किस आधार पर हुई?
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष मामले की अंतिम सुनवाई के तीसरे दिन सिब्बल ने ये दलीलें रखीं। उन्होंने शिंदे की नियुक्ति और पार्टी में विभाजन के बाद हुए संगठनात्मक बदलावों को लेकर कई सवाल उठाए।
किस संविधान के तहत बने मुख्य नेता?'
सिब्बल ने शिवसेना के 1999 के संविधान का हवाला देते हुए कहा कि इसमें 'मुख्य नेता' का पद नहीं है। ऐसे में सवाल यह है कि एकनाथ शिंदे को किस संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर यह पद मिला। उन्होंने दलील दी कि ये सभी घटनाक्रम पार्टी में हुई बगावत और विभाजन के बाद के हैं।
सिब्बल ने चुनाव आयोग की 2010 की गाइडलाइंस और चुनाव चिह्न आदेश के पैरा 15 का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पैरा 15 ऐसी स्थिति से संबंधित है, जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विभाजन हो और आयोग को यह तय करना हो कि वास्तविक पार्टी का प्रतिनिधित्व कौन-सा गुट करता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में पहले से मौजूद पार्टी संविधान की वैधता को लेकर अलग पैमाना कैसे अपनाया जा सकता है।
चुनाव आयोग की भूमिका पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान सिब्बल ने निर्वाचन आयोग की भूमिका को लेकर भी दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि इस तरह के विवाद में चुनाव आयोग की भूमिका एक मध्यस्थ की है। उनके मुताबिक आयोग यह तय नहीं कर सकता कि किसी राजनीतिक दल का आंतरिक संविधान लोकतांत्रिक है या अलोकतांत्रिक।
सिब्बल ने तर्क दिया कि यदि यह मान भी लिया जाए कि किसी पार्टी का संविधान लोकतांत्रिक मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो इसका परिणाम पार्टी की मान्यता से संबंधित कार्रवाई हो सकता है। लेकिन इसका लाभ प्रतिद्वंद्वी गुट को देकर पार्टी का चुनाव चिह्न सौंपना अलग प्रश्न है।
धारा 29ए का भी दिया हवाला
कपिल सिब्बल ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान राजनीतिक दलों के पंजीकरण से संबंधित है। इसके तहत राजनीतिक दलों से संविधान और समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता तथा लोकतंत्र जैसे सिद्धांतों के प्रति निष्ठा की घोषणा की अपेक्षा की जाती है।
सिब्बल का तर्क था कि इस धारा के आधार पर निर्वाचन आयोग को पहले से पंजीकृत राजनीतिक दल के संविधान को बाद में अलोकतांत्रिक बताकर अमान्य करने की शक्ति नहीं मिल जाती।
जस्टिस बागची और सिब्बल के बीच संवैधानिक मुद्दे पर चर्चा
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने संविधान के अनुच्छेद 19(4) में इस्तेमाल 'लोक व्यवस्था' और 'नैतिकता' जैसे शब्दों की व्यापकता की ओर ध्यान दिलाया। इस पर सिब्बल ने कहा कि वह मुख्य रूप से संवैधानिक प्रश्न को अदालत के सामने रख रहे हैं।
न्यायमूर्ति बागची ने इस दौरान यह भी कहा कि नैतिकता की अवधारणा में 'संवैधानिक नैतिकता' से जुड़ा प्रश्न भी शामिल हो सकता है।
विधायकों की संख्या को आधार बनाने पर आपत्ति
उद्धव ठाकरे गुट का प्रमुख तर्क रहा है कि निर्वाचन आयोग ने यह तय करने में गलती की कि वास्तविक शिवसेना का प्रतिनिधित्व कौन करता है। ठाकरे गुट के मुताबिक आयोग ने पार्टी संगठन में समर्थन की स्थिति के बजाय विधानमंडल दल में विधायकों की संख्या को अधिक महत्व दिया।
शिवसेना में 2022 में हुए विभाजन के बाद से पार्टी के संगठन, नाम और चुनाव चिह्न को लेकर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच कानूनी लड़ाई जारी है। अब सुप्रीम कोर्ट की अंतिम सुनवाई में पार्टी संविधान, निर्वाचन आयोग की शक्तियों और संगठनात्मक बहुमत जैसे मुद्दे केंद्र में हैं।
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