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दिल्ली-एनसीआर
मरीजों से ज्यादा वसूली पर सख्ती की तैयारी, केंद्र ने कोर्ट में रखा पक्ष
nidhi
23 Oct 2026 6:50 AM IST

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सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
नई दिल्ली: अस्पतालों में मरीजों से दवाओं और चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों के लिए अधिक रकम वसूलने का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। केंद्र सरकार ने अदालत में दाखिल शपथपत्र में माना है कि मरीजों की कमजोर सौदेबाजी की स्थिति और कीमतों के बारे में सीमित जानकारी के कारण व्यवस्था में कुप्रथाएं पैदा होती हैं। सरकार ने कहा कि वह समस्या से अवगत है और संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श करके उचित उपाय तैयार कर रही है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में सभी अस्पतालों के लिए कोई नया देशव्यापी मूल्य नियम तत्काल लागू होने की जानकारी नहीं है।
रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने यह पक्ष सभी दवाओं तथा चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों की कीमतों पर सीमा तय करने से संबंधित मामले में रखा है। शपथपत्र में बताया गया कि भारत का दवा बाजार प्रतिस्पर्धी है और अनेक कंपनियां कम कीमत पर दवाएं बनाती हैं। इसके बावजूद निर्माण स्तर की प्रतिस्पर्धा का पूरा लाभ मरीज तक पहुंचना सुनिश्चित नहीं होता। इलाज के दौरान मरीज, अस्पताल और फार्मेसी की जानकारी तथा निर्णय लेने की क्षमता में अंतर बना रहता है।
सरकार के अनुसार, मरीज को दवाओं, उनके विकल्पों और कीमतों की जानकारी सीमित होती है। अस्पताल में भर्ती होने पर उसके पास कीमत पर बातचीत करने की गुंजाइश भी कम रहती है। बीमारी की गंभीरता और उपचार की जरूरत के बीच परिवार अक्सर उपलब्ध व्यवस्था पर निर्भर होता है। शपथपत्र में इसी असमानता को ऐसी स्थिति बताया गया है, जिसमें निर्माताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होने के बाद भी नियमन की जरूरत पैदा होती है। कैंसर की दवाओं का व्यापारिक मार्जिन विशेष चिंता के रूप में सामने आया है। सरकार ने बताया कि अस्पताल अधिक ट्रेड मार्जिन देने वाले निर्माताओं से दवाएं खरीदकर मरीजों को अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी पर बेच सकते हैं। शपथपत्र में कैंसर रोधी दवाओं पर 170 प्रतिशत से 700 प्रतिशत या उससे अधिक मार्जिन का उल्लेख है। चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों में भी 100 प्रतिशत से 1,000 प्रतिशत अथवा उससे ज्यादा मार्जिन होने की बात कही गई है।
इन आंकड़ों को समझते समय खरीद मूल्य, व्यापारिक मार्जिन और एमआरपी के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। अस्पताल की खरीद कीमत से अधिक राशि लेना और निर्धारित अधिकतम कीमत का उल्लंघन करना अलग-अलग प्रश्न हो सकते हैं। इस मामले में चिंता ऐसी मूल्य व्यवस्था की भी है, जिसमें ऊंची एमआरपी के कारण मरीज पर बोझ पड़ता है। केवल मार्जिन का आंकड़ा किसी विशेष अस्पताल के खिलाफ अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं बन जाता। शपथपत्र में सीधे भुगतान करने वाले मरीजों और सरकारी योजना या बीमा पैकेज के तहत इलाज कराने वालों की स्थिति का अंतर भी बताया गया है। सरकार के अनुसार, बड़े उपचारों के पैकेज में अस्पताल की कई सामग्रियां शामिल होती हैं और संबंधित एजेंसियां पैकेज दर पर बातचीत करती हैं। वहीं, अपनी जेब से भुगतान करने वाले मरीजों के बिल में अस्पताल की आपूर्तियां अलग से एमआरपी पर जोड़ी जा सकती हैं।
सरकार ने दवा मूल्य नियंत्रण के लिए पहले उठाए कदमों की जानकारी भी अदालत को दी। इसमें 935 अनुसूचित फॉर्मूलेशन की अधिकतम कीमतें और 3,881 नई दवाओं की खुदरा कीमतें निर्धारित किए जाने का उल्लेख है। शपथपत्र डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की याचिका पर दाखिल हुआ है। याचिका में इलाज के खर्च से परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक दबाव का मुद्दा उठाया गया है। इस विवाद का केंद्र केवल दवा सस्ती बनने का सवाल नहीं है, बल्कि मरीज को वह किस कीमत पर मिलती है, यह भी है। निर्माता से वितरण व्यवस्था और अस्पताल तक पहुंचने के दौरान कीमत में बदलाव हो सकता है। इसलिए किसी समाधान का असर समझने के लिए पूरी बिक्री व्यवस्था को देखना होगा। मरीज के अंतिम बिल में राहत तभी स्पष्ट होगी, जब लागू उपायों और उनके वास्तविक परिणाम का विवरण सामने आएगा।
पारदर्शिता भी इस मुद्दे का महत्वपूर्ण पहलू है। इलाज के बिल में दवा, मात्रा, इस्तेमाल की गई सामग्री और संबंधित शुल्क स्पष्ट होने से खर्च समझना आसान होता है। पैकेज में शामिल वस्तुओं और अलग से जोड़े गए शुल्क का अंतर भी साफ होना चाहिए। यह व्यापक संदर्भ है; उपलब्ध रिपोर्ट में अदालत की ओर से कोई नई विस्तृत बिलिंग व्यवस्था लागू करने का अंतिम आदेश नहीं बताया गया है। सरकार का आश्वासन समस्या के समाधान की दिशा में उसका पक्ष दर्शाता है, लेकिन इससे हर अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो जाने का निष्कर्ष नहीं निकलता। किस प्रकार का नियमन होगा, उसका दायरा क्या रहेगा और कब लागू होगा—इन प्रश्नों पर स्पष्ट घोषणा आवश्यक होगी। इसी तरह किसी खास शिकायत पर कार्रवाई संबंधित तथ्यों और लागू प्रावधानों पर निर्भर करेगी।
फिलहाल केंद्र ने अधिक वसूली से जुड़ी समस्या स्वीकार करते हुए उचित हस्तक्षेप तैयार करने की बात कही है। मरीजों के लिए वास्तविक राहत का आकलन आगे घोषित उपायों से होगा। कीमतों, व्यापारिक मार्जिन और अस्पताल बिलों में पारदर्शिता से जुड़ा यह मामला उपचार की आर्थिक पहुंच तथा स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसे के लिहाज से महत्वपूर्ण बना हुआ है।
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