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New Delhi: आकाशवाणी संगीत सम्मेलन 2025: अविस्मरणीय प्रस्तुतियां

दिल्ली: आकाशवाणी संगीत सम्मेलन” आकाशवाणी का एक वार्षिक आयोजन है। शास्त्रीय संगीत का यह अदभुत आयोजन 1954 से श्रोताओं और दर्शकों को मंत्रमुग्ध करता आया है। कोविड प्रभावित काल को छोड़कर प्रतिवर्ष विभिन्न आकाशवाणी केंद्रों पर संगीत सम्मेलन आयोजित होता है। जिसमें भारत के उच्च कोटि के कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। 67वें आकाशवाणी संगीत सम्मेलन के आरंभिक आयोजन 2 नवंबर 2025 को दिल्ली, मुंबई और चेन्नई केंद्रों पर आयोजित किए गए। नवंबर माह में इस तरह के आयोजन अन्य आकाशवाणी केंद्रों पर भी आयोजित होंगे।
आकाशवाणी दिल्ली के रंग भवन सभागार में 67वें “आकाशवाणी संगीत सम्मेलन 2025” का शुभारंभ प्रसार भारती के अध्यक्ष नवनीत सहगल ने दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। दीप प्रज्वज्वलन में प्रसार भारती के मुख्यकार्यकारी अधिकारी गौरव द्विवेदी, महानिदेशक आकाशवाणी, राजीव कुमार जैन और आकाशवाणी दिल्ली की कार्यक्रम प्रमुख मनीषा जैन दीप प्रज्ज्वलन के प्रतिभागी बने। अध्यक्ष प्रसारभारती नवनीत सहगल ने आमंत्रित कलाकारों का का अभिनंदन और आमंत्रित दर्शकों का स्वागत किया। अपने स्वागत भाषण में उन्होंने “आकाशवाणी संगीत सम्मेलन” परंपरा को भारतीय संस्कृति की धरोहर बताया और कहा कि इस आयोजन की निरंतरता बनी रहेगी।
संगीत सम्मेलन का आरंभ पंडित राकेश चौरसिया के बांसुरी वादन के साथ हुआ। राकेश चौरसिया, बांसुरी सम्राट पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के भतीजे हैं। इनके बांसुरी वादन की विशेषता शांत भाव से प्रभावशाली फूंकने की शैली है, जो भावनात्मक गहराई भर देती है। इनकी प्रस्तुति में सुर ताल पर पकड़ के साथ बाल क्रीड़ा की चपलता भी साफ दिखाई देती है। पंडित चौरसिया के साथ तबले पर संगत कर रहे थे स्व.पंडित छन्नूलाल मिश्रा के शिष्य, पंडित राम कुमार मिश्रा, तानपुरा पर सुर दे रही थी प्रिया मिश्रा। पंडित राकेश चौरसिया ने अपने बांसुरी वादन का आरंभ राग भीम पलासी से किया जिसमें आलाप, जोड़ और झाला अंगों ने दर्शकों का मन मोह लिया। उन्होंने अपनी प्रस्तुति का समापन राग पहाड़ी में एक धुन के साथ किया। उनके बांसुरी वादन ने दर्शक- श्रोताओं को उसी तरह मंत्रमुग्ध कर दिया जैसे साहित्य में श्रीकृष्ण की बांसुरी का प्रभाव पढ़ने को मिलता है। दर्शकों से खचाखच भरे रंगभवन सभागार में संगीत के प्रति श्रोताओं की दीवानगी देखने को मिली। श्रोतावर्ग में तानसेन और कानसेन दोनों परंपराओं के लोग उपस्थित थे जो तालियां बजाने की अपनी जगह से परिचित थे। शास्त्रीय संगीत में श्रोताओं के लिए भी जगह होती है।
पं. राकेश चौरसिया के बांसुरी वादन के बाद मराठी लोक नाट्य विधा “तमाशा” के विश्वविख्यात कलाकार नंदेश उमप और साथियों ने मंच को जिस तरह संभाला उसमें सुर लय और ताल का समागम था। प्रस्तुति की विशेषता यह थी कि संगीत की पूरी परिभाषा व्यक्त हो रही थी। “गीतं वाद्यं तथा नृत्यं, त्रियतम संगीत उच्यते।” साज़, बाज, आवाज़ और अंदाज़ में “तमाशा” परंपरा के परिधानों में नाट्य टोली मंच पर उतरी। महाराष्ट्र की इस नाट्य टोली ने दर्शकों को अपलक देखते रहने को मजबूर कर दिया। गणेश आराधना, शक्ति की उपासना, नटखट नंदलाल का रूठना, उन्हें रिझाना, मनाना। मुख्य कलाकार नंदेश उमप द्वारा दर्शकों को अपने साथ जोड़ना, महाराष्ट्र में वारकरी संप्रदाय द्वारा पंढरपुर यात्रा में विट्ठल भजन प्रस्तुति, तथा छत्रपति शिवाजी महाराज और बीजापुर के सेनापति अफजल खां के मध्य युद्ध का शब्द चित्रण जिस जोश के साथ किया उसे दर्शकों उसी भाव से प्रकट किया। अपनी जगहों पर खड़े होकर छत्रपति शिवाजी महाराज की जयकारे से सभागार गूंज उठा ।
मंच संचालन कर रहे नीलम मलकानिया (हिंदी) और वैभव कुमार (अंग्रेजी) के जीवंत संचालन उत्सव की गरिमा और बढ़ा दी। कलाकार और श्रोतावर्ग दोनों ही एंकरिंग की सराहना की।
प्रसार भारती के अध्यक्ष नवनीत सहगल, मुख्यकार्यकारी अधिकारी गौरव द्विवेदी, महानिदेशक दूरदर्शन, के.सतीश नंबूदरी, आकाशवाणी के महानिदेशक राजीव जैन की गरिमामय उपस्थिति पूरे संगीत सम्मेलन में बनी रही। आकाशवाणी दिल्ली की कार्यक्रम प्रमुख मनीषा जैन, कार्यक्रम निष्पादक (समन्वय) प्रमोद कुमार, जो इस आयोजन की धुरी रहे, कार्यक्रम निष्पादक स्पर्शिता श्रीवास्तव, मधुलिका श्रीवास्तव और अनुराग उपाध्याय सहित पूरी आयोजन समिति इस सफलता के लिए प्रशंसा के पात्र हैं। श्रोताओं में संगीत प्रेमी बीएसएफ, एसएसबी, सीआईएसएफ, एनसीसी कैडेट्स, दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों के संगीत विभाग के छात्र छात्राएं, दिल्ली के प्रबुद्ध संगीत कलाकार और संगीत प्रेमियों की उपस्थिति भी सराहनीय रही।
ऐसे आयोजन समाज को जोड़ने और भारतीय संगीत परंपरा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पार्थसारथि थपलियाल की रिपोर्ट





