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लैंसेट की रिपोर्ट में भारत के लिए बड़ी चेतावनी, 17 वैश्विक स्वास्थ्य खतरों का सामना कर रहा देश

नई दिल्ली। स्वास्थ्य के क्षेत्र में 21वीं सदी के दौरान दुनिया के सामने आने वाले गंभीर खतरों को लेकर लैंसेट कमीशन की एक रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत उन सभी 17 वैश्विक स्वास्थ्य खतरों का सामना कर रहा है, जिनकी पहचान अध्ययन में की गई है। इनमें वायु प्रदूषण, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) और शराब का अत्यधिक सेवन जैसे जोखिम शामिल हैं। अध्ययन में दो ऐसे खतरे भी शामिल बताए गए हैं, जिनसे मानव अस्तित्व तक प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की गई है। रिपोर्ट लंबे समय की स्वास्थ्य योजनाओं को मजबूत करने और भविष्य में उभरने वाली चुनौतियों के लिए तैयारी बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर देती है।
क्रिस्टोफर जेएल मरे से जुड़ी इस रिपोर्ट में वर्ष 2025 से 2100 के बीच स्वास्थ्य संबंधी खतरों के संभावित प्रभावों का तुलनात्मक आकलन किया गया है। अध्ययन में विकलांगता-समायोजित जीवन-वर्ष यानी डीएएलवाई (DALYs) का उपयोग किया गया है। यह स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने का एक महत्वपूर्ण मापदंड है।
भारत के सामने 17 स्वास्थ्य चुनौतियां
रिपोर्ट में 21वीं सदी के लिए कुल 17 गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य खतरों की पहचान की गई है।
उपलब्ध विवरण के अनुसार, भारत इन सभी खतरों का सामना कर रहा है।
इनमें पर्यावरण से जुड़े जोखिम, दवाओं के प्रभावी न रहने की समस्या और जीवनशैली से संबंधित स्वास्थ्य चुनौतियां शामिल हैं।
रिपोर्ट में वायु प्रदूषण, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस और शराब के अत्यधिक सेवन का विशेष उल्लेख किया गया है।
हालांकि, अध्ययन में शामिल सभी 17 खतरों की पूरी सूची उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई है।
इसलिए अन्य खतरों के नाम या उनके अलग-अलग प्रभावों के बारे में बिना पुष्टि के दावा करना उचित नहीं होगा।
वायु प्रदूषण बना गंभीर चिंता
भारत के सामने मौजूद प्रमुख स्वास्थ्य खतरों में वायु प्रदूषण शामिल है।
प्रदूषित हवा का लंबे समय तक संपर्क मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
वायु प्रदूषण का संबंध सांस संबंधी बीमारियों, हृदय रोगों और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ते जोखिम से पाया गया है।
यह समस्या केवल तत्काल बीमारी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लंबे समय में स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकती है।
इसी कारण वायु गुणवत्ता में सुधार सार्वजनिक स्वास्थ्य की महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल है।
हालांकि, इस अध्ययन के आधार पर भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली अनुमानित मौतों या बीमारी के बोझ का कोई विशिष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से बढ़ता खतरा
रिपोर्ट में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी एएमआर को भी गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बताया गया है।
यह ऐसी स्थिति है, जिसमें बैक्टीरिया और अन्य रोगाणु संक्रमण के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं।
इसके कारण कुछ संक्रमणों का इलाज पहले की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है।
एएमआर का बढ़ना स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि प्रभावी उपचार के विकल्प सीमित हो सकते हैं।
एंटीबायोटिक दवाओं का अनावश्यक या अनुचित इस्तेमाल इस समस्या को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल है।
इससे निपटने के लिए दवाओं का जिम्मेदार उपयोग, संक्रमण की रोकथाम और निगरानी व्यवस्था महत्वपूर्ण मानी जाती है।
शराब के अत्यधिक सेवन का भी उल्लेख
लैंसेट कमीशन की रिपोर्ट में शराब के अत्यधिक सेवन को भी स्वास्थ्य संबंधी खतरों में शामिल किया गया है।
अत्यधिक शराब सेवन से शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते हैं।
इसका संबंध यकृत रोग, कुछ प्रकार के कैंसर और अन्य शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ते जोखिम से है।
शराब से जुड़ा नुकसान केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि परिवार और समाज पर भी प्रभाव डाल सकता है।
रिपोर्ट में इस जोखिम को शामिल किया जाना सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में निवारक उपायों के महत्व को रेखांकित करता है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में भारत के लिए शराब से संबंधित अनुमानित स्वास्थ्य नुकसान का अलग आंकड़ा नहीं दिया गया है।
दो खतरों को लेकर विशेष चेतावनी
रिपोर्ट में दो ऐसे खतरों का भी उल्लेख है, जिनसे अत्यंत गंभीर और संभावित रूप से अस्तित्व संबंधी नुकसान हो सकता है।
इस प्रकार के जोखिम सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं से अलग होते हैं, क्योंकि इनके संभावित परिणाम बहुत व्यापक हो सकते हैं।
हालांकि, उपलब्ध विवरण में इन दोनों खतरों के नाम स्पष्ट नहीं किए गए हैं।
इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि अध्ययन ने किन विशिष्ट परिस्थितियों को अस्तित्व संबंधी जोखिम की श्रेणी में रखा है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि रिपोर्ट स्वास्थ्य सुरक्षा को केवल वर्तमान बीमारियों तक सीमित रखने के बजाय भविष्य के बड़े खतरों को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता बताती है।
वर्ष 2100 तक के खतरों का आकलन
क्रिस्टोफर जेएल मरे से जुड़ी रिपोर्ट में वर्ष 2025 से 2100 तक की अवधि को अध्ययन का आधार बनाया गया है।
इस लंबे समय के दौरान विभिन्न स्वास्थ्य खतरों के संभावित प्रभावों की तुलना करने का प्रयास किया गया है।
सामान्य तौर पर स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों में बीमारियों और मृत्यु के मौजूदा आंकड़ों पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
लेकिन इस अध्ययन में भविष्य के स्वास्थ्य जोखिमों के संभावित बोझ को समझने का प्रयास किया गया है।
ऐसा आकलन सरकारों और स्वास्थ्य संस्थानों को दीर्घकालिक योजनाएं बनाने के लिए उपयोगी जानकारी प्रदान कर सकता है।
हालांकि, भविष्य के अनुमान निश्चित परिणाम नहीं होते। वे अध्ययन में इस्तेमाल किए गए आंकड़ों और मान्यताओं पर निर्भर करते हैं।
क्या होता है DALY?
