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कांग्रेस के 'लोकतंत्र बचाओ' अभियान पर नड्डा का पलटवार, याद दिलाया आपातकाल का इतिहास
Ratna Netam
3 Nov 2026 5:57 PM IST

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नई दिल्ली/बरेली। देश में लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता जेपी नड्डा ने कांग्रेस के 'लोकतंत्र बचाओ' अभियान पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासनकाल में लगाए गए आपातकाल का जिक्र करते हुए दावा किया कि ब्रिटिश शासन के दौरान जितने लोगों को जेल नहीं भेजा गया, उससे अधिक लोगों को इंदिरा गांधी ने आपातकाल के समय जेल में डाला था। नड्डा ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया।मंगलवार, 3 नवंबर को उत्तर प्रदेश के बरेली में भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' रैली को संबोधित करते हुए नड्डा ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं। नड्डा ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाने के साथ विपक्ष को अपने राजनीतिक इतिहास पर भी नजर डालनी चाहिए।नड्डा ने इंदिरा गांधी के कार्यकाल में लगाए गए आपातकाल की याद दिलाते हुए कहा कि उस दौर में बड़ी संख्या में लोगों को बिना मुकदमे के जेलों में बंद रखा गया था। उन्होंने दावा किया कि 22 महीने तक लोगों को न्यायिक प्रक्रिया का सामना किए बिना हिरासत में रखा गया। इसी संदर्भ में उन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान हुई गिरफ्तारियों से तुलना की।
नड्डा ने राहुल गांधी के लोकतंत्र बचाने के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस को पहले अपने शासनकाल के उन फैसलों का जवाब देना चाहिए, जिनके कारण नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए थे। उनके मुताबिक, लोकतंत्र की रक्षा का दावा करने वाली कांग्रेस को आपातकाल के इतिहास को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।इससे पहले 30 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ के दुर्ग में आयोजित भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' यात्रा में भी नड्डा ने इसी मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। वहां उन्होंने दावा किया था कि आपातकाल के दौरान लगभग 1.30 लाख लोगों को बिना आरोपों के जेल भेजा गया था। उन्होंने कांग्रेस पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और अब खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताने का आरोप लगाया था।भारत में 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल लागू किया था, जो मार्च 1977 तक जारी रहा। इस दौरान राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी, प्रेस पर सेंसरशिप और नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध जैसे कदम उठाए गए थे। आपातकाल भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे विवादास्पद अध्यायों में गिना जाता है।भाजपा लंबे समय से आपातकाल को कांग्रेस के खिलाफ एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाती रही है। पार्टी का कहना है कि उस दौर में विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले नागरिकों को गिरफ्तार किया गया था। हालांकि, ब्रिटिश शासन और आपातकाल के दौरान हुई कुल गिरफ्तारियों की नड्डा द्वारा की गई तुलना एक राजनीतिक दावा है। इसे दोनों अवधियों के तुलनीय ऐतिहासिक आंकड़ों से स्वतंत्र रूप से प्रमाणित करना आवश्यक है।
मौजूदा राजनीतिक विवाद की एक बड़ी वजह मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया भी है। कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के अन्य दल इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने से योग्य मतदाताओं के मतदान अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि मतदाता सूची को सही और अद्यतन बनाए रखना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। नड्डा ने अपने संबोधन में विपक्ष पर चुनाव आयोग के खिलाफ अविश्वास पैदा करने का आरोप लगाते हुए कहा कि चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से जनता का समर्थन हासिल करके जीते जाते हैं।एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी दलों ने चुनावी प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित विपक्ष के कई नेताओं ने इसमें हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की।इस रैली पर प्रतिक्रिया देते हुए नड्डा ने विपक्ष के प्रदर्शन को राजनीतिक नाटक बताया था। उन्होंने कहा था कि भारत में सरकार का गठन संविधान और जनता के जनादेश के आधार पर होता है। भाजपा नेता ने कांग्रेस पर लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने का भी आरोप लगाया।
वहीं, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का तर्क है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग के फैसलों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने का हिस्सा है।राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इस विवाद में दोनों पक्ष लोकतंत्र की अलग-अलग व्याख्याओं के जरिए जनता तक अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा आपातकाल का इतिहास सामने रखकर कांग्रेस की राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठा रही है, जबकि कांग्रेस वर्तमान चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं की जवाबदेही को प्रमुख मुद्दा बना रही है।जेपी नड्डा के ताजा बयान के बाद यह बहस और तेज होने की संभावना है। फिलहाल आपातकाल का इतिहास, चुनाव आयोग की भूमिका और मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बने हुए हैं। आने वाले दिनों में भाजपा और कांग्रेस के बीच इन मुद्दों पर बयानबाजी और बढ़ सकती है।
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