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New Delhi: डीयू के रामजस कॉलेज में लचित बोरफुकन जयंती समारोह

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में सोमवार को महान अहोम सेनापति लचित बोरफुकन की 403वीं जयंती बड़े उत्साह के साथ मनाई गई। कार्यक्रम का आयोजन युवा संगठन ‘यूथ यूनाइटेड फॉर विजन एंड एक्शन’ (युवा) ने किया था। छात्र-छात्राओं, प्रोफेसरों और गणमान्य अतिथियों ने इसमें हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार टोली के सदस्य मुकुल कानिटकर ने कहा कि महापुरुष किसी एक प्रांत के नहीं होते, वे पूरे राष्ट्र के होते हैं। लचित बोरफुकन ने मुगलों को असम में घुसने नहीं दिया। आज पुणे की नेशनल डिफेंस अकादमी में सर्वश्रेष्ठ कैडेट को जो स्वर्ण पदक दिया जाता है, उसका नाम ‘लचित बोरफुकन गोल्ड मेडल’ है। भारतीय सेना के लिए भी लचित आदर्श हैं।
उन्होंने लचित के छापामार युद्ध कौशल और सराइघाट युद्ध (1671) में औरंगजेब की विशाल सेना को हराने की रणनीति पर विस्तार से प्रकाश डाला और युवाओं से कहा कि लचित से नेतृत्व, निडरता और राष्ट्र-सेवा का समर्पण सीखना चाहिए।
मुख्य अतिथि पूर्व पर्यटन सचिव मदन प्रसाद बेजबरुआ ने लचित के प्रसिद्ध कथन को दोहराया –
“मेरे चाचा मेरे देश से बड़े नहीं हैं”
और कहा कि यह वाक्य हर भारतीय के लिए देशभक्ति का सार्वभौमिक मंत्र होना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि बिकानेरवाला फूड्स के सीएमडी नवरत्न अग्रवाल ने कहा कि इस देश का मूल तत्व अध्यात्म है। अध्यात्म नहीं रहेगा तो देश रहकर क्या करेंगे?
देबोजीत बोरकाकाटी ने कहा कि आज का युद्ध सीमाओं पर नहीं, बल्कि विचारधारा, संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर चल रहा है। हमें लचित जैसा साहस और जागरूकता चाहिए। जब राष्ट्रीय सम्मान दांव पर हो, तो हर नागरिक को योद्धा बनना पड़ता है।





