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ममता ने EC के फैसले को दी चुनौती

Kavita2
19 Sept 2026 10:57 AM IST
ममता ने EC के फैसले को दी चुनौती
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नई दिल्ली/कोलकाता। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस के एक गुट की नेता ममता बनर्जी ने पार्टी के नाम और पारंपरिक चुनाव चिह्न को फ्रीज करने के चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे नेतृत्व और पार्टी की पहचान से जुड़े विवाद के बीच यह मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है।

ममता बनर्जी ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उनकी याचिका चुनाव आयोग के उस अंतरिम आदेश के खिलाफ है, जिसमें आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और पार्टी के पारंपरिक ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर फिलहाल रोक लगा दी है। आयोग ने यह व्यवस्था पार्टी के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच मूल नाम और चुनाव चिह्न पर दावे को देखते हुए की है।

चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को अंतरिम आदेश जारी करते हुए दोनों गुटों को आगामी उपचुनावों में मूल पार्टी नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने से रोक दिया था। आयोग का अंतिम फैसला आने तक दोनों गुटों को अलग-अलग अस्थायी नाम और चुनाव चिह्न के साथ चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने की व्यवस्था की गई है।

इसके अगले दिन चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम आवंटित किया। इस गुट को ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया है। वहीं प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया।

नई व्यवस्था आगामी उपचुनावों के लिए लागू की गई है। पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं। इन चुनावों से ठीक पहले पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर पैदा हुए विवाद ने राज्य की राजनीति में नई कानूनी और राजनीतिक लड़ाई खड़ी कर दी है।

चुनाव आयोग के मुताबिक अंतरिम व्यवस्था इसलिए जरूरी थी ताकि दोनों गुटों द्वारा एक ही पार्टी नाम और चुनाव चिह्न पर दावा करने के कारण चुनावी प्रक्रिया प्रभावित न हो। आयोग को अभी यह अंतिम रूप से तय करना है कि मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसके आरक्षित चुनाव चिह्न पर किस गुट का अधिकार होगा।

ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के फैसले का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने आयोग के निर्णय को राजनीतिक पक्षपात और बदले की कार्रवाई करार दिया। हालांकि ये ममता बनर्जी के आरोप हैं और चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश में व्यवस्था को पार्टी के भीतर प्रतिद्वंद्वी दावों के बीच चुनावी प्रक्रिया बनाए रखने के उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

ममता बनर्जी ने कहा कि वह मूल तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगी। उनके गुट के नेताओं ने भी आयोग के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पार्टी की स्थापना और उसके लंबे राजनीतिक इतिहास को देखते हुए मूल नाम और चुनाव चिह्न पर उनके दावे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होने के बाद की थी। इसके बाद ‘फूल और घास’ का चुनाव चिह्न पार्टी की पहचान बन गया। पश्चिम बंगाल में पार्टी के लंबे राजनीतिक सफर के दौरान यही चिह्न चुनाव प्रचार, पार्टी के झंडों और उम्मीदवारों की पहचान का प्रमुख हिस्सा रहा है।

इसी वजह से चुनाव आयोग द्वारा मूल नाम और चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से फ्रीज करने का फैसला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि आयोग ने अभी किसी भी गुट को मूल पार्टी का अंतिम और वैधानिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया है। यह फैसला आगे दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर किया जाना है।

पार्टी के भीतर विवाद उस समय और गहरा गया जब एक समूह ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती देते हुए अलग संगठनात्मक दावा पेश किया। बाद में दोनों पक्षों ने चुनाव आयोग के सामने पार्टी की वास्तविक पहचान और चुनाव चिह्न पर अपना-अपना दावा रखा। इसी विवाद के बीच आयोग को अंतरिम व्यवस्था करनी पड़ी।

चुनाव आयोग ने दोनों गुटों से वैकल्पिक नाम और उपलब्ध मुक्त चुनाव चिह्नों के विकल्प मांगे थे। इसके बाद ममता गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ का चिह्न मिला, जबकि प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ तथा ‘लिफाफा’ चिह्न दिया गया।

आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था फिलहाल उपचुनावों और पार्टी विवाद पर अंतिम निर्णय होने तक के लिए है। इसलिए नए नाम और चुनाव चिह्न का आवंटन मूल तृणमूल कांग्रेस की स्थायी पहचान पर अंतिम फैसला नहीं है।

नंदीग्राम उपचुनाव को लेकर भी राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदला है। ममता बनर्जी ने अपने गुट के उम्मीदवार को पीछे हटाते हुए कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की है। इसके कुछ समय बाद मिलन प्रधान को 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया। उनकी गिरफ्तारी को लेकर भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं।

ममता बनर्जी ने गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है। कांग्रेस नेताओं ने भी इसी तरह के आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर गिरफ्तारी पुराने आपराधिक मामले से जुड़ी बताई गई है। आरोपों की सत्यता और मामले में आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के तहत होगा।

अब पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न का विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से कानूनी लड़ाई का नया चरण शुरू हो गया है। ममता बनर्जी की याचिका में चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश की वैधता पर सवाल उठाया गया है। शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान आयोग के फैसले और दोनों गुटों के दावों से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार हो सकता है।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नंदीग्राम और रेजीनगर में 6 अक्टूबर को मतदान होना है। चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ने के कारण पार्टी की पहचान और उम्मीदवारों के चुनाव चिह्न को लेकर स्पष्टता जरूरी है।

फिलहाल चुनाव आयोग का अंतरिम आदेश लागू है। इसके तहत ममता बनर्जी का गुट ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ की अस्थायी पहचान के साथ रहेगा, जबकि प्रतिद्वंद्वी गुट ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करेगा।

अब नजर सुप्रीम कोर्ट की आगामी कार्यवाही पर है। शीर्ष अदालत से मिलने वाला आदेश यह तय कर सकता है कि उपचुनावों के दौरान चुनाव आयोग की मौजूदा अंतरिम व्यवस्था जारी रहेगी या उसमें कोई बदलाव होगा। मूल तृणमूल कांग्रेस के नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न पर अंतिम अधिकार का सवाल फिलहाल चुनाव आयोग के समक्ष लंबित है।

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