रिपोर्ट में स्वास्थ्य खतरों की तुलना के लिए विकलांगता-समायोजित जीवन-वर्ष यानी डीएएलवाई का उपयोग किया गया है।
डीएएलवाई स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुल नुकसान को मापने का एक तरीका है।
इसमें समय से पहले मृत्यु के कारण खोए गए जीवन-वर्ष और बीमारी या विकलांगता के साथ बिताए गए वर्षों का प्रभाव शामिल किया जाता है।
सरल शब्दों में, यह माप बताता है कि किसी बीमारी या स्वास्थ्य जोखिम के कारण स्वस्थ जीवन के कितने वर्ष प्रभावित हुए।
इससे अलग-अलग बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं के प्रभावों की तुलना करना संभव होता है।
रिपोर्ट में अनुमानित डीएएलवाई के आधार पर विभिन्न वैश्विक खतरों का आकलन किया गया है।
अलग-अलग खतरों की तुलना क्यों जरूरी?
वायु प्रदूषण, दवा प्रतिरोध और शराब का अत्यधिक सेवन अलग-अलग प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं हैं।
इनके कारण, प्रभाव और रोकथाम के उपाय भी एक जैसे नहीं होते।
ऐसे जोखिमों की सीधे तुलना करना कठिन हो सकता है।
डीएएलवाई जैसे मापदंड का उपयोग इन समस्याओं से होने वाले संभावित स्वास्थ्य नुकसान को एक साझा आधार पर समझने में मदद करता है।
इससे यह आकलन किया जा सकता है कि विभिन्न खतरों का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कितना व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
हालांकि, प्रत्येक खतरे की गंभीरता उसके फैलाव, प्रभाव और रोकथाम की संभावनाओं पर भी निर्भर करती है।
दीर्घकालिक स्वास्थ्य योजनाओं की जरूरत
रिपोर्ट का प्रमुख संदेश यह है कि स्वास्थ्य संबंधी नीतियों में भविष्य की चुनौतियों को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए।
भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं का प्रभाव व्यापक हो सकता है।
वायु प्रदूषण को कम करना, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की रोकथाम और शराब से जुड़े स्वास्थ्य नुकसान को घटाना अलग-अलग क्षेत्रों में निरंतर प्रयास की मांग करते हैं।
इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं के साथ पर्यावरण, शिक्षा और अन्य संबंधित क्षेत्रों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि, रिपोर्ट के आधार पर भारत सरकार की किसी नई नीति या निर्णय की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
भविष्य की स्वास्थ्य सुरक्षा पर जोर
लैंसेट कमीशन की रिपोर्ट 21वीं सदी के स्वास्थ्य खतरों को लेकर एक व्यापक चेतावनी के रूप में सामने आई है।
अध्ययन के अनुसार, भारत सभी 17 पहचाने गए वैश्विक जोखिमों का सामना कर रहा है।
इनमें कुछ ऐसे खतरे हैं जिनका प्रभाव लंबे समय तक रह सकता है, जबकि कुछ जोखिम अत्यंत गंभीर परिणामों की आशंका से जुड़े हैं।
वर्ष 2025 से 2100 तक के संभावित स्वास्थ्य नुकसान का आकलन यह दर्शाता है कि भविष्य की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए अभी से तैयारी करना महत्वपूर्ण है।
रिपोर्ट का केंद्रीय संदेश स्पष्ट है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौतियों को केवल वर्तमान बीमारियों के उपचार तक सीमित नहीं रखा जा सकता। वायु प्रदूषण, दवा प्रतिरोध और अत्यधिक शराब सेवन जैसे जोखिमों को कम करने के साथ भविष्य में उभरने वाले बड़े खतरों के लिए भी मजबूत स्वास्थ्य योजनाओं की आवश्यकता होगी।





