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किसानों को बड़ा झटका, गेहूं के MSP में सिर्फ 25 रुपये की बढ़ोतरी, दलहन-तिलहन पर सरकार मेहरबान

Kavita2
8 Oct 2026 3:58 PM IST
किसानों को बड़ा झटका, गेहूं के MSP में सिर्फ 25 रुपये की बढ़ोतरी, दलहन-तिलहन पर सरकार मेहरबान
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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने रबी विपणन सीजन 2027-28 के लिए छह प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी की घोषणा की है। इस बार सरकार ने गेहूं की तुलना में दलहन और तिलहन फसलों के समर्थन मूल्य में अधिक वृद्धि की है। गेहूं का एमएसपी 2,585 रुपये से बढ़ाकर 2,610 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है। यानी किसानों को पिछले सीजन के मुकाबले केवल 25 रुपये प्रति क्विंटल अधिक मिलेंगे। दूसरी ओर कुसुम के समर्थन मूल्य में सबसे ज्यादा 675 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। सरसों में 413 रुपये, मसूर में 390 रुपये, जौ में 136 रुपये और चने में 83 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है। केंद्र सरकार के इस फैसले से अलग-अलग फसलों की खेती करने वाले किसानों पर अलग-अलग असर पड़ेगा। गेहूं के समर्थन मूल्य में मामूली वृद्धि से किसान संगठनों ने नाराजगी जताई है, जबकि तिलहन और दलहन की खेती करने वालों को अपेक्षाकृत अधिक बढ़ोतरी का लाभ मिल सकता है।

गेहूं के समर्थन मूल्य में सिर्फ 25 रुपये की वृद्धि

केंद्र सरकार ने गेहूं का नया न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,610 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है।

पिछले रबी विपणन सीजन 2026-27 में गेहूं का एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल था।

इस प्रकार गेहूं के समर्थन मूल्य में केवल 25 रुपये की बढ़ोतरी हुई है।

एक क्विंटल में 100 किलोग्राम होते हैं। इस हिसाब से गेहूं के समर्थन मूल्य में महज 25 पैसे प्रति किलोग्राम का इजाफा हुआ है।

गेहूं की खेती करने वाले किसानों के लिए यह बढ़ोतरी अपेक्षाकृत कम है। किसानों को फसल उत्पादन में बीज, खाद, सिंचाई, डीजल, मजदूरी और अन्य संसाधनों पर खर्च करना पड़ता है।

किसान संगठनों का कहना है कि बढ़ती लागत के बीच समर्थन मूल्य में इतनी कम वृद्धि पर्याप्त नहीं है।

कुसुम के समर्थन मूल्य में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी

रबी फसलों में इस बार कुसुम के न्यूनतम समर्थन मूल्य में सबसे अधिक वृद्धि की गई है।

कुसुम का एमएसपी पिछले सीजन के 6,540 रुपये से बढ़ाकर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है।

इस तरह कुसुम की कीमत में 675 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है।

हालांकि, जिस जिले की कृषि स्थिति का उल्लेख किया गया है, वहां कुसुम की खेती नहीं होने के कारण स्थानीय किसानों को इस बढ़ोतरी का सीधा लाभ मिलने की संभावना नहीं है।

केंद्र सरकार के फैसले का लाभ मुख्य रूप से उन क्षेत्रों के किसानों को होगा, जहां कुसुम की खेती की जाती है और फसल की बिक्री समर्थन मूल्य पर संभव होती है।

सरसों के किसानों को मिलेगी राहत

कुसुम के बाद सबसे अधिक बढ़ोतरी रेपसीड और सरसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में की गई है।

पिछले सीजन में सरसों का एमएसपी 6,200 रुपये प्रति क्विंटल था, जिसे बढ़ाकर 6,613 रुपये कर दिया गया है।

इस प्रकार सरसों के समर्थन मूल्य में 413 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है।

सरसों एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है, जिसका उपयोग खाद्य तेल उत्पादन में किया जाता है।

सरकार का उद्देश्य तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देकर घरेलू स्तर पर खाद्य तेल की उपलब्धता बढ़ाना भी है।

हालांकि, किसानों को वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब उन्हें अपनी उपज का उचित बाजार मूल्य या समर्थन मूल्य पर खरीद की सुविधा उपलब्ध होगी।

मसूर के समर्थन मूल्य में 390 रुपये की बढ़ोतरी

दलहनी फसलों में मसूर को इस बार अच्छी बढ़ोतरी मिली है।

मसूर का एमएसपी 7,000 रुपये से बढ़ाकर 7,390 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है।

इस तरह मसूर के समर्थन मूल्य में 390 रुपये की वृद्धि हुई है।

मसूर का उपयोग दाल के रूप में किया जाता है और यह देश की प्रमुख दलहनी फसलों में शामिल है।

दलहन उत्पादन बढ़ाने से देश में दालों की उपलब्धता मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

सरकार की नीति का एक उद्देश्य किसानों को फसल विविधीकरण के लिए प्रोत्साहित करना भी है।

चना और जौ के दाम भी बढ़ाए गए

रबी विपणन सीजन 2027-28 के लिए चने के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 83 रुपये की वृद्धि की गई है।

चना का एमएसपी पिछले सीजन में 5,875 रुपये प्रति क्विंटल था, जिसे बढ़ाकर 5,958 रुपये कर दिया गया है।

वहीं जौ का समर्थन मूल्य 2,150 रुपये से बढ़ाकर 2,286 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है।

इस प्रकार जौ में 136 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है।

केंद्र सरकार ने सभी छह प्रमुख रबी फसलों के समर्थन मूल्य बढ़ाए हैं, लेकिन वृद्धि की राशि अलग-अलग रखी गई है।

