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माइनिंग टैक्स विवाद खत्म, निवेशकों को राहत

Kavita2
23 Aug 2026 2:54 PM IST
माइनिंग टैक्स विवाद खत्म, निवेशकों को राहत
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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने खनन क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे टैक्स और लेवी से जुड़े विवाद को दूर करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 के जरिए खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर राज्यों की ओर से लगाए जाने वाले नए टैक्स, सेस और अन्य लेवी के लिए एक समान और नियंत्रित व्यवस्था बनाई गई है। सरकार का कहना है कि इससे माइनिंग उद्योग में लंबे समय के लिए वित्तीय स्थिरता आएगी और घरेलू तथा विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

यह बदलाव ऐसे समय हुआ है, जब खनिजों पर रॉयल्टी और राज्यों की कर लगाने की शक्ति को लेकर दशकों से कानूनी और नीतिगत बहस चलती रही है। जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से फैसला दिया था कि राज्यों को खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की विधायी शक्ति है और MMDR Act के तहत दी जाने वाली रॉयल्टी को टैक्स नहीं माना जा सकता।

35 साल पुराने विवाद को नई दिशा

खनिजों पर टैक्स और रॉयल्टी का विवाद लंबे समय से केंद्र और राज्यों के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा रहा है। 1989 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में रॉयल्टी को टैक्स माना गया था। हालांकि, 2024 में नौ जजों की संविधान पीठ ने उस पुराने दृष्टिकोण को पलटते हुए राज्यों के खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने के अधिकार को मान्यता दी।

इसके बाद राज्यों की ओर से पुराने बकाये की मांगों को लेकर माइनिंग कंपनियों पर संभावित आर्थिक बोझ की चिंता बढ़ी। अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को 1 अप्रैल 2005 से संबंधित कुछ पुराने खनिज कर बकायों की वसूली की अनुमति दी थी, हालांकि ब्याज और जुर्माने को लेकर राहत दी गई थी।

इस पृष्ठभूमि में 2026 का संशोधन माइनिंग कंपनियों के लिए भविष्य की कर देनदारी को अधिक स्पष्ट करने की कोशिश के तौर पर सामने आया है।

नया सेक्शन 9D बना महत्वपूर्ण प्रावधान

MMDR Amendment Act में नया सेक्शन 9D जोड़ा गया है। इसके तहत राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर किसी भी नाम से नया टैक्स, सेस या अन्य लेवी नहीं लगा सकेंगी, जब तक कि वह केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों या प्रतिबंधों के अनुरूप न हो। यह लेवी खनिज की मात्रा, कीमत, रॉयल्टी या किसी अन्य आधार पर हो सकती है।

इस प्रावधान का उद्देश्य अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रकार की लेवी के कारण पैदा होने वाली अनिश्चितता को कम करना है। सरकार के अनुसार वर्तमान में माइनिंग गतिविधियों पर रॉयल्टी, ऑक्शन प्रीमियम, डेड रेंट, जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) भुगतान, GST और ट्रांजिट फीस समेत लगभग 14 तरह के टैक्स, शुल्क और अन्य लेवी लागू हैं। कुछ राज्यों में खनिज-युक्त भूमि पर अलग टैक्स भी लगाए गए हैं।

पुराने लंबित दावों पर भी असर

नए कानून में पुराने लंबित लेवी से जुड़े मामलों को लेकर भी प्रावधान किया गया है। संशोधन लागू होने से पहले राज्य द्वारा जिन लेवी की वसूली या जमा नहीं की गई है, उन्हें कानून के तहत अमान्य माना जाएगा। हालांकि, जो रकम पहले ही जमा या वसूल की जा चुकी है, उसके रिफंड का प्रावधान नहीं है।

यही प्रावधान माइनिंग कंपनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक माना जा रहा है, क्योंकि इससे भविष्य में पुराने विवादों के आधार पर नई वित्तीय देनदारी खड़ी होने की आशंका कम हो सकती है।

निवेशकों का भरोसा बढ़ाने की कोशिश

सरकार का मानना है कि माइनिंग क्षेत्र में भारी पूंजी निवेश की जरूरत होती है और परियोजनाओं को तैयार होने में कई वर्ष लग सकते हैं। ऐसे में निवेशकों के लिए यह जानना जरूरी है कि किसी परियोजना पर आगे चलकर किस तरह की कर देनदारी आएगी।

सरकार के मुताबिक स्थिर और अनुमानित टैक्स व्यवस्था से घरेलू निवेश के साथ विदेशी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलेगा। इससे नई माइनिंग परियोजनाओं, तकनीक और बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ सकता है।

राज्यों के राजस्व हितों का भी दावा

केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि संशोधन का उद्देश्य राज्यों के मौजूदा खनिज राजस्व को खत्म करना नहीं है। सरकार के अनुसार राज्यों को रॉयल्टी, ऑक्शन प्रीमियम, DMF और GST में हिस्सेदारी जैसे मौजूदा राजस्व स्रोत मिलते रहेंगे।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक खनन क्षेत्र से होने वाले राजस्व का बड़ा हिस्सा राज्यों को मिलता है। 2025-26 में राज्यों को खनन से प्राप्त राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सरकार का तर्क है कि खनन परियोजनाओं को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने से उत्पादन बढ़ेगा और लंबे समय में राज्यों का राजस्व भी बढ़ सकता है।

महत्वपूर्ण खनिजों पर भी असर

भारत के लिए यह बदलाव केवल पारंपरिक खनिजों तक सीमित नहीं है। सरकार महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने पर जोर दे रही है। ग्रेफाइट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों और अन्य रणनीतिक संसाधनों की लागत यदि अत्यधिक बढ़ती है तो घरेलू उत्पादन आर्थिक रूप से कमजोर हो सकता है।

सरकार का मानना है कि लागत और टैक्स व्यवस्था में स्थिरता से महत्वपूर्ण खनिजों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। इससे आयात पर निर्भरता कम करने और खनिज क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य से जुड़ा कदम

खनिज क्षेत्र का सीधा संबंध स्टील, सीमेंट, बिजली, निर्माण, रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों से है। इसलिए खनन लागत और निवेश वातावरण में होने वाले बदलाव का असर व्यापक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

केंद्र सरकार के अनुसार MMDR Amendment Act, 2026 का उद्देश्य खनिज क्षेत्र में पूर्वानुमेयता, पारदर्शिता और एकरूपता लाना है। नई व्यवस्था से निवेशकों को अपनी परियोजनाओं की लागत और संभावित कर दायित्व का बेहतर अनुमान लगाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

कुल मिलाकर, 2026 का MMDR संशोधन 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पैदा हुई कर संबंधी अनिश्चितताओं के बीच केंद्र की ओर से लाया गया महत्वपूर्ण कानूनी बदलाव है। इसका वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में माइनिंग परियोजनाओं, राज्यों के राजस्व और निवेश प्रवाह पर दिखाई देगा। फिलहाल सरकार इसे खनन क्षेत्र में दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता लाने और भारत को महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अहम कदम बता रही है।

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