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दिल्ली-एनसीआर
842 करोड़ की हेराफेरी में नया मोड़, फर्जी निदेशकों पर शिकंजा
nidhi
7 Nov 2026 7:46 AM IST

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842 करोड़ के घोटाले की परतें खुलीं
नई दिल्ली: दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग में दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की खरीद से जुड़े कथित 842 करोड़ रुपये के घोटाले में जांच का दायरा बढ़ता जा रहा है। भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB) ने मुख्य आरोपी राजीव कुमार उर्फ राजीव रंगीला से जुड़ी कंपनियों के नाममात्र के निदेशकों की भूमिका की जांच तेज कर दी है। आरोप है कि कर्मचारियों और घरेलू सहायकों के नाम पर कंपनियां बनाकर सरकारी टेंडर हासिल किए गए और करोड़ों रुपये का भुगतान कराया गया। जांच में पांच प्रमुख कंपनियों को करीब 839 करोड़ रुपये का सरकारी भुगतान होने की बात सामने आई है।
मामले की जांच में सामने आया है कि राजीव रंगीला कथित तौर पर कई कंपनियों का वास्तविक संचालन करता था, जबकि दस्तावेजों में निदेशक दूसरे लोगों को दिखाया गया था। अब जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि इन लोगों को कंपनियों के कारोबार और सरकारी ठेकों की जानकारी थी या उनके दस्तावेजों का इस्तेमाल उनकी जानकारी के बिना किया गया।
इस मामले में एम साहिब एंड संस प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े सुनील कुमार और लक्ष्मण सिंह की भूमिका भी जांच के घेरे में है। एजेंसी कंपनी की खरीद गतिविधियों, एफ-मेड डिवाइसेज सहित अन्य कंपनियों के साथ कारोबारी संबंधों और बैंक खातों में हुए लेनदेन की पड़ताल कर रही है। जांच अधिकारी यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकारी भुगतान से किसे आर्थिक लाभ पहुंचा। दिल्ली की अदालत में राजीव रंगीला की जमानत याचिका का विरोध करते हुए एसीबी ने बताया कि जांच अभी पूरी नहीं हुई है। एजेंसी के अनुसार, जब्त हार्ड डिस्क, कंप्यूटर और मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच बाकी है। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का बैंक रिकॉर्ड, खरीद दस्तावेजों और गवाहों के बयानों से मिलान किया जाना है।
इस घोटाले में राजीव रंगीला के पूर्व कर्मचारी ज्ञान चंद का मामला भी सामने आया है। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि ज्ञान चंद के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर उन्हें एक कंपनी का निदेशक बनाया गया था। उस कंपनी ने अस्पतालों के लिए लिनेन सामग्री की आपूर्ति से जुड़े टेंडरों में हिस्सा लिया था। ज्ञान चंद की मौत से जुड़े मामले में भी रंगीला का नाम सामने आया है। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक फैसला अभी होना बाकी है। कथित घोटाले में सरकारी खरीद प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए टेंडर की शर्तों में बदलाव किए गए। आरोप है कि कुछ कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से निविदा प्रक्रिया में अनियमितताएं की गईं। कई मामलों में निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करने वाली कंपनियों को भी ठेके दिए जाने का आरोप है।
इस प्रकरण में चिकित्सा उपकरणों की कीमतों को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। आरोपपत्र के अनुसार, कुछ एक्स-रे मशीनों की खरीद में बाजार की तुलना में काफी अधिक भुगतान किया गया। इसी तरह अस्पतालों के लिए चादर, दवाओं, ओआरएस और सर्जिकल उपकरणों की खरीद में भी कथित अनियमितताएं सामने आई हैं। जांच में यह भी आरोप लगाया गया है कि एम साहिब एंड संस से जुड़े भुगतान कई बैंक खातों के माध्यम से आगे भेजे गए और कुछ रकम नकद निकाली गई। अब एजेंसी इन लेनदेन की पूरी श्रृंखला का पता लगाने में जुटी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सरकारी धन आखिर किन व्यक्तियों और संस्थाओं तक पहुंचा।
इस बीच अदालत ने आर्थिक अपराधों की गंभीरता को रेखांकित किया है। विशेष न्यायाधीश विद्या प्रकाश के समक्ष अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि मामले में कई महत्वपूर्ण साक्ष्यों की जांच अभी जारी है। अदालत के सामने सरकारी टेंडरों में कथित हेराफेरी और दस्तावेज नष्ट किए जाने से जुड़े आरोप भी रखे गए। फिलहाल 842 करोड़ रुपये के कथित घोटाले में जांच एजेंसी का ध्यान फर्जी कंपनियों, नाममात्र के निदेशकों और 839 करोड़ रुपये के सरकारी भुगतान की वास्तविक स्थिति पर केंद्रित है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन लोगों ने जानबूझकर कथित अनियमितताओं में भूमिका निभाई और किनके दस्तावेजों का दुरुपयोग हुआ।
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