रबी फसलों का नया एमएसपी

फसल

पुराना एमएसपी

नया एमएसपी

बढ़ोतरी

गेहूं

₹2,585

₹2,610

₹25

चना

₹5,875

₹5,958

₹83

मसूर

₹7,000

₹7,390

₹390

सरसों

₹6,200

₹6,613

₹413

जौ

₹2,150

₹2,286

₹136

कुसुम

₹6,540

₹7,215

₹675

सभी दरें रुपये प्रति क्विंटल में हैं। स्रोत: केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की 30 सितंबर 2026 की घोषणा।

केंद्र सरकार ने 30 सितंबर को दी थी मंजूरी

केंद्र सरकार ने 30 सितंबर 2026 को रबी विपणन सीजन 2027-28 के लिए एमएसपी बढ़ाने का निर्णय लिया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी।

सरकार का कहना है कि समर्थन मूल्य में वृद्धि का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराना है।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, नई दरें अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत से कम से कम डेढ़ गुना एमएसपी तय करने की नीति के अनुरूप निर्धारित की गई हैं।

गेहूं किसानों में नाराजगी क्यों?

गेहूं की खेती करने वाले किसानों के लिए समर्थन मूल्य में केवल 25 रुपये की बढ़ोतरी असंतोष का कारण बन रही है।

किसान संगठनों का कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और ऐसे में समर्थन मूल्य में मामूली बढ़ोतरी किसानों की आर्थिक जरूरतों के अनुरूप नहीं है।

संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े संगठनों ने भी गेहूं के एमएसपी में 25 पैसे प्रति किलोग्राम की वृद्धि की आलोचना की है।

किसान संगठनों ने सरकार से कृषि लागत और किसानों की आय को ध्यान में रखते हुए समर्थन मूल्य निर्धारित करने की मांग की है।

उत्पादन लागत के मुकाबले सरकार का दावा

केंद्र सरकार के अनुसार, गेहूं की अखिल भारतीय औसत उत्पादन लागत 1,264 रुपये प्रति क्विंटल अनुमानित की गई है।

इसके मुकाबले नया एमएसपी 2,610 रुपये निर्धारित किया गया है।

सरकारी अनुमान के अनुसार, गेहूं का समर्थन मूल्य निर्धारित उत्पादन लागत से 106 प्रतिशत अधिक है।

सरसों के लिए यह अंतर 96 प्रतिशत और मसूर के लिए 92 प्रतिशत बताया गया है।

हालांकि, यह आंकड़ा राष्ट्रीय स्तर पर अनुमानित औसत लागत पर आधारित है।

अलग-अलग राज्यों और जिलों में सिंचाई, मजदूरी, किराये की जमीन और अन्य संसाधनों के कारण किसानों की वास्तविक लागत अलग हो सकती है।

स्थानीय किसानों पर क्या होगा असर?

जिले के किसानों के लिए एमएसपी में बढ़ोतरी का असर उनकी फसल के चयन और उत्पादन पर निर्भर करेगा।

जो किसान गेहूं की खेती करते हैं, उन्हें घोषित दर के अनुसार पिछले सीजन से केवल 25 रुपये प्रति क्विंटल अधिक समर्थन मूल्य मिलेगा।

सरसों, मसूर और अन्य दलहनी फसलों की खेती करने वाले किसानों के लिए बढ़ोतरी अपेक्षाकृत अधिक है।

वहीं स्थानीय स्तर पर कुसुम की खेती नहीं होने के कारण उसके समर्थन मूल्य में हुई सबसे बड़ी वृद्धि का सीधा लाभ नहीं मिलेगा।

किसानों के लिए केवल एमएसपी की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। खरीद केंद्रों की उपलब्धता, फसल की गुणवत्ता, बाजार भाव और समय पर भुगतान भी महत्वपूर्ण हैं।

दलहन-तिलहन का उत्पादन बढ़ाने पर जोर

सरकार ने इस बार गेहूं की तुलना में दलहन और तिलहन फसलों के समर्थन मूल्य में अधिक वृद्धि की है।

इस फैसले को फसल विविधीकरण और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रयास से जोड़कर देखा जा रहा है।

देश में खाद्य तेल और कुछ दालों की जरूरत पूरी करने के लिए आयात भी करना पड़ता है।

ऐसे में घरेलू स्तर पर दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाना कृषि नीति का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

एमएसपी में अधिक बढ़ोतरी किसानों को इन फसलों की खेती पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।

हालांकि, फसल बदलने का निर्णय स्थानीय मिट्टी, मौसम, सिंचाई, लागत और बाजार की उपलब्धता को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।

किसानों की निगाहें अब सरकारी खरीद पर

नई एमएसपी दरों की घोषणा के बाद किसानों की नजर आगामी रबी फसलों की खरीद व्यवस्था पर रहेगी।

गेहूं और अन्य फसलों की वास्तविक बिक्री कीमत मंडियों की स्थिति और सरकारी खरीद पर निर्भर करेगी।

एमएसपी घोषित होने का मतलब यह नहीं है कि हर किसान की पूरी उपज उसी कीमत पर खरीदी जाएगी।

किसानों को घोषित समर्थन मूल्य का लाभ दिलाने के लिए पर्याप्त खरीद व्यवस्था और समय पर भुगतान आवश्यक होगा।

केंद्र सरकार ने सभी छह प्रमुख रबी फसलों के एमएसपी बढ़ाए हैं, लेकिन गेहूं में केवल 25 रुपये की वृद्धि और कुसुम में 675 रुपये की बढ़ोतरी ने किसानों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई दरों और सरकारी खरीद व्यवस्था से किसानों की वास्तविक आय पर कितना असर पड़ता है।

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