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भारत के रक्षा क्षेत्र को नई उड़ान, मिसाइल निर्यात में बढ़ रहे अवसर

Kiran
8 Oct 2026 9:48 AM IST
भारत के रक्षा क्षेत्र को नई उड़ान, मिसाइल निर्यात में बढ़ रहे अवसर
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Delhi भारत का मिसाइल एक्सपोर्ट बिज़नेस अब दो रास्तों पर चल रहा है। एक है ब्रह्मोस का मैरीटाइम स्ट्राइक ऑप्शन (समुद्र में हमला करने की क्षमता), जिसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने चुना है। दूसरा है आकाश एयर-डिफेंस सिस्टम, जिसे तीन खरीदारों को बेचा गया है - एक काकेशस में और दो मध्य एशिया में। ब्रह्मोस मिसाइल भारत के DRDO और रूस की NPO मशीनोस्ट्रोयेनिया के जॉइंट वेंचर (साझा उपक्रम) का प्रोडक्ट है, जिसे 1998 में बनाया गया था। इसे दक्षिण चीन सागर के आस-पास के देशों - इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम - में काफी पसंद किया गया है। इन तीनों देशों ने तट से लॉन्च होने वाले एंटी-शिप वेरिएंट को चुना है। ब्रह्मोस का एक वेरिएंट ऐसा भी है जिसे जहाज से जमीन पर मौजूद टारगेट पर फायर किया जाता है, लेकिन इसे अभी तक एक्सपोर्ट नहीं किया गया है। फिलीपींस और वियतनाम का चीन के साथ हाइड्रो-कार्बन से भरपूर दक्षिण चीन सागर में समुद्री इलाके को लेकर विवाद चल रहा है। इंडोनेशिया का भी इसी सागर से छोटा सा तटीय इलाका लगता है, लेकिन वह इस विवाद का हिस्सा नहीं है।
ASEAN देशों को "फायर-एंड-फॉरगेट" (दागो और भूल जाओ) क्षमता वाली ब्रह्मोस मिसाइल का एक्सपोर्ट - खासकर उन देशों को जिनके दक्षिण चीन सागर में समुद्री दावे एक-दूसरे से टकराते हैं - एक बड़े बदलाव को दिखाता है। फिलीपींस भारत से मिसाइल खरीदने वाला पहला देश था; उसने 2022 में 375 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया और 2024 में डिलीवरी शुरू हुई। पिछले महीने, उसने अमेरिकी सेना के साथ मिलकर ब्रह्मोस एंटी-शिप मिसाइल हमले के लिए 'युद्धपोतों को ट्रैक करने' की जॉइंट एक्सरसाइज भी की।
इंडोनेशिया और भारत ने इस साल जुलाई में एक MoU साइन किया, जिसके तहत समुद्र में 290 किमी दूर टारगेट को हिट करने की क्षमता वाली ब्रह्मोस मिसाइल की कोस्ट-बेस्ड बैटरी (तट-आधारित बैटरी) खरीदने की बात हुई। एक बैटरी में लॉन्चर, रडार और मिसाइलें शामिल होती हैं। यह इस इलाके में नई दिल्ली का तीसरा मिसाइल कॉन्ट्रैक्ट था, जिसे चीन अपना 'बैकयार्ड' (अपने प्रभाव वाला क्षेत्र) मानता है। इससे पहले वियतनाम ने 620 मिलियन डॉलर की डील साइन की थी। इसमें मोबाइल कोस्टल डिफेंस मिसाइल बैटरी की सप्लाई, वियतनामी कर्मियों के लिए व्यापक ऑपरेटर ट्रेनिंग और लंबे समय तक लॉजिस्टिक्स और मेंटेनेंस सपोर्ट शामिल है। इंडोनेशिया चार बड़े जलडमरूमध्यों (straits) – मलक्का, लोम्बोक, सुंडा और ओम्बई-वेटार – पर स्थित है, जो हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ते हैं। ये चारों ही शिपिंग के लिए मुख्य रास्ते हैं और चीन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पिछले हफ़्ते कहा: "ब्रह्मोस हमारे एक्सपोर्ट की कहानी के लिए एक बेंचमार्क की तरह है। हमें फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम से बिक्री के लिए कॉन्ट्रैक्ट या समझौते मिले हैं।"
आकाश की सफलता
आकाश देश का सबसे महत्वपूर्ण स्वदेशी रक्षा एक्सपोर्ट है। यह एक लेयर्ड एयर-डिफेंस सिस्टम है, न कि सिर्फ़ एक मिसाइल। इसमें लॉन्चर, रडार, कमांड-एंड-कंट्रोल और सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा, "आर्मेनिया पहला ग्राहक था, जिसने कई बैटरी ली हैं। इसके बाद, हमने इसे ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को भी एक्सपोर्ट किया है।" हालांकि भारतीय सशस्त्र बलों से भी इस मिसाइल के लिए अतिरिक्त ऑर्डर मिले हैं, लेकिन रक्षा मंत्रालय को दूसरे देशों से भी ऑर्डर मिलने की उम्मीद है।
भारत और आर्मेनिया – जिसकी सीमा तुर्की से लगती है – ने इस साल अगस्त में अपनी रक्षा साझेदारी को बढ़ाने पर चर्चा की है। भारत पहले से ही आर्मेनिया को रॉकेट, हथियार और एयर डिफेंस सिस्टम सप्लाई कर रहा है। आकाश सिर्फ़ अलग-अलग मिसाइलों का एक्सपोर्ट नहीं है, बल्कि यह एक बड़े स्वदेशी एयर-डिफेंस सिस्टम को दिखाता है जिसमें लॉन्चर, रडार, कमांड-एंड-कंट्रोल एलिमेंट और उससे जुड़ा सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल है। असली आकाश सिस्टम की रेंज लगभग 25-30 किमी है, जबकि आकाश-NG को 50 किमी तक की रेंज के लिए डिज़ाइन किया गया है। BDL मिसाइलें बनाती है और BEL इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई करती है, जो इस सिस्टम के पीछे एक बड़े घरेलू औद्योगिक आधार को दिखाता है।
भारत की एक्सपोर्ट रणनीति
ब्रह्मोस का भू-राजनीतिक महत्व और कॉन्ट्रैक्ट की कीमत ज़्यादा है। आकाश शायद भारत के औद्योगिक आधार की मज़बूती को ज़्यादा बेहतर ढंग से दिखाता है। भारत उन साझेदारों को बेच रहा है जिन्हें समुद्री या हवाई खतरों का सामना करना पड़ता है; साथ ही ट्रेनिंग और सपोर्ट भी देता है और संबंधों को गहरा करने के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश करता है। भारत ने 80 देशों को सैन्य उपकरण एक्सपोर्ट किए और इनकी कीमत 38,424 करोड़ रुपये थी।